125 साल पुराने हिंदू मंदिर पर चला बुलडोजर या बारिश ने ढहाया? पाकिस्तान में मंदिर की जमीन पर ‘मदरसा कब्जे’ का आरोप, उठे कई गंभीर सवाल; अल्पसंख्यक संगठन बोले- साजिश की जांच हो, हिंदू समुदाय ने मांगा पुनर्निर्माण

बी के झा

NSK news Ind

लाहौर/इस्लामाबाद, 1 सितंबर

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक सदी से भी अधिक पुराने हिंदू मंदिर के ढहाए जाने का मामला अब सिर्फ धार्मिक स्थल की सुरक्षा का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि यह पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की संपत्ति, धार्मिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक जवाबदेही और कट्टरपंथी राजनीति के बीच संबंधों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

नारोवाल जिले के सिराज गांव में स्थित करीब 100 से 125 वर्ष पुराने मंदिर को लेकर दो बिल्कुल अलग-अलग दावे सामने आए हैं। स्थानीय लोगों और अल्पसंख्यक संगठनों का आरोप है कि मंदिर को जानबूझकर गिराया गया ताकि उसकी जमीन को पास के मदरसे में शामिल किया जा सके।

दूसरी ओर पाकिस्तान के Evacuee Trust Property Board (ETPB) के वरिष्ठ अधिकारी राणा इफ्तिखार का कहना है कि मंदिर भारी बारिश के कारण ढह गया।

मामले की गंभीरता इसलिए बढ़ गई है क्योंकि मंदिर करीब 1,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ था और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ने दावा किया है कि मंदिर से मलबा, ईंटें और शिखर की धातु की सामग्री भी बाद में वहां से हटा दी गई।

21 अगस्त को क्या हुआ था?

रिपोर्टों के मुताबिक मंदिर 21 अगस्त को ढहाया गया। पाकिस्तान के अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाली Pakistan Masiha Millat Party (PMMP) ने आरोप लगाया है कि मंदिर को धार्मिक कट्टरपंथियों ने निशाना बनाया और इसके पीछे पास के मदरसे की जमीन बढ़ाने की कोशिश थी।

PMMP अध्यक्ष असलम परवेज सहोत्रा ने पंजाब के अतिरिक्त गृह सचिव से मुलाकात कर पूरे मामले में कार्रवाई की मांग की है। उनका आरोप है कि मंदिर से संबंधित सामग्री हटाई गई और प्रशासन ने धार्मिक स्थल की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की।कुछ स्थानीय लोगों और अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों ने कथित तौर पर इस घटना के पीछे प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) से जुड़े लोगों की भूमिका का आरोप लगाया है।

हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए इसे जांच के दायरे में आने वाला आरोप ही माना जाना चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल: मंदिर गिरा या गिराया गया?

यही इस पूरे विवाद का केंद्रीय प्रश्न है। पाकिस्तान के ETPB अधिकारी राणा इफ्तिखार ने कहा है कि मंदिर अत्यधिक बारिश के कारण ढह गया। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मंदिर बहुत पुराना था और उसकी उम्र 100 से 125 वर्ष से अधिक थी।उनका कहना है कि मंदिर की जमीन किसी को लीज पर नहीं दी गई थी, हालांकि मंदिर से लगी जमीन मदरसे के लिए लीज पर दी गई थी।इसके ठीक विपरीत PMMP का कहना है कि मंदिर के आसपास संपत्ति कब्जे का विवाद पहले से मौजूद था।

संगठन के अनुसार, ETPB के सियालकोट डिप्टी एडमिनिस्ट्रेटर ने 29 जनवरी 2026 को मदरसे की लीज रद्द करने, कथित अवैध कब्जाधारियों को हटाने और संपत्ति सील करने का आदेश दिया था, लेकिन आरोप है कि उस आदेश को जमीन पर लागू नहीं किया गया।अगर यह दावा सही है, तो सवाल सिर्फ मंदिर गिरने का नहीं, बल्कि यह भी है कि प्रशासनिक आदेश लागू क्यों नहीं हुआ?

कानून की कसौटी पर पाकिस्तान सरकार से सवाल

पाकिस्तान का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करता है। संविधान का अनुच्छेद 20 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 36 राज्य को अल्पसंख्यकों के वैध अधिकारों और हितों की सुरक्षा का दायित्व देता है।यानी मामला अगर केवल एक पुराने भवन के गिरने का भी हो, तब भी प्रशासन की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।

यदि वह वास्तव में संरक्षित धार्मिक संपत्ति थी, तो उसकी जमीन, रिकॉर्ड, कब्जे और सुरक्षा की स्थिति की जांच करना प्रशासन का दायित्व बनता है।और यदि किसी धार्मिक स्थल को जानबूझकर गिराए जाने का आरोप सही साबित होता है, तो मामला और गंभीर हो जाता है—

क्योंकि तब सवाल धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ संपत्ति के अधिकार और कानून के शासन का भी होगा।

