बिहार में ग्रामीण मकानों पर होल्डिंग टैक्स का फैसला पलटेगी सरकार? 8 करोड़ लोगों को राहत की तैयारी, विपक्ष के मुद्दे की निकली हवा

बी के झा

NSK news Ind

पटना, 7 सितंबर

बिहार की सम्राट चौधरी सरकार ग्रामीण आबादी को बड़ी राहत देने की तैयारी में है। गांवों और कस्बों में रहने वाले लोगों के पक्के और अर्धपक्के मकानों से प्रस्तावित होल्डिंग टैक्स वसूलने का फैसला वापस लेने की तैयारी की जा रही है। सरकार के इस संभावित कदम से ग्रामीण बिहार के करीब 8 करोड़ से अधिक लोगों को राहत मिलने का दावा किया जा रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि जिस कर व्यवस्था को पंचायतों की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया था, उसके खिलाफ गांवों में नाराजगी सामने आने लगी थी। विपक्ष को भी सरकार को घेरने के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार मिल गया था। ऐसे में सरकार का प्रस्तावित संशोधन केवल वित्तीय फैसला नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।

फिलहाल नए प्रावधानों का गजट प्रकाशित नहीं हुआ है और पंचायती राज विभाग की ओर से अधिसूचना भी जारी नहीं की गई है। यानी प्रस्तावित व्यवस्था में बदलाव की प्रक्रिया अभी पूरी तरह औपचारिक रूप नहीं ले पाई है।

गांव के घर पर टैक्स का विचार आया कहां से?

सरकार ने पंचायतों की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के उद्देश्य से ग्रामीण क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार के कर और शुल्क लगाने का फैसला किया था। 15 जुलाई को राज्य कैबिनेट ने इससे संबंधित प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।प्रस्ताव के तहत पक्के मकान पर सालाना 100 रुपये और अर्धपक्के मकान पर 50 रुपये होल्डिंग टैक्स का प्रावधान था। कच्चे मकानों को इससे बाहर रखा गया था।

पीएम आवास योजना के तहत बने मकानों के लिए भी सालाना 25 रुपये का प्रावधान किया गया था, जिसकी राशि संबंधित विभाग द्वारा दिए जाने की बात थी।इसके अलावा सफाई और जलापूर्ति जैसे शुल्क भी प्रस्तावित किए गए थे।लेकिन सरकार को जल्द ही यह महसूस हुआ कि ग्रामीण परिवारों के बीच इस फैसले को लेकर असंतोष पैदा हो रहा है। खासकर किसान, मजदूर और निम्न आय वर्ग के परिवारों को लगा कि सरकार घर पर नया आर्थिक बोन डालने जा रही है।

अब सरकार क्या बदलने जा रही है?

पंचायती राज विभाग ग्रामीणों से शुल्क वसूली के प्रावधानों में संशोधन की तैयारी कर रहा है। प्रस्तावित बदलाव के बाद आवासीय मकानों से होल्डिंग टैक्स नहीं लेने की व्यवस्था लागू की जा सकती है।हालांकि इसका अर्थ यह नहीं होगा कि पंचायतों के पास कर वसूलने का अधिकार पूरी तरह खत्म हो जाएगा।व्यावसायिक, औद्योगिक और संस्थागत उपयोग वाले भवनों पर कर लगाने का अधिकार पंचायतों के पास रहेगा। यानी गांव में रहने वाले सामान्य परिवार के घर और गांव में चल रहे व्यावसायिक प्रतिष्ठान को एक ही नजर से नहीं देखा जाएगा।यही बदलाव सरकार के फैसले को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण बना देता है।

सरकार के सामने दोहरी चुनौती—पंचायत की कमाई भी बढ़े, जनता पर बोझ भी न पड़े

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक सरकार के सामने असली चुनौती दो विपरीत लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने की है।एक तरफ पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। दूसरी तरफ ग्रामीण परिवारों पर ऐसे समय में अतिरिक्त कर का बोझ नहीं डाला जा सकता, जब ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले से कृषि लागत, रोजगार और आय से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है।यही कारण है कि सरकार अब ‘घर पर टैक्स नहीं, कारोबार पर टैक्स’ की दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।राजनीतिक तौर पर यह रणनीति ज्यादा सुरक्षित भी है। ग्रामीण मतदाता के घर को सीधे कर के दायरे में लाने के बजाय व्यावसायिक गतिविधियों से राजस्व जुटाना सरकार के लिए कम विवादित विकल्प हो सकता है।

