बी के झा
NSK news Ind

नई दिल्ली, 7 सितंबर
दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत के भरभराकर गिरने से सात लोगों की मौत ने राजधानी की उस चमकदार तस्वीर के पीछे छिपे अंधेरे को सामने ला दिया है, जहां हजारों छात्र पढ़ाई और बेहतर भविष्य का सपना लेकर आते हैं। हादसे ने सिर्फ एक इमारत नहीं गिराई, बल्कि दिल्ली के छात्र-आवासों की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।सवाल अब यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी?
सवाल इससे बड़ा है—क्या दिल्ली में छात्रों से हजारों रुपये किराया लेने वाली इन इमारतों में उनकी जिंदगी की कीमत भी तय है?
हादसे के बाद प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी है। पुलिस ने मामला दर्ज किया है और भवन मालिक की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। MCD ने दक्षिणी क्षेत्र के डिप्टी कमिश्नर समेत पांच अधिकारियों को निलंबित किया है।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अगर नियमों का उल्लंघन पहले से था, तो कार्रवाई हादसे से पहले क्यों नहीं हुई?
घटनास्थल के सामने मिला एक और ‘खतरा’
NSK की ग्राउंड पड़ताल में घटनास्थल के ठीक सामने स्थित एक अन्य पांच मंजिला इमारत की तस्वीर भी चिंता पैदा करती है। यह इमारत किराये पर दी गई है और इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को अलग-अलग कमरे उपलब्ध कराए जाते हैं। हमारी टीम जब इस इमारत के भीतर पहुंची तो सामने आई तस्वीरों ने कई सवाल खड़े कर दिए।
संकरी सीढ़ियां।
एक ही प्रवेश और निकास का रास्ता।
आपात स्थिति में लोगों के तेजी से बाहर निकलने की सीमित संभावना। यानी अगर अचानक आग लग जाए, भगदड़ हो या कोई अन्य आपदा आए तो एक साथ बड़ी संख्या में छात्रों के बाहर निकलने की व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी, यह गंभीर सवाल है।
हालांकि किसी इमारत को कानूनी रूप से असुरक्षित घोषित करने का अंतिम अधिकार सक्षम एजेंसियों और तकनीकी जांच का है, लेकिन फायर सेफ्टी और इमरजेंसी एग्जिट की व्यवस्था को लेकर मौके पर दिख रही परिस्थितियां निश्चित तौर पर जांच की मांग करती हैं।
17 हजार रुपये का कमरा और सुविधा के नाम पर क्या?
पड़ताल के दौरान हमारी टीम एक छात्र के कमरे तक पहुंची। छात्र शारांश विश्वकर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं।उनके मुताबिक दो छात्रों के लिए बने कमरे में करीब 8-8 हजार रुपये प्रति बेड किराया लिया जाता है। यानी दो छात्रों के कमरे का कुल किराया लगभग 17 हजार रुपये तक पहुंचता है।कमरे में ही छोटा-सा किचन तैयार किया गया था। पानी की टंकी और स्लैब जैसी मूलभूत व्यवस्था के अलावा सुविधाएं बेहद सीमित नजर आईं।यह तस्वीर सिर्फ एक कमरे की नहीं है। यह उस बड़े सवाल की तस्वीर है कि क्या राजधानी में छात्र किराये के नाम पर सिर्फ चार दीवारें खरीद रहे हैं या उन्हें सुरक्षित आवास भी मिल रहा है?
छात्र बोले—कॉलेज के पास रहने की मजबूरी
हादसे के बाद शारांश जैसे छात्रों के सामने एक और संकट है—जाएं तो जाएं कहां?
सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के नजदीक है। कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पर्याप्त हॉस्टल की कमी छात्रों को निजी PG और किराये के कमरों की ओर धकेलती है।
राहुल गांधी ने भी हादसे के बाद इसी समस्या को उठाते हुए कहा कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पर्याप्त हॉस्टल सुविधाएं नहीं होने के कारण छात्रों को PG में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उन्होंने हर छात्र की जिंदगी को कीमती बताते हुए सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।यही इस पूरे संकट की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।छात्रों के पास विकल्प सीमित हैं और PG संचालकों के पास मांग बहुत ज्यादा।नतीजा—किराया बढ़ता जाता है, कमरे छोटे होते जाते हैं और कई जगह सुरक्षा व्यवस्था पीछे छूट जाती है।
हादसा सिर्फ एक इमारत का नहीं, पूरे सिस्टम का आईना
सत्य निकेतन हादसे के बाद सामने आई शुरुआती जानकारियों के मुताबिक हादसे वाली इमारत पुरानी थी और वहां निर्माण/मरम्मत से जुड़े काम चल रहे थे। बेसमेंट में पानी जमा होने और निर्माण कार्य का भी उल्लेख सामने आया है। हालांकि हादसे की वास्तविक तकनीकी वजह का निर्धारण जांच के बाद ही किया जा सकेगा।यही वजह है कि इस घटना को केवल ‘पुरानी इमारत गिर गई’ कहकर खत्म करना खतरनाक होगा।
कानूनविदों की दृष्टि से असली सवाल यह होना चाहिए कि—इमारत का स्वीकृत नक्शा क्या था?