दिलचस्प विरोधाभास: पाकिस्तान खुद मंदिरों की सुरक्षा का दावा करता है

इस घटना ने पाकिस्तान सरकार के आधिकारिक दावों और जमीनी विवाद के बीच विरोधाभास भी सामने ला दिया है।पाकिस्तान का ETPB स्वयं कहता है कि उसका दायित्व हिंदू और सिख धार्मिक स्थलों तथा उनसे जुड़ी संपत्तियों की देखरेख करना है।

पाकिस्तान सरकार की वेबसाइट के मुताबिक ETPB धार्मिक और ट्रस्ट संपत्तियों की निगरानी, अवैध कब्जे हटाने और संपत्ति की सुरक्षा का काम करता है।जुलाई 2026 में ETPB के चेयरमैन ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि सरकार अल्पसंख्यकों के पवित्र स्थलों की सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

उसी दौरान ETPB ने हिंदू धार्मिक स्थलों के संरक्षण और जीर्णोद्धार की अपनी भूमिका भी रेखांकित की थी।ऐसे में नरोवाल का मामला एक सीधा प्रशासनिक सवाल खड़ा करता है—

जिस संस्था की जिम्मेदारी ही अल्पसंख्यकों की धार्मिक संपत्ति की रक्षा करना है, उसी की निगरानी में एक सदी से अधिक पुराना मंदिर विवादित परिस्थितियों में कैसे खत्म हो गया?

हिंदू समुदाय में डर, पुनर्निर्माण की मांग

नारोवाल के हिंदू समुदाय के नेता रतन लाल ने मंदिर गिराए जाने की निंदा करते हुए इसके पुनर्निर्माण की मांग की है।उनका आरोप है कि जिला प्रशासन और ETPB मंदिर की सुरक्षा करने तथा कथित कब्जाधारियों को हटाने में नाकाम रहे। उन्होंने यह भी कहा कि मदरसे के वहां मौजूद रहने के कारण हिंदू समुदाय के लोग अब मंदिर स्थल पर जाने से भी डरते हैं।

यह बयान इस घटना को केवल जमीन के विवाद से आगे ले जाता है। किसी अल्पसंख्यक समुदाय का अपने ही धार्मिक स्थल पर जाने से डरना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।

राजनीतिक विश्लेषण: असली मुद्दा मंदिर नहीं, कानून का राज है

राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह घटना तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है।

पहला—धार्मिक बहुसंख्यकवाद बनाम अल्पसंख्यक अधिकार।

जब किसी धार्मिक अल्पसंख्यक की संपत्ति और पूजा स्थल पर विवाद पैदा होता है, तो प्रशासन की निष्पक्षता सबसे बड़ी कसौटी बनती है।

दूसरा—कट्टरपंथी संगठनों का दबाव।यदि TLP से जुड़े लोगों पर लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरपंथ और स्थानीय प्रशासन के बीच शक्ति-संतुलन का गंभीर प्रश्न बनेगा। लेकिन जांच से पहले किसी संगठन को दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा।

तीसरा—राज्य की विश्वसनीयता।सरकार यदि कहती है कि मंदिर बारिश से गिरा, तो उसे निष्पक्ष जांच के जरिए यह साबित करना चाहिए कि ऐसा प्राकृतिक कारणों से हुआ।

वहीं यदि अल्पसंख्यक संगठन विध्वंस का आरोप लगाते हैं, तो उन्हें भी जांच के लिए अपने साक्ष्य उपलब्ध कराने चाहिए।इस विवाद का समाधान बयानबाजी से नहीं, स्वतंत्र जांच, राजस्व रिकॉर्ड, संपत्ति के नक्शे, पुलिस रिपोर्ट, घटनास्थल के साक्ष्य और उपलब्ध वीडियो/फोटो की जांच से होगा।

एक और पेचीदा सवाल: जब लीज रद्द हुई तो कब्जा क्यों नहीं हटा?

इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में एक जनवरी 2026 का कथित ETPB आदेश है। PMMP के अनुसार मदरसे से जुड़ी लीज पहले ही रद्द की जा चुकी थी और अवैध कब्जाधारियों को हटाने तथा संपत्ति सील करने का निर्देश दिया गया था। आरोप है कि यह आदेश लागू नहीं हुआ।यदि सरकारी रिकॉर्ड इसकी पुष्टि करते हैं, तो फिर जांच का अगला सवाल होगा—

क्या प्रशासनिक निष्क्रियता ने बाद की घटना के लिए जमीन तैयार की?