शिक्षाविदों का नजरिया: पंचायतों को मजबूत करना जरूरी, लेकिन तरीका भी न्यायपूर्ण हो

शिक्षा और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों की सामान्य राय यह रही है कि पंचायतों को आर्थिक रूप से मजबूत किए बिना वास्तविक विकेंद्रीकरण संभव नहीं है।लेकिन सवाल यह है कि पंचायतों की आय बढ़ाने के लिए सबसे पहले किससे पैसा लिया जाए?

एक गरीब ग्रामीण परिवार के मकान से 50 या 100 रुपये सालाना वसूलना राशि के लिहाज से बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया, वसूली तंत्र और बार-बार भुगतान की स्थिति ग्रामीणों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।इसके विपरीत व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से कर वसूलना पंचायतों के लिए अपेक्षाकृत अधिक राजस्व पैदा कर सकता है।यानी बहस केवल टैक्स की दर की नहीं, बल्कि कर के सामाजिक न्याय की भी है।

कानूनविदों के लिए सबसे बड़ा सवाल—कर लगाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होगी?

कानूनी विशेषज्ञों के नजरिए से पंचायतों को कर लगाने का अधिकार कानून और अधिसूचना के स्पष्ट प्रावधानों के तहत ही प्रयोग करना होगा। कर की दर, दायरा, वसूली की प्रक्रिया, अपील की व्यवस्था और भुगतान न करने की स्थिति में कार्रवाई—इन सभी को स्पष्ट करना जरूरी होगा।इस मामले में सरकार की ओर से अभी अंतिम अधिसूचना जारी नहीं हुई है। इसलिए प्रस्तावित संशोधन के बाद वास्तविक व्यवस्था क्या होगी, यह गजट अधिसूचना सामने आने के बाद ही स्पष्ट माना जाएगा।

कानून का मूल सिद्धांत भी यही है कि नागरिक पर आर्थिक दायित्व स्पष्ट कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही डाला जाए।

समाजसेवी संगठनों के लिए असली मुद्दा—गरीब के घर और कारोबारी प्रतिष्ठान में फर्क

ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं के नजरिए से भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है।एक तरफ ऐसा परिवार है जिसके पास रहने के लिए मुश्किल से पक्का मकान है, दूसरी तरफ उसी पंचायत में होटल, पेट्रोल पंप, विवाह भवन, चावल मिल या अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान लाखों रुपये का कारोबार करते हैं।ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि पंचायत की वित्तीय जरूरत पूरी करने का बोझ किस पर डाला जाना चाहिए?

अगर सरकार गरीब और सामान्य आवासीय परिवारों को कर से बाहर रखकर बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों से राजस्व जुटाती है तो इसे सामाजिक रूप से अधिक स्वीकार्य मॉडल माना जा सकता है।

विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा था ग्रामीण टैक्स

सरकार के मूल फैसले के बाद विपक्ष को ग्रामीण इलाकों में सरकार को घेरने का मौका मिला था। राजनीतिक रूप से यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील था क्योंकि बिहार की बड़ी आबादी गांवों में रहती है।विपक्ष अगर इसे ‘गरीब के घर पर टैक्स’ के रूप में प्रचारित करता तो सरकार को गांव-गांव जाकर इसका राजनीतिक बचाव करना पड़ सकता था।ऐसे में संशोधन का फैसला विपक्ष के इस हमले की धार को काफी हद तक कम कर सकता है।

हालांकि विपक्ष के सामने अब नया सवाल होगा—अगर सरकार ने मकानों से कर हटाने का फैसला किया है तो पंचायतों की आय बढ़ाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी?

