बी के झा
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लेह / न ई दिल्ली, 30 अगस्त
हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच बसा लद्दाख इन दिनों सिर्फ विकास की नई कहानी नहीं लिख रहा, बल्कि अपनी संवैधानिक पहचान के एक नए अध्याय की दहलीज पर खड़ा दिखाई दे रहा है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजीजू ने लेह में जो संकेत दिए हैं, उनका राजनीतिक अर्थ सामान्य प्रशासनिक घोषणा से कहीं बड़ा है।
उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में लद्दाख के लिए अनुच्छेद 371 के तहत विशेष प्रावधानों को अंतिम रूप देने की दिशा में काम कर रही है। यानी केंद्र अब लद्दाख की विशिष्ट भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियों के लिए एक अलग संवैधानिक ढांचा तैयार करने की राह पर है।
रिजीजू का यह बयान ऐसे समय आया है, जब लद्दाख के राजनीतिक और सामाजिक संगठन लंबे समय से पूर्ण राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल करने, स्थानीय लोगों के लिए संवैधानिक सुरक्षा और निर्वाचित सरकार की मांग कर रहे हैं। लिहाजा असली सवाल यह नहीं है कि केंद्र लद्दाख को कुछ विशेष अधिकार देगा या नहीं, बल्कि यह है कि जो अधिकार दिए जाएंगे, वे लद्दाख की राजनीतिक आकांक्षाओं के लिए पर्याप्त होंगे या नहीं।
371 का दांव क्यों महत्वपूर्ण है?
संविधान का अनुच्छेद 371 अपने आप में कोई एक समान ‘विशेष दर्जा’ नहीं है। इसके अलग-अलग उपबंध अलग-अलग राज्यों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप विशेष व्यवस्थाएं करते हैं। नागालैंड, मिजोरम, सिक्किम और दूसरे राज्यों के लिए बने प्रावधान इसी असममित संघवाद की मिसाल हैं।लद्दाख के मामले में केंद्र जिस मॉडल पर विचार कर रहा है, उसे इसी व्यापक संवैधानिक अवधारणा के अनुरूप समझना होगा।
मई 2026 में केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच 371A, 371F और 371G की तर्ज पर संवैधानिक सुरक्षा देने की दिशा में सैद्धांतिक समझ बनने की खबर सामने आई थी।यही वह बिंदु है जहां मोदी सरकार की राजनीति और लद्दाख की स्थानीय आकांक्षाएं एक-दूसरे से मिलती भी हैं और टकराती भी हैं।
जमीन, संस्कृति और पहचान की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा
रिजीजू ने साफ कहा है कि प्रस्तावित विशेष प्रावधान लद्दाख की संस्कृति और परंपराओं की रक्षा करेंगे। व्यापक तौर पर देखें तो लद्दाख की चिंता केवल सरकारी नौकरियों या विकास परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। यहां सवाल जमीन, रोजगार, स्थानीय संसाधनों, सांस्कृतिक पहचान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का है।
लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था। उस समय क्षेत्र के एक बड़े हिस्से ने इसे लंबे समय से चली आ रही मांग की पूर्ति के रूप में देखा था। लेकिन बाद के वर्षों में यही सवाल उठने लगा कि केंद्रशासित प्रदेश तो मिल गया, मगर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व कितना मिला?
