आरक्षण पर बिहार में फिर सियासी संग्राम, चिराग बोले- अधिकारों में कटौती नहीं; मंगनी लाल मंडल का पलटवार- समीक्षा से डर क्यों?

बी के झा

NSK news Ind

पटना, 1 सितंबर

बिहार की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सियासी तापमान बढ़ाने लगा है। अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) आरक्षण के मौजूदा प्रावधानों की समीक्षा होनी चाहिए या नहीं, इसे लेकर सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक नेताओं के सुर अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ केंद्रीय मंत्री और लोजपा (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान साफ शब्दों में कह रहे हैं कि किसी भी वर्ग के मौजूदा अधिकारों में कटौती स्वीकार नहीं की जाएगी, तो दूसरी तरफ राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल ने आरक्षण की समय-समय पर समीक्षा को जरूरी बताते हुए सवाल खड़ा कर दिया है कि समीक्षा की बात से आखिर आपत्ति क्यों होनी चाहिए।

इस सियासी बहस में अब बिहार सरकार के एससी-एसटी कल्याण मंत्री लखेन्द्र कुमार रौशन की एंट्री ने विवाद को और तीखा कर दिया है। उन्होंने चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दोनों पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि दलित राजनीति के नाम पर दोनों नेताओं ने अपने परिवार के विकास पर ज्यादा ध्यान दिया।

वहीं, राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने दोनों पक्षों के बीच संतुलन साधते हुए कहा कि बहस आरक्षण में कटौती की नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से पिछड़े लोगों को आगे बढ़ाने की होनी चाहिए।

चिराग का दो टूक संदेश- किसी का हक छीनकर दूसरे को देना मंजूर नहीं

लोजपा (रामविलास) अध्यक्ष चिराग पासवान ने आरक्षण को लेकर अपना रुख दोहराते हुए कहा कि जिन वर्गों को संविधान और मौजूदा व्यवस्था के तहत अधिकार मिले हुए हैं, वे सुरक्षित रहने चाहिए। किसी दूसरे वर्ग की मांग पूरी करने के लिए पहले से मिले अधिकारों में कटौती को वह स्वीकार नहीं करेंगे।पत्रकारों से बातचीत में चिराग ने कहा कि वह किसी वर्ग के साथ अन्याय नहीं होने देंगे।

उनके मुताबिक कुछ लोग एक ही सामाजिक वर्ग के लोगों के बीच मतभेद पैदा कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं।चिराग ने अपने पुराने राजनीतिक रुख को दोहराते हुए कहा कि उनकी राजनीति जाति के बजाय ‘जमात’ को साथ लेकर चलने की है। उन्होंने कहा कि समाज के हर वर्ग की अपनी समस्याएं और शिकायतें हो सकती हैं। सामान्य वर्ग और ऊंची जातियों के लोगों की परेशानियों को भी सरकार को सुनना चाहिए और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए। उनका संदेश साफ था- किसी का अधिकार छीनकर दूसरे को देना सामाजिक न्याय नहीं हो सकता।

मांझी के बाद मंगनी लाल मंडल ने भी चिराग को घेरा

आरक्षण पर चिराग पासवान के रुख को लेकर अब केवल जीतन राम मांझी ही सवाल नहीं उठा रहे हैं। राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल ने भी चिराग की आपत्ति पर सवाल खड़ा कर दिया।मंडल ने कहा कि आरक्षण संवैधानिक अधिकार है और समय-समय पर इसकी समीक्षा होनी चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि अगर समीक्षा की बात हो रही है तो इसमें परेशानी क्या है।उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि समीक्षा का अर्थ आरक्षण खत्म करना नहीं है। मंडल के मुताबिक आरक्षण व्यवस्था बनी रहेगी और इसे समाप्त नहीं किया जा सकता।

उन्होंने मंडल आयोग के दौर का उदाहरण देते हुए कहा कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू किए जाने के समय भी देश में जबरदस्त विरोध हुआ था, लेकिन अंततः यह व्यवस्था आगे बढ़ी।

यही वह बिंदु है जहां बिहार की आरक्षण राजनीति में नया सवाल खड़ा हो गया है-

क्या आरक्षण की समीक्षा का अर्थ आरक्षण में कटौती है, या फिर इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे जरूरतमंद तबकों तक पहुंच रहा है या नहीं?

लखेन्द्र रौशन का हमला- दलित नेता बनने की होड़

आरक्षण की इस बहस को बिहार सरकार के एससी-एसटी कल्याण मंत्री लखेन्द्र कुमार रौशन ने और ज्यादा राजनीतिक बना दिया। उन्होंने केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और चिराग पासवान दोनों पर निशाना साधते हुए कहा कि केंद्र में मंत्री रहते हुए दोनों नेताओं को मालूम है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रहते आरक्षण को कोई छू नहीं सकता।रौशन ने आरोप लगाया कि आरक्षण के मुद्दे को लेकर दलित समाज का नेता बनने की होड़ मची हुई है।

उन्होंने कहा कि केवल आरक्षण का मुद्दा उठाने से कोई दलितों का नेता नहीं बन जाता। इसके लिए ईमानदारी से समाज के कमजोर तबकों के लिए काम करना जरूरी है।उन्होंने चिराग और मांझी की राजनीति पर परिवारवाद का आरोप लगाते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने अपने परिवार के विकास पर ध्यान दिया है। उन्होंने सवाल किया कि यदि वे वास्तव में दलित समाज के व्यापक हित की बात करते हैं तो क्या वे अपने परिवार से बाहर निकलकर समाज के दूसरे वंचित लोगों को मुख्यधारा की राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं?

रौशन ने मांझी के उस तर्क पर भी सवाल उठाया जिसमें दलित समाज की कई जातियों के पिछड़े रहने की बात कही जाती है। उन्होंने पूछा कि क्या मुसहर समुदाय जैसे अत्यंत वंचित तबकों से आने वाले लोगों को भी मुख्यधारा की राजनीति में पर्याप्त अवसर दिलाया जाएगा?

दिलीप जायसवाल ने साधा संतुलन

जहां एक तरफ बयानबाजी तेज होती जा रही है, वहीं बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने मामले को अलग नजरिए से देखने की कोशिश की।उन्होंने कहा कि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दोनों अपनी जगह सही हैं। उनके मुताबिक आरक्षण में कटौती की बहस खड़ी करने के बजाय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जो लोग वास्तव में पिछड़े हैं, उन्हें आगे बढ़ने का अवसर मिले।

जायसवाल ने कहा कि जिस जाति या वर्ग को जितना आरक्षण प्राप्त है, उसमें कटौती की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यदि एससी-एसटी वर्ग के भीतर कुछ समुदाय अभी भी अत्यंत पिछड़े हैं तो उनकी स्थिति पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। जो लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे निकल चुके हैं, उन्हें भी समाज के सबसे पिछड़े लोगों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभानी चाहिए।

असली सवाल- आरक्षण के भीतर असमानता पर बहस कब?

बिहार में छिड़ी यह सियासी लड़ाई केवल चिराग पासवान बनाम मंगनी लाल मंडल या मांझी बनाम चिराग की लड़ाई नहीं रह गई है। इसके केंद्र में अब एक बड़ा सवाल है- क्या आरक्षण का लाभ सभी पात्र वर्गों तक समान रूप से पहुंच रहा है?

एक पक्ष को आशंका है कि ‘समीक्षा’ जैसे शब्द आगे चलकर आरक्षण के मौजूदा अधिकारों को कमजोर करने का रास्ता खोल सकते हैं। यही कारण है कि चिराग पासवान जैसे नेता अधिकारों में किसी भी प्रकार की कटौती का विरोध कर रहे हैं।

दूसरा पक्ष मानता है कि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को आगे लाना है। इसलिए यह देखना भी जरूरी है कि दशकों से आरक्षण का लाभ लेने के बाद भी कौन से समुदाय लगातार पीछे रह गए हैं और किन तबकों तक इसका लाभ अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पाया।

बिहार की राजनीति में आरक्षण क्यों बन रहा है बड़ा मुद्दा?

बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से निर्णायक रहे हैं। ऐसे में आरक्षण का सवाल केवल सामाजिक न्याय की नीतियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे राजनीतिक प्रतिनिधित्व, वोट बैंक और सामाजिक नेतृत्व से जुड़ जाता है।चिराग पासवान का ‘किसी का अधिकार नहीं छीनने’ वाला रुख उनके लिए दलित राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत करने का संदेश है।

वहीं, मांझी और अब मंगनी लाल मंडल की ओर से समीक्षा की वकालत उस बहस को हवा दे रही है जिसमें आरक्षण के भीतर भी वंचित तबकों तक लाभ पहुंचाने की बात की जा रही है।

लखेन्द्र रौशन का हमला इस विवाद को एक अलग राजनीतिक मोड़ देता है। उन्होंने आरक्षण की बहस को नेताओं के व्यक्तिगत और पारिवारिक राजनीतिक प्रभाव से जोड़ दिया है।ऐसे में आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है। क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि आरक्षण रहेगा या नहीं, बल्कि असली राजनीतिक लड़ाई इस बात पर दिखाई दे रही है कि आरक्षण का लाभ किसे, कितना और किस आधार पर मिले।

फिलहाल तीन अलग-अलग सुर, एक बड़ा राजनीतिक सवाल

चिराग पासवान: मौजूदा अधिकारों में कटौती नहीं होनी चाहिए और किसी वर्ग के साथ अन्याय नहीं होने देंगे।

मंगनी लाल मंडल: आरक्षण संवैधानिक अधिकार है, लेकिन समय-समय पर इसकी समीक्षा में परेशानी क्या है?

लखेन्द्र कुमार रौशन: आरक्षण के नाम पर दलित नेतृत्व की राजनीति करने के बजाय वास्तविक रूप से वंचित लोगों को आगे लाने की जरूरत है।

दिलीप कुमार जैसवाल: आरक्षण में कटौती नहीं, बल्कि जो वास्तव में पिछड़े हैं उन्हें आगे बढ़ाने पर जोर होना चाहिए।

बिहार में आरक्षण पर यह बहस अब केवल बयानों की अदला-बदली नहीं रही।

इसके पीछे सामाजिक न्याय की परिभाषा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण के लाभ के वास्तविक वितरण का सवाल खड़ा हो चुका है।

यही वजह है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिहार की सियासत में और ज्यादा धार पकड़ सकता है।

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