यानी सरकार एक राजनीतिक संकट से निकलकर अब वित्तीय चुनौती के सामने खड़ी होगी। 16वें वित्त आयोग की सिफारिश भी चर्चा में पंचायतों की अपनी आय बढ़ाने की बहस केवल बिहार तक सीमित नहीं है।

स्थानीय निकायों को अधिक वित्तीय रूप से सक्षम बनाने की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर होती रही है। सरकार के दिए विवरण के अनुसार, 16वें केंद्रीय वित्त आयोग की सिफारिशों के संदर्भ में पंचायतों द्वारा स्थानीय स्तर पर राजस्व जुटाने पर जोर दिया गया है और प्रति परिवार औसतन लगभग 1,200 रुपये वार्षिक राजस्व जुटाने की दिशा में प्रयास का उल्लेख है।

लेकिन बिहार में यह लक्ष्य गरीब ग्रामीण परिवारों पर सीधे कर लगाकर हासिल किया जाएगा या व्यावसायिक गतिविधियों से राजस्व बढ़ाकर, यही इस पूरे विवाद का मूल प्रश्न बन गया है।इन कारोबारों पर लग सकता है शुल्क प्रस्तावित व्यवस्था में व्यावसायिक, औद्योगिक और संस्थागत उपयोग वाली संपत्तियों को कर के दायरे में रखने की बात कही गई है।

इनमें—- होटल- पेट्रोल पंप- रसोई गैस एजेंसी- सिनेमा हॉल- विवाह भवन- ईंट-भट्ठा- चावल मिल- अन्य व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रतिष्ठान शामिल हो सकते हैं।कुछ मामलों में सालाना शुल्क 100 रुपये से 5,000 रुपये तक निर्धारित किए जाने का प्रावधान था। संशोधन के बाद इनमें भी बदलाव संभव है।

पंचायतों के सामने नई चुनौती अगर आवासीय मकानों से कर हटाया जाता है तो पंचायतों की आय बढ़ाने का लक्ष्य कैसे पूरा होगा?

यही वह सवाल है जिस पर सरकार को अब ठोस रोडमैप देना होगा।सिर्फ टैक्स हटाना राजनीतिक राहत है, लेकिन पंचायतों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना प्रशासनिक जरूरत।अगर पंचायतों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे तो सड़क, नाली, सफाई, स्ट्रीट लाइट, पेयजल और स्थानीय विकास योजनाओं के लिए उन्हें लगातार राज्य और केंद्र सरकार के अनुदान पर निर्भर रहना पड़ेगा।

इसलिए सरकार को एक ऐसी कर नीति बनानी होगी जिसमें गरीब ग्रामीण परिवार सुरक्षित रहें, लेकिन पंचायतों के पास अपनी आय का मजबूत स्रोत भी हो।

NSK विश्लेषण: ‘घर बचा, पंचायत का खजाना कौन भरेगा?

’सम्राट चौधरी सरकार का प्रस्तावित संशोधन राजनीतिक रूप से ‘डैमेज कंट्रोल’ से कहीं अधिक है। यह उस टकराव से बचने की कोशिश भी है जिसमें एक तरफ पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य है और दूसरी तरफ ग्रामीण मतदाता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने का जोखिम।

सरकार ने यदि वास्तव में आवासीय मकानों से होल्डिंग टैक्स वापस लेने का निर्णय किया है तो यह किसान, मजदूर और गरीब परिवारों के लिए राहत भरा कदम होगा।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

अब सरकार को बताना होगा कि पंचायतों की आय का वैकल्पिक मॉडल क्या होगा?

क्या बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से पर्याप्त राजस्व जुटाया जाएगा?

क्या कर वसूली पारदर्शी होगी?क्या पंचायतों के पास वसूले गए पैसे के इस्तेमाल का सामाजिक ऑडिट होगा?

क्या ग्रामीणों को यह जानकारी मिलेगी कि उनके इलाके से कितना कर वसूला गया और कितना विकास पर खर्च हुआ?

क्योंकि लोकतंत्र में सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि ‘कर कितना लिया गया?’

सवाल यह भी होता है कि ‘लिया गया पैसा कहां गया?

’बिहार सरकार के सामने अब यही अगली बड़ी परीक्षा है—ग्रामीण के घर को टैक्स के बोझ से बचाते हुए पंचायत को आर्थिक रूप से मजबूत करना।

अगर सरकार इसमें सफल होती है तो यह फैसला सिर्फ एक कर वापस लेने की कवायद नहीं रहेगा, बल्कि बिहार में ‘जनता पर कम बोझ, स्थानीय निकायों की ज्यादा ताकत’ वाली नई वित्तीय नीति की शुरुआत बन सकता है।

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