वास्तविक निर्माण कितना था?
PG संचालन की अनुमति थी या नहीं?
फायर सेफ्टी मानकों का पालन हुआ या नहीं?
स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट हुआ था या नहीं?
मरम्मत या निर्माण के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं?
इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि यह केवल दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना थी या लापरवाही की ऐसी श्रृंखला, जिसे समय रहते रोका जा सकता था।
विपक्ष ने सरकार को घेरा
हादसे के बाद दिल्ली की राजनीति भी गर्म हो गई है।
AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल ने घटना को बेहद दुखद और चिंताजनक बताते हुए सरकार से नागरिक सुरक्षा के लिए बड़े स्तर पर कार्रवाई करने की मांग की और सरकारी लापरवाही पर सवाल उठाए।
पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी ने उच्चस्तरीय जांच और लापरवाही के लिए जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने राहत और बचाव कार्य तेज करने की अपील के साथ छात्रों के लिए पर्याप्त हॉस्टल सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया।
प्रियंका गांधी ने भी घटना पर चिंता जताते हुए राहत-बचाव में तेजी की मांग की।
NSUI अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने भी हादसे को लेकर प्रशासन की जवाबदेही और आपदा प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए तथा छात्रों के लिए न्याय की मांग की।
विपक्ष के इन आरोपों का राजनीतिक मूल्यांकन अलग हो सकता है, लेकिन हादसे ने जिस बुनियादी समस्या को सामने रखा है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता—दिल्ली के छात्र आवासों की सुरक्षा की व्यापक समीक्षा।
शिक्षाविदों के लिए भी बड़ा सवाल
शिक्षा विशेषज्ञों के नजरिये से यह घटना सिर्फ भवन सुरक्षा का मामला नहीं है। यह उच्च शिक्षा के पूरे आवासीय ढांचे पर सवाल है।जब विश्वविद्यालयों में हॉस्टल की सीटें सीमित हों और बाहर से आने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ती हो, तो निजी PG बाजार स्वाभाविक रूप से फैलता है।लेकिन शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी केवल कक्षा तक सीमित नहीं हो सकती।जिस छात्र को विश्वविद्यालय में दाखिला दिया गया है, उसके सुरक्षित आवास का सवाल भी शिक्षा व्यवस्था की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा है।अगर छात्र को कॉलेज के पास रहने के लिए मजबूरन असुरक्षित भवन चुनना पड़े, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत मजबूरी नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का संकेत है।
कानूनविदों की नजर में जवाबदेही का असली रास्ता
कानूनी तौर पर इस मामले में सिर्फ भवन मालिक को जिम्मेदार ठहराकर मामला खत्म करना पर्याप्त नहीं होगा।अगर जांच में अवैध निर्माण, नियमों का उल्लंघन, बिना अनुमति निर्माण, फायर सेफ्टी में कमी या अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है, तो जिस स्तर पर जो जिम्मेदारी तय होती है, वहां तक कार्रवाई पहुंचनी चाहिए।यही कारण है कि MCD के पांच अधिकारियों का निलंबन महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह अंतिम जवाब नहीं हो सकता।असली जवाब तब मिलेगा जब जांच यह बताएगी कि—
खतरे के संकेत पहले क्यों नहीं दिखे?
निरीक्षण किसने किया?
अगर निरीक्षण नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ?
और अगर हुआ तो रिपोर्ट में क्या लिखा था?
समाजसेवी संगठनों के लिए भी चेतावनी
सत्य निकेतन की घटना केवल सरकारी एजेंसियों के लिए चेतावनी नहीं है।नागरिक संगठनों, छात्र संगठनों और समाजसेवी संस्थाओं को भी दिल्ली के छात्र इलाकों में ‘सेफ PG कैंपेन’ चलाने की जरूरत है।हर छात्र को यह पता होना चाहिए कि वह जिस भवन में रह रहा है, वहां—- आपातकालीन निकास है या नहीं,
फायर सेफ्टी उपकरण काम करते हैं या नहीं,
सीढ़ियां आपातकाल में पर्याप्त हैं या नहीं,
इमारत की संरचनात्मक स्थिति कैसी है,
PG संचालन वैध है या नहीं, और किसी आपदा की स्थिति में बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता क्या है। यह जानकारी सिर्फ प्रशