आरक्षण पर फिर आमने-सामने NDA के अपने ‘योद्धा’! चिराग बोले- समीक्षा तो दूर, चर्चा भी नहीं… मांझी का सवाल- सबसे वंचित को हक कब?

बी के झ

पटना/नई दिल्ली।

आरक्षण पर देश में बहस कोई नई बात नहीं है, लेकिन बिहार से उठी ताजा आवाज ने इस बहस को एक बार फिर राजनीतिक विस्फोट के मुहाने पर ला खड़ा किया है। खास बात यह है कि इस बार टकराव आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी खेमों के बीच नहीं, बल्कि एक ही राजनीतिक गठबंधन NDA के भीतर सामाजिक न्याय की दो अलग-अलग धारणाओं के बीच दिखाई दे रहा है।केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने आरक्षण की समीक्षा की संभावना को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि समीक्षा तो बहुत दूर की बात है, आज की तारीख में आरक्षण पर चर्चा तक संभव नहीं है।

चिराग का कहना है कि आरक्षण को कमजोर करने की कोशिश हुई तो देश की बड़ी आबादी सड़क पर उतर सकती है और स्थिति संभालना मुश्किल हो जाएगा।लेकिन इसी सवाल पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन की सोच बिल्कुल अलग है। उनका सवाल है कि अगर आरक्षण सामाजिक न्याय का माध्यम है तो यह भी देखना होगा कि इसका लाभ समाज के सबसे वंचित व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं।

यहीं से असली राजनीतिक कहानी शुरू होती है—चिराग की चेतावनी: ‘आरक्षण को छूने की कोशिश हुई तो भारी प्रतिक्रिया होगी’

चिराग पासवान ने आरक्षण को महज सरकारी सुविधा मानने से साफ इनकार किया है। उनका कहना है कि यह व्यवस्था किसी को राहत या खैरात देने के लिए नहीं बनी, बल्कि सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से संवैधानिक व्यवस्था के रूप में स्थापित की गई।उनका तर्क है कि आरक्षण की समीक्षा का अर्थ उसके दायरे को कम करना होगा

और दायरा कम करने की शुरुआत अंततः पूरी व्यवस्था को खत्म करने की दिशा में जा सकती है।चिराग की चिंता केवल सामाजिक स्तर तक सीमित नहीं है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर जैसी व्यवस्था लागू की गई तो आरक्षित वर्ग से आने वाले मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व के सामने भी गंभीर चुनौती पैदा हो सकती है।

उनके शब्दों में छिपा राजनीतिक संदेश साफ है—आरक्षण केवल अधिकार नहीं, करोड़ों लोगों की सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा का सवाल है।

लेकिन मांझी पूछ रहे हैं- ‘आरक्षण का लाभ आखिर किसे?’

यहीं चिराग के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा होता है।जीतन राम मांझी का तर्क है कि आरक्षण का उद्देश्य समाज के सबसे कमजोर और वंचित वर्ग को आगे लाना है। यदि आरक्षण का बड़ा हिस्सा लगातार उन परिवारों तक पहुंचता रहे जो पहले ही शिक्षा, नौकरी और आर्थिक संसाधनों के लिहाज से आगे निकल चुके हैं, तो सबसे पिछड़े तबके के हिस्से में क्या बचता है?

यह सवाल केवल मांझी का नहीं है। लंबे समय से अनुसूचित जातियों के भीतर भी ऐसी आवाजें उठती रही हैं कि सभी जातियों और समूहों को आरक्षण का लाभ समान रूप से नहीं मिल पाया है।

यहीं क्रीमी लेयर और उप-वर्गीकरण की बहस जन्म लेती है।मांझी खेमा कहता है कि आरक्षण समाप्त करने की बात नहीं हो रही। सवाल यह है कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक कैसे पहुंचे जो अभी भी सामाजिक और आर्थिक सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर हैं।

असली टकराव: ‘आरक्षण बचाओ’ बनाम ‘आरक्षण का लाभ बराबर पहुंचाओ’

पूरे विवाद को यदि एक वाक्य में समझना हो तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है—चिराग पूछ रहे हैं—आरक्षण को कमजोर होने से कैसे बचाया जाए?

मांझी पूछ रहे हैं—आरक्षण का लाभ सबसे कमजोर तक कैसे पहुंचाया जाए?

दोनों की भाषा सामाजिक न्याय की है।दोनों आरक्षण के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं।लेकिन दोनों के रास्ते अलग हैं।और यही अंतर बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में बड़ा मुद्दा बन सकता है।-

कानून की किताब क्या कहती है?

यहां राजनीतिक बयान और संवैधानिक स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है।SC और ST आरक्षण में वर्तमान समय में OBC की तरह क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू नहीं है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी SC-ST आरक्षण में आय आधारित क्रीमी लेयर लागू करने की मांग का विरोध किया है।

सरकार का मूल तर्क है कि SC और ST आरक्षण की संवैधानिक पृष्ठभूमि केवल आर्थिक कमजोरी नहीं बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और वंचना से जुड़ी हुई है।इसलिए केवल आय या संपत्ति के आधार पर यह तय करना कि कौन आरक्षण का पात्र रहे और कौन नहीं, बेहद जटिल संवैधानिक प्रश्न है।

यानी फिलहाल यह कहना कि SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू होने जा रही है, सही नहीं होगा।लेकिन बहस खत्म भी नहीं हुई है।-

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्यों अहम?

आरक्षण के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई महत्वपूर्ण फैसले दे चुका है। SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण के सवाल पर अदालत ने राज्यों को अधिक वंचित समूहों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए वर्गीकरण की संवैधानिक गुंजाइश पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।यही वजह है कि अब राजनीतिक बहस का अगला चरण सिर्फ आरक्षण की कुल प्रतिशत सीमा तक सीमित नहीं रहेगा।

सवाल यह भी होगा—आरक्षण के भीतर वितरण कैसा हो?

कौन-से समूह लगातार पीछे हैं?

क्या आंकड़ों के आधार पर उनकी अलग पहचान की जा सकती है?

और सबसे अहम—क्या सामाजिक न्याय का अगला चरण ‘समान को समान’ देने से आगे बढ़कर ‘सबसे वंचित को प्राथमिकता’ देने का होना चाहिए?

शिक्षाविदों की नजर में असली समस्या स्कूल से शुरू होती हैआरक्षण की बहस

अक्सर सरकारी नौकरियों और चुनावी टिकटों तक सिमट जाती है। लेकिन शिक्षाविदों के लिए समस्या इससे कहीं पहले शुरू हो जाती है।एक ग्रामीण या बेहद पिछड़े परिवार का बच्चा जब उच्च शिक्षा की दौड़ में आता है, तब उसके सामने सिर्फ परीक्षा की चुनौती नहीं होती।

उसके सामने गुणवत्तापूर्ण स्कूल, आर्थिक संसाधन, डिजिटल सुविधा, अंग्रेजी और तकनीकी शिक्षा, कोचिंग तथा सामाजिक पूंजी की कमी जैसी कई बाधाएं होती हैं।दूसरी ओर उसी आरक्षित श्रेणी का वह परिवार भी हो सकता है जिसने कई पीढ़ियों में शिक्षा, सरकारी नौकरी और आर्थिक संसाधनों के जरिए मजबूत स्थिति हासिल कर ली हो।

सवाल यह है कि क्या दोनों की जरूरत एक जैसी है?

यही वह बिंदु है जहां आरक्षण के भीतर लक्षित लाभ की मांग जोर पकड़ती है।लेकिन इसके विरोध में भी मजबूत तर्क है—आर्थिक स्थिति सुधरने के बावजूद जाति आधारित सामाजिक भेदभाव समाप्त हो गया, यह मान लेना भी वास्तविकता को सरल बनाना होगा।इसलिए इस बहस का समाधान नारे में नहीं, बल्कि विश्वसनीय सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों में छिपा है।

समाजसेवी संगठनों के सामने भी दो सवाल

सामाजिक न्याय से जुड़े संगठनों के सामने भी इस समय दो विपरीत चिंताएं हैं।एक पक्ष चाहता है कि आरक्षण का लाभ उन परिवारों तक प्राथमिकता से पहुंचे जो आज भी शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अवसरों से सबसे दूर हैं।दूसरा पक्ष आशंकित है कि क्रीमी लेयर के नाम पर कहीं ऐसा तंत्र न बन जाए जो SC/ST समुदायों के सामाजिक पिछड़ेपन को केवल आय के आंकड़े में बदल दे।

इसलिए विशेषज्ञों के एक बड़े हिस्से के लिए रास्ता यह हो सकता है कि पहले व्यापक आंकड़े जुटाए जाएं और फिर तय किया जाए कि आरक्षण के भीतर वास्तविक असमानता कहां है।

विपक्ष के लिए भी चिराग-मांझी विवाद बड़ा अवसर

आरक्षण बिहार की राजनीति की रीढ़ रहा है। ऐसे में विपक्ष इस विवाद को हाथ से जाने देने के मूड में नहीं होगा।RJD और कांग्रेस के सामने अब दोहरी चुनौती है।एक ओर उन्हें आरक्षण के संरक्षण की अपनी राजनीति को मजबूत करना है।

दूसरी ओर आरक्षित वर्गों के भीतर मौजूद उस असंतोष को भी संबोधित करना है, जिसमें कुछ समूह लंबे समय से यह शिकायत करते रहे हैं कि आरक्षण का लाभ कुछ अपेक्षाकृत मजबूत जातियों या परिवारों में अधिक केंद्रित रहा है।

यदि विपक्ष केवल ‘आरक्षण खतरे में है’ का नारा देता है, तो मांझी खेमे का सवाल उसके सामने खड़ा रहेगा—अगर आरक्षण सुरक्षित है तो उसका लाभ सबसे वंचित व्यक्ति तक पहुंचाने की व्यवस्था पर बात क्यों नहीं?-

BJP और केंद्र की राजनीति के सामने सबसे कठिन संतुलन

केंद्र सरकार के लिए भी यह मामला बेहद संवेदनशील है।एक तरफ चिराग पासवान जैसे सहयोगी नेता हैं, जो आरक्षण में किसी भी बदलाव के खिलाफ कड़ा रुख अपना रहे हैं।दूसरी तरफ NDA के भीतर ही जीतन राम मांझी जैसे नेता हैं, जो आरक्षण के लाभ के वितरण पर सवाल उठा रहे हैं।

इसके अलावा देशभर में अलग-अलग सामाजिक समूहों की अपनी-अपनी मांगें हैं।ऐसे में केंद्र के सामने सबसे सुरक्षित रास्ता फिलहाल यही दिखाई देता है कि वह बिना पर्याप्त आंकड़ों और व्यापक राजनीतिक-सामाजिक सहमति के SC-ST आरक्षण में कोई बड़ा बदलाव न करे।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि आरक्षण के भीतर असमान लाभ की शिकायतों को हमेशा के लिए नजरअंदाज किया जा सकता है।-

क्या चिराग को डर है कि ‘समीक्षा’ उनकी राजनीति बदल देगी ?

यह सवाल अब राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है।

चिराग पासवान का राजनीतिक आधार लंबे समय से दलित अधिकार और सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़ा रहा है। ऐसे में आरक्षण उनके लिए केवल एक नीतिगत मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।यदि भविष्य में आरक्षण की संरचना में कोई बड़ा बदलाव होता है तो आरक्षित वर्ग के भीतर राजनीतिक नेतृत्व का समीकरण भी बदल सकता है।

लेकिन दूसरी ओर यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि क्रीमी लेयर लागू होते ही किसी नेता का राजनीतिक भविष्य समाप्त हो जाएगा।राजनीति केवल आरक्षण से तय नहीं होती।संगठन, नेतृत्व, जनाधार, विकास, गठबंधन और चुनावी रणनीति—इन सबकी भूमिका होती है।इसलिए चिराग का बयान राजनीतिक चेतावनी के रूप में ज्यादा महत्वपूर्ण है, भविष्यवाणी के रूप में कम।-

-‘मिर्ची’ वाले तंज से आगे बढ़ना होगा

पटना के एक वरिष्ठ समाजसेवी की ओर से चिराग पर किया गया तंज भी इसी बहस की राजनीतिक गर्मी को दर्शाता है। उनका सवाल है कि यदि समीक्षा के बाद आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुंचता है जो अभी तक वंचित रहे हैं, तो क्या यह सामाजिक न्याय की जीत नहीं होगी?

लेकिन इस तर्क को भी सावधानी से देखना होगा। किसी नेता पर केवल इसलिए यह आरोप लगाना कि वह आरक्षण का लाभ पाने के कारण समीक्षा से डर रहा है, राजनीतिक आरोप तो हो सकता है, लेकिन इसे तथ्य मानने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी होगा। असल सवाल व्यक्ति नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता है।

अब मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल क्या सरकार केवल यह कहकर आगे बढ़ सकती है कि ‘क्रीमी लेयर नहीं होगी’?

या फिर उसे यह भी बताना होगा कि—आरक्षण का लाभ किन समूहों को कितना मिला?

कौन-से समूह अब भी सबसे पीछे हैं?

क्या सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण का लाभ समान रूप से वितरित हुआ?

क्या उप-वर्गीकरण से वास्तविक रूप से सबसे वंचित लोगों को फायदा पहुंचाया जा सकता है?

इन सवालों के जवाब आंकड़ों से निकलने चाहिए, राजनीतिक दबाव से नहीं।

फैसला जो भी हो, बहस अब रुकेगी नहीं

चिराग पासवान की चेतावनी ने बहस को एक तरफ से तेज कर दिया है।मांझी की मांग ने दूसरी तरफ से सवाल खड़ा कर दिया है।केंद्र सरकार फिलहाल SC-ST में क्रीमी लेयर लागू करने के पक्ष में नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक भूमिका अलग है।विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी में है।

और आरक्षित वर्गों के भीतर सबसे बड़ा सवाल धीरे-धीरे आकार ले रहा है—आरक्षण खत्म होना चाहिए या नहीं—यह बहस अपनी जगह है।

लेकिन क्या आरक्षण का लाभ उस व्यक्ति तक पहुंच रहा है जिसके लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी?

यही वह सवाल है जिसका जवाब आने वाले वर्षों में बिहार से लेकर दिल्ली तक सामाजिक न्याय की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।क्योंकि अब लड़ाई सिर्फ ‘आरक्षण बचाने’ की नहीं है।

लड़ाई यह भी है कि—‘आरक्षण बचे तो उसका सबसे बड़ा हकदार कौन हो?’

और इस सवाल से न चिराग बच सकते हैं, न मांझी, न सरकार और न ही विपक्ष।

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