बी के झा
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नई दिल्ली, 7 सितंबर
मानचित्र सिर्फ जमीन की लकीरें नहीं होते, कई बार वे कूटनीति, संप्रभुता और राष्ट्रीय हित की भाषा भी बन जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में वैश्विक मानचित्रों को अधिक संतुलित और क्षेत्रफल की दृष्टि से अधिक सटीक बनाने से जुड़े प्रस्ताव पर भारत ने समर्थन तो दिया, लेकिन साथ ही अपनी ‘लक्ष्मण रेखा’ भी बेहद स्पष्ट कर दी।भारत ने संयुक्त राष्ट्र से कहा है कि यदि उसकी पहल के तहत कोई वैश्विक मानचित्र तैयार किया जाता है तो उसमें केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत भारत के संप्रभु क्षेत्र को भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप दिखाया जाना चाहिए।
भारत ने साफ कर दिया कि उसके क्षेत्र का कोई भी गलत, भ्रामक या आधिकारिक स्थिति से अलग चित्रण स्वीकार्य नहीं होगा।विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर उसका रुख स्पष्ट और अडिग है तथा इस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।प्रस्ताव के पक्ष में भारत, लेकिन नक्शे पर समझौता नहीं
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 193 सदस्य देशों ने शुक्रवार को ‘मानचित्र में सुधार: वैश्विक मानचित्रण प्रतिनिधित्व में संतुलन कायम करना और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों, विशेष रूप से अफ्रीका का समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना’ शीर्षक वाले प्रस्ताव को भारी बहुमत से पारित किया।प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने मतदान किया, जबकि अमेरिका ने इसके खिलाफ मतदान किया।
एस्टोनिया,
जॉर्जिया,
लिथुआनिया,
मोल्दोवा,
सर्बिया और यूक्रेन मतदान से अनुपस्थित रहे।
भारत ने प्रस्ताव का समर्थन किया। लेकिन समर्थन करते हुए उसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि प्रस्ताव को भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।यानी नई दिल्ली का संदेश सीधा था—वैश्विक मानचित्रण में सुधार का समर्थन अपनी जगह, लेकिन भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और संप्रभु क्षेत्र के चित्रण पर कोई समझौता नहीं।
आखिर संयुक्त राष्ट्र का यह प्रस्ताव है क्या?
पहली नजर में यह प्रस्ताव मानचित्र से जुड़ा तकनीकी मामला लगता है, लेकिन इसके पीछे वैश्विक प्रतिनिधित्व की एक पुरानी बहस है।दुनिया में लंबे समय से इस्तेमाल किए जाने वाले कई विश्व मानचित्र पृथ्वी की गोलाकार सतह को सपाट कागज पर दिखाने के लिए अलग-अलग प्रक्षेपण पद्धतियों का इस्तेमाल करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि कुछ महाद्वीप और देश वास्तविक आकार की तुलना में बड़े या छोटे दिखाई दे सकते हैं।संयुक्त राष्ट्र महासभा में पारित प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसी ‘इक्वल एरिया’ मानचित्रण पद्धतियों को बढ़ावा देना है, जिनमें विभिन्न भूभागों के आपसी क्षेत्रफल का वास्तविक अनुपात अधिक सटीक रूप से प्रदर्शित हो।
विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि यह प्रस्ताव किसी एक विशेष विश्व मानचित्र या मानचित्रण पद्धति को आधिकारिक तौर पर अपनाने अथवा प्रमाणित करने वाला दस्तावेज नहीं है।
भारत ने क्यों जताई आपत्ति की गुंजाइश?
भारत का रुख इस बात पर केंद्रित है कि दुनिया के किसी भी आधिकारिक या संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मानचित्र में उसके क्षेत्र को गलत तरीके से प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए।जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के लिए लंबे समय से संवेदनशील रणनीतिक और कूटनीतिक विषय रहे हैं। इसलिए नई दिल्ली किसी भी अंतरराष्ट्रीय मानचित्र में अपने क्षेत्र के चित्रण को लेकर विशेष रूप से सतर्क रहती है।
भारत ने इसी संदर्भ में कहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख सहित उसका संप्रभु क्षेत्र भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप प्रदर्शित किया जाना चाहिए।यह बयान महज नक्शे की तकनीकी शुद्धता का मामला नहीं है। इसके पीछे भारत की वह व्यापक कूटनीतिक नीति है जिसमें उसकी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को गैर-परक्राम्य विषय माना जाता है।
‘इक्वल एरिया’ पर भारत का समर्थन क्यों?
