स्टांप पेपर का खेल अब नहीं चलेगा! बिल्डर-मकान मालिक का करार होगा रजिस्टर्ड, 1% फीस की तैयारी

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 29 अगस्त

दिल्ली में प्रॉपर्टी एग्रीमेंट पर सरकार की नजर, छोटे प्लॉटों पर होने वाले अनौपचारिक समझौतों पर लगेगी लगाम; खरीदारों पर भी पड़ सकता है सीधा असरनई दिल्ली: दिल्ली में जमीन-मकान की खरीद-बिक्री और निर्माण से जुड़े पुराने तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। बिल्डर और मकान मालिक के बीच होने वाले ऐसे करार, जो अब तक कई मामलों में महज 50 या 100 रुपये के स्टांप पेपर पर निपटा दिए जाते थे, उन्हें अब कानूनी तौर पर रजिस्टर्ड कराना अनिवार्य किया जा सकता है।

दिल्ली सरकार रजिस्ट्रेशन एक्ट में संशोधन की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था लागू हुई तो बिल्डर और संपत्ति मालिक के बीच हुआ करार सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत कराना होगा और इसके लिए करार की कीमत का करीब एक फीसदी शुल्क लिया जा सकता है।

सरकार का तर्क है कि इस व्यवस्था से संपत्ति के मालिकाना हक, फ्लोर के बंटवारे और बिल्डर-मालिक के बीच होने वाले विवादों को कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही, ऐसे लेनदेन को सरकारी रिकॉर्ड में लाने से राजस्व का नुकसान भी रोका जा सकेगा।

50 रुपये के स्टांप पेपर से करोड़ों की प्रॉपर्टी का करार?

दिल्ली में 80 से 100 गज जैसे छोटे प्लॉटों पर बिल्डर और जमीन मालिक के बीच मिलकर तीन या चार मंजिला मकान बनाने का चलन लंबे समय से है। इस पूरी व्यवस्था में अक्सर जमीन मालिक और बिल्डर आपसी सहमति से तय करते हैं कि किसे कितने फ्लोर मिलेंगे और किसे कितना पैसा दिया जाएगा।

लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है।कई मामलों में करोड़ों रुपये की संपत्ति से जुड़े समझौते को मामूली स्टांप पेपर पर लिखकर छोड़ दिया जाता है। किसी मंजिल के बदले नकद भुगतान, किसी हिस्से पर मालिकाना हक या भविष्य में फ्लैट बेचने जैसी शर्तें कागज पर तो होती हैं, लेकिन उनका विधिवत पंजीकरण नहीं कराया जाता।

यही अनौपचारिक व्यवस्था बाद में विवाद की बड़ी वजह बनती है। एक पक्ष करार की शर्तों से मुकरता है तो दूसरा पक्ष अदालत का दरवाजा खटखटाता है। सरकार अब इसी रास्ते को बंद करने की तैयारी में है।

सिर्फ कागज पर समझौता नहीं, सरकारी रिकॉर्ड में भी दर्ज होगा करार

प्रस्तावित बदलाव का सबसे बड़ा असर यही होगा कि केवल स्टांप पेपर पर एग्रीमेंट कर लेना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। बिल्डर और संपत्ति मालिक के बीच हुआ करार सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत कराना होगा।इससे करार सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाएगा और भविष्य में किसी पक्ष के मुकरने या शर्तों को लेकर विवाद खड़ा होने की स्थिति में दस्तावेज की कानूनी स्थिति पहले से कहीं अधिक स्पष्ट होगी।

सरकार की नजर में यह सिर्फ रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि दिल्ली के प्रॉपर्टी बाजार में चल रहे उस अनौपचारिक सिस्टम को व्यवस्थित करने की कोशिश है, जिसमें बड़ी संपत्ति के सौदे छोटे स्टांप पेपर पर निपटा दिए जाते हैं।

खरीदार की जेब पर भी पड़ सकता है असर

इस बदलाव का असर केवल बिल्डर और मकान मालिक तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा प्रभाव उन लोगों पर भी पड़ सकता है, जो ऐसे प्रोजेक्ट में बने फ्लैट खरीदते हैं।यदि मूल बिल्डर-मालिक करार का पंजीकरण नहीं कराया गया है और बाद में उस संपत्ति का फ्लैट बेचा जाता है, तो पुराने करार से जुड़ी फीस और देनदारी सामने आ सकती है।

ऐसी स्थिति में बकाया शुल्क की वसूली का भार अंततः खरीदार पर भी पड़ने की आशंका है।यानी जिस करार को आज बिल्डर और जमीन मालिक मामूली स्टांप पेपर पर निपटा रहे हैं, कल वही खरीदार के लिए अतिरिक्त खर्च और कानूनी जांच का कारण बन सकता है।

GPA के जरिए प्रॉपर्टी ट्रांसफर पर भी शिकंजा

दिल्ली सरकार की नजर सिर्फ बिल्डर-मालिक एग्रीमेंट पर नहीं है। जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) के जरिए संपत्ति के हस्तांतरण को लेकर भी सरकार पहले से सख्त रुख अपना रही है।प्रस्तावित व्यवस्था के तहत ब्लड रिलेशन से बाहर किसी व्यक्ति को GPA के माध्यम से संपत्ति ट्रांसफर किए जाने पर स्टांप ड्यूटी लगाए जाने का प्रावधान लाने पर विचार किया जा रहा है।

कितना शुल्क लगेगा, इसका निर्धारण कलेक्टर ऑफ स्टांप कर सकता है।इसके साथ ही दिल्ली सरकार रजिस्ट्रेशन एक्ट में बदलाव के जरिए GPA पर करीब 4 फीसदी स्टांप शुल्क लगाने के विकल्प पर भी विचार कर रही है।

असल मकसद—प्रॉपर्टी के अनौपचारिक खेल को खत्म करना

दिल्ली में संपत्ति के लेनदेन का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय से अलग-अलग तरह के एग्रीमेंट, GPA और अनरजिस्टर्ड दस्तावेजों के सहारे चलता रहा है। इससे न केवल सरकार को राजस्व का नुकसान होता है, बल्कि संपत्ति के वास्तविक मालिकाना हक को लेकर भी जटिलताएं पैदा होती हैं।

अब सरकार जिस दिशा में बढ़ रही है, उसका संदेश साफ है—प्रॉपर्टी का करार सिर्फ कागज पर नहीं, सरकारी रिकॉर्ड में भी होना चाहिए।अगर प्रस्तावित संशोधन लागू होता है तो बिल्डर, जमीन मालिक और खरीदार—तीनों को संपत्ति से जुड़े दस्तावेजों को लेकर पहले से ज्यादा सावधानी बरतनी होगी। खासकर छोटे प्लॉटों पर बनने वाली बहुमंजिला संपत्तियों में अनौपचारिक समझौतों की गुंजाइश काफी कम हो सकती है।

दिल्ली की प्रॉपर्टी व्यवस्था में यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि यहां कुछ हजार रुपये के स्टांप पेपर पर किए गए एक समझौते के पीछे करोड़ों रुपये की संपत्ति और कई परिवारों का भविष्य जुड़ा होता है।

सरकार अब इसी विरोधाभास को खत्म करने की कोशिश कर रही है।

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