यहीं से राज्य hood और छठी अनुसूची की मांग ने जोर पकड़ा।
लद्दाख के नेताओं की मांग अभी भी 371 से बड़ी
यहां सरकार के दावे और स्थानीय नेतृत्व की मांग के बीच अंतर समझना बेहद जरूरी है।लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस जैसे प्रमुख समूहों ने अगस्त में केंद्र के सामने निर्वाचित विधानसभा, मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली व्यवस्था, वित्तीय और विधायी अधिकार, पुलिस एवं कानून-व्यवस्था पर अधिक नियंत्रण और अलग पब्लिक सर्विस कमीशन जैसी मांगें रखीं।
उन्होंने केंद्र के प्रस्तावित टेरिटोरियल काउंसिल मॉडल पर भी आपत्ति जताई। यानी स्थानीय नेतृत्व का संदेश साफ है—सिर्फ विकास नहीं, अधिकार भी चाहिए।और यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू है।
विपक्ष के लिए भी यह बड़ा राजनीतिक सवाल
कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के लिए लद्दाख का मुद्दा केंद्र की 2019 की जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन नीति से सीधे जुड़ा हुआ है।
विपक्ष लंबे समय से यह सवाल उठाता रहा है कि जिस क्षेत्र को पहले राज्य के हिस्से के रूप में राजनीतिक प्रतिनिधित्व हासिल था, उसे केंद्रशासित प्रदेश बनाने के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं का स्वरूप कमजोर क्यों हुआ।
हालांकि फिलहाल उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में विपक्षी दलों की ओर से रिजीजू के इस 29 अगस्त वाले बयान पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए किसी नेता के नाम से ऐसी प्रतिक्रिया जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
लेकिन राजनीतिक रूप से विपक्ष के सामने अब एक नया प्रश्न जरूर खड़ा होगा—अगर सरकार वास्तव में लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा देने जा रही है तो क्या वह लद्दाख के प्रतिनिधियों की मूल मांगों—विधानसभा और व्यापक राजनीतिक अधिकारों—को भी इसमें शामिल करेगी?
संविधान विशेषज्ञों की नजर में असली कसौटी
संवैधानिक दृष्टि से देखें तो लद्दाख के लिए विशेष प्रावधान तैयार करना भारतीय संघवाद की उस परंपरा का हिस्सा हो सकता है, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप अलग संस्थागत व्यवस्था बनाई जाती है।लेकिन किसी भी नए प्रावधान की सफलता सिर्फ उसके नाम से तय नहीं होगी।
असली सवाल होगा कि कानून में कितनी शक्ति दी जाती है, किस संस्था को दी जाती है और उस शक्ति पर अंतिम नियंत्रण किसका रहता है।यदि सुरक्षा केवल सांस्कृतिक और भूमि संरक्षण तक सीमित रहती है, लेकिन बजट, प्रशासन, कानून बनाने और स्थानीय अधिकारियों पर निर्वाचित प्रतिनिधियों का प्रभाव सीमित रहता है, तो लद्दाख का राजनीतिक वर्ग इसे अधूरा समाधान कह सकता है।
इसके विपरीत यदि विशेष संवैधानिक व्यवस्था के साथ मजबूत निर्वाचित संस्थाएं, स्थानीय रोजगार और संसाधनों की सुरक्षा तथा पर्याप्त वित्तीय अधिकार दिए जाते हैं, तो यह भारत के ‘असमान लेकिन न्यायपूर्ण संघवाद’ का एक नया मॉडल बन सकता है।
हाई कोर्ट बेंच—छोटा फैसला, बड़ा असर
इसी बीच लद्दाख के लिए एक और महत्वपूर्ण फैसला जमीन पर उतर रहा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 27 अगस्त को ऐसा विनियमन जारी किया है, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट की बेंच लद्दाख में बैठ सकेगी। इससे स्थानीय लोगों को उच्च न्यायालय की कार्यवाही के लिए बाहर जाने की व्यावहारिक परेशानी कम होगी।
यह फैसला भले संवैधानिक विशेष दर्जे जितना बड़ा राजनीतिक मुद्दा न हो, लेकिन प्रशासनिक न्याय के लिहाज से इसका महत्व कम नहीं है।लद्दाख जैसे दुर्गम और विशाल भूगोल वाले क्षेत्र में न्याय तक पहुंच सिर्फ कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि वास्तविक सुविधा का भी सवाल है।
यही कारण है कि हाई कोर्ट बेंच को स्थानीय स्तर पर लंबे समय से चली आ रही मांग की पूर्ति माना जा रहा है।
सात जिले, सात परिषदें और बदलता प्रशासनिक नक्शा
रिजीजू ने लद्दाख में सात जिलों और सात परिषदों की दिशा में आगे बढ़ने की बात भी कही है। केंद्र पहले ही प्रशासनिक विस्तार की दिशा में कदम उठा चुका है। सरकार का तर्क है कि इससे दूरदराज के क्षेत्रों तक प्रशासन और विकास योजनाओं की पहुंच बढ़ेगी।
लेकिन यहां भी एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न मौजूद है—प्रशासन को जनता के करीब ले जाना और सत्ता को जनता के हाथ में देना, दोनों एक ही बात नहीं हैं।
जिला मुख्यालय बढ़ सकते हैं,
सड़कें बन सकती हैं,
इंटरनेट पहुंच सकता है,
लेकिन यदि स्थानीय जनता को नीति निर्माण में निर्णायक भूमिका नहीं मिलती तो विकास और लोकतंत्र के बीच की दूरी बनी रह सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी का संभावित दौरा क्यों अहम?
रिजीजू ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लद्दाख के लोगों से मिलना चाहते हैं और उनका दौरा जल्द हो सकता है।अगर यह दौरा होता है तो इसे केवल विकास परियोजनाओं के उद्घाटन या राजनीतिक कार्यक्रम के तौर पर देखना मुश्किल होगा। प्रधानमंत्री का लद्दाख जाना और उसी समय 371 के विशेष प्रावधान की रूपरेखा सामने आना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संदेश देगा।
मोदी सरकार के लिए यह मौका होगा कि वह सीधे लद्दाख की जनता के सामने बताए कि 2019 के बाद की नई व्यवस्था अब किस दिशा में जा रही है।लेकिन असली सवाल अभी बाकी है…लद्दाख को विशेष संवैधानिक सुरक्षा देना निश्चित रूप से एक बड़ा कदम हो सकता है। मगर इसे अंतिम समाधान मान लेना जल्दबाजी होगी।
क्योंकि लद्दाख के आंदोलन की बुनियाद केवल संस्कृति बचाने पर नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी पर भी टिकी है।
अगस्त में लद्दाख के प्रतिनिधियों ने साफ तौर पर विधानसभा और मुख्यमंत्री वाली व्यवस्था की मांग रखी है और चेतावनी दी है कि यदि प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी तो राज्य hood और छठी अनुसूची की मांग फिर तेज हो सकती है।
यही कारण है कि आने वाले दिनों में मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती घोषणा करना नहीं, बल्कि विश्वास पैदा करना होगी।
राजनीतिक विश्लेषण: ‘371’ सरकार की जीत तभी, जब लद्दाख इसे अपनी जीत माने
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में केंद्र ने लद्दाख के सवाल को अब केवल प्रशासनिक समस्या की तरह देखने के बजाय संवैधानिक समाधान की दिशा में ले जाने का संकेत दिया है। यह सरकार के लिए रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि लद्दाख सीमा सुरक्षा, चीन से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा और भारत की सामरिक स्थिति के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है।
लेकिन लोकतंत्र में केवल रणनीतिक महत्व पर्याप्त नहीं होता। स्थानीय समाज का भरोसा भी उतना ही जरूरी है।इसलिए मोदी सरकार के सामने अब तीन मोर्चे हैं—विकास, संवैधानिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व।
पहले मोर्चे पर सरकार अपने काम गिना सकती है।
दूसरे मोर्चे पर 371 का प्रस्ताव सामने है।
मगर तीसरे मोर्चे—राजनीतिक अधिकार—पर अभी अंतिम तस्वीर साफ नहीं है।
यही वजह है कि लद्दाख की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।लेह से निकला 371 का संदेश अगर जमीन, संस्कृति और रोजगार की सुरक्षा के साथ लोकतांत्रिक अधिकारों तक पहुंचता है, तो यह सिर्फ लद्दाख की तस्वीर नहीं बदलेगा, बल्कि भारतीय संघवाद में एक नई मिसाल भी कायम कर सकता है।
लेकिन अगर संवैधानिक सुरक्षा और स्थानीय राजनीतिक अधिकारों के बीच दूरी बनी रही, तो पहाड़ों की यह मांग फिर सियासी तूफान बनकर लौट सकती है।