भारत ने मतदान के दौरान जिस मूल सिद्धांत पर जोर दिया, वह था—‘इक्वल एरिया’ मानचित्रण।इसका अर्थ सरल शब्दों में यह है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों का क्षेत्रफल मानचित्र पर इस तरह प्रदर्शित किया जाए कि उनके वास्तविक क्षेत्रफल का आपसी अनुपात यथासंभव बना रहे।भारत ने इस सिद्धांत का समर्थन किया है।लेकिन उसने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि भौगोलिक प्रतिनिधित्व की सटीकता और राजनीतिक सीमाओं का प्रश्न दो अलग-अलग विषय हैं।यही अंतर इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक बारीकी है।
भारत ने UN को क्या समझाया?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव किसी विशेष मानचित्र, मानचित्रण पद्धति या किसी देश की राष्ट्रीय सीमाओं के किसी खास चित्रण का समर्थन नहीं करता।उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, विवादित क्षेत्रों या स्थानों के नामों से संबंधित राजनीतिक मानचित्रण का दस्तावेज नहीं है।लेकिन भारत ने अपनी स्थिति अलग से साफ कर दी—यदि भारत को किसी वैश्विक मानचित्र में दिखाया जाता है तो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत उसका संप्रभु क्षेत्र भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप होना चाहिए।
यह अंतर समझना जरूरी है।
संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव तकनीकी मानचित्रण सुधार की बात करता है, जबकि भारत ने अपने राष्ट्रीय हित से जुड़े राजनीतिक मानचित्रण पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है।अमेरिका का अकेला विरोध, भारत का समर्थन प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिलना इस बात का संकेत है कि संयुक्त राष्ट्र के भीतर वैश्विक मानचित्रण में अधिक संतुलित प्रतिनिधित्व को व्यापक समर्थन प्राप्त है।
अमेरिका ने इसके खिलाफ मतदान किया। वहीं कुछ देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।
भारत का समर्थन इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि उसने प्रस्ताव के मूल उद्देश्य—क्षेत्रफल के अधिक सटीक प्रतिनिधित्व—का समर्थन किया, लेकिन अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता के विषय में अलग से स्पष्ट संदेश भी दे दिया।‘नक्शे की लकीर’ से आगे है पूरा विवाद
राजनीतिक विश्लेषकों के नजरिए से देखें तो किसी देश का नक्शा उसकी राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा होता है। मानचित्र में सीमा की एक रेखा भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़ा संदेश दे सकती है।खासकर ऐसे क्षेत्रों में जहां सीमा या क्षेत्रीय दावे को लेकर देशों के बीच विवाद रहे हों, वहां नक्शा केवल भौगोलिक दस्तावेज नहीं रह जाता।भारत के लिए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का मामला इसी श्रेणी में आता है।इसलिए नई दिल्ली का रुख यह है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा तैयार या इस्तेमाल किए जाने वाले मानचित्र में भारत के क्षेत्र को इस तरह नहीं दिखाया जा सकता जिससे उसकी संप्रभुता या क्षेत्रीय अखंडता पर गलत संदेश जाए।
पाकिस्तान और चीन के लिए भी कूटनीतिक संदेश?
भारत के इस बयान को दक्षिण एशियाई और एशियाई भू-राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा सकता है।जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवाद है। वहीं लद्दाख से जुड़े सीमा प्रश्नों के कारण भारत और चीन के संबंधों में भी रणनीतिक संवेदनशीलता बनी हुई है।ऐसे में भारत का यह कहना कि ‘हमारे आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप ही हमारा संप्रभु क्षेत्र दिखाया जाए’, एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के दस्तावेजों या मानचित्रों में उसके क्षेत्रीय दावों के विपरीत कोई चित्रण उसे स्वीकार नहीं होगा।
हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि संयुक्त राष्ट्र का मौजूदा प्रस्ताव स्वयं किसी विवादित क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति तय नहीं करता।
भारत की कूटनीति का नया अंदाज—समर्थन भी, शर्त की स्पष्टता भी
इस घटनाक्रम में भारत की कूटनीतिक रणनीति का एक दिलचस्प पहलू दिखाई देता है।नई दिल्ली ने प्रस्ताव को खारिज नहीं किया। उसने वैश्विक मानचित्रों को अधिक संतुलित और क्षेत्रफल की दृष्टि से अधिक सटीक बनाने के सिद्धांत का समर्थन किया।लेकिन उसने समर्थन को अपनी संप्रभुता की कीमत पर नहीं जाने दिया।
यानी संदेश साफ है—जहां वैश्विक सुधार भारत के हित और व्यापक अंतरराष्ट्रीय उद्देश्य के अनुरूप है, वहां भारत साथ खड़ा है; लेकिन राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सवाल पर उसकी स्थिति अडिग है।
NSK विश्लेषण: नक्शा चाहे UN बनाए, भारत की सीमा की लकीर भारत ही तय करेगा
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी खबर शायद संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव नहीं, बल्कि भारत की प्रतिक्रिया है।
नई दिल्ली ने प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक मानचित्र को अधिक सटीक बनाने की प्रक्रिया भारत की संप्रभुता के प्रश्न को प्रभावित नहीं कर सकती।
यह कूटनीति का वह मॉडल है जिसमें ‘हां’ और ‘नहीं’ दोनों एक साथ मौजूद हैं।
मानचित्रण सुधार को हां।
क्षेत्रफल की सटीकता को हां।
लेकिन भारत के क्षेत्र का गलत या भ्रामक चित्रण—बिल्कुल नहीं।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सामने अपनी स्थिति फिर से दोहरा दी है। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किसी क्षेत्र का नक्शे में चित्रण कई बार राजनीतिक संदेश का रूप ले लेता है।
भारत का मूल संदेश यही है कि उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता नहीं होगा।
और कूटनीति की भाषा में यही सबसे महत्वपूर्ण लकीर है—दुनिया का नक्शा कितना भी बदले, भारत अपने क्षेत्र की संवैधानिक और आधिकारिक सीमाओं के चित्रण पर अपनी शर्त से पीछे नहीं हटेगा।