यही वह बिंदु है जहां मामला धार्मिक विवाद से निकलकर गवर्नेंस और प्रशासनिक जवाबदेही का बन जाता है।

भारत सरकार की प्रतिक्रिया पर भी निगाहें

इस घटना के सामने आने के बाद भारत की ओर से किसी शीर्ष संवैधानिक या केंद्रीय सरकारी स्तर की स्पष्ट सार्वजनिक प्रतिक्रिया अभी विश्वसनीय उपलब्ध रिपोर्टों में सामने नहीं आई है। इसलिए भारत सरकार के नाम पर कोई बयान जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

हालांकि, राजनयिक दृष्टि से यह मामला भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान में हिंदू, सिख और अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों की सुरक्षा भारत-पाकिस्तान संबंधों में लंबे समय से संवेदनशील विषय रही है।

भारत के लिए संभावित चिंता केवल एक मंदिर की नहीं, बल्कि यह है कि पाकिस्तान में ऐतिहासिक धार्मिक धरोहरों और अल्पसंख्यक संपत्तियों की सुरक्षा के लिए उसके अपने संस्थागत तंत्र कितने प्रभावी हैं।

विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया भी अभी सामने नहीं

इसी तरह, भारत के प्रमुख विपक्षी दलों की ओर से इस विशेष नरोवाल मंदिर मामले पर कोई स्पष्ट और आधिकारिक प्रतिक्रिया फिलहाल विश्वसनीय रिपोर्टों में उपलब्ध नहीं है।इसलिए कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस या किसी अन्य विपक्षी दल के नाम से प्रतिक्रिया जोड़ना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा।

हालांकि राजनीतिक विमर्श के स्तर पर यह घटना भारत में भी एक बहस जरूर खड़ी कर सकती है—

क्या विदेशों में हिंदू धार्मिक स्थलों पर हमले या कथित कब्जे के मामलों को भारत की विदेश नीति में अधिक प्रमुखता मिलनी चाहिए?

धर्माचार्यों की आवाज: मंदिर केवल ईंट-पत्थर नहीं

धार्मिक दृष्टि से देखें तो किसी मंदिर का महत्व केवल उसके निर्माण में लगी ईंटों या उसकी जमीन के क्षेत्रफल से तय नहीं होता। वह किसी समुदाय की स्मृति, आस्था, परंपरा और पीढ़ियों की धार्मिक पहचान से जुड़ा होता है।भारत के संत समाज के लिए ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह होना चाहिए कि धार्मिक स्थल चाहे किसी भी समुदाय का हो, उसकी रक्षा कानून और सभ्यता दोनों की कसौटी है।

किसी मंदिर के ध्वंस का विरोध हिंदू समुदाय के अधिकारों की रक्षा का विषय है, लेकिन यही सिद्धांत मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या किसी अन्य धर्मस्थल पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए। यही वास्तविक धार्मिक सहिष्णुता की कसौटी है।

पाकिस्तान के लिए भी यह आत्ममंथन का समय

विडंबना देखिए—एक ओर पाकिस्तान का ETPB अपने आधिकारिक मंच पर कहता है कि वह हिंदू और सिख धार्मिक स्थलों की रक्षा, पुनर्स्थापना और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। दूसरी ओर नरोवाल में एक 100-125 साल पुराने मंदिर के अस्तित्व पर ही विवाद खड़ा हो गया है।यदि मंदिर वास्तव में बारिश से गिरा है, तो पाकिस्तान सरकार के पास अपने दावे को प्रमाणित करने का सबसे आसान रास्ता है—

वैज्ञानिक और स्वतंत्र जांच।यदि मंदिर जानबूझकर गिराया गया है, तो दोषियों पर कार्रवाई कर सरकार को यह संदेश देना होगा कि धार्मिक कट्टरपंथी भी कानून से ऊपर नहीं हैं।और यदि जमीन पर अवैध कब्जा था, तो उसे हटाकर मंदिर का पुनर्निर्माण कराना प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है।

सबसे बड़ा सवाल अब यही है—मलबे के नीचे क्या दबा है?

नरोवाल का यह मंदिर भले ही मलबे में बदल गया हो, लेकिन उसके साथ कई सवाल खड़े हो गए हैं।

क्या यह प्राकृतिक आपदा में गिरा पुराना ढांचा था?

या फिर किसी धार्मिक स्थल को हटाकर उसकी जमीन पर कब्जे की कोशिश हुई?

क्या जनवरी 2026 का कथित ETPB आदेश वास्तव में जारी हुआ था?

अगर हुआ था तो उस पर अमल क्यों नहीं हुआ?

मंदिर के मलबे और धातु सामग्री को हटाने की शिकायत सही है तो उसे किसने हटाया?

और सबसे अहम—क्या पाकिस्तान सरकार इस मामले की ऐसी स्वतंत्र जांच कराने को तैयार है, जिस पर खुद वहां का हिंदू अल्पसंख्यक भी भरोसा कर सके?

इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि नरोवाल की घटना महज एक जर्जर इमारत के गिरने की कहानी है या पाकिस्तान में अल्पसंख्यक धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा पर एक और गंभीर अध्याय।

फिलहाल इतना जरूर स्पष्ट है कि एक सदी से अधिक पुराना मंदिर अब नहीं है, लेकिन उसके मलबे से उठे सवाल अभी जिंदा हैं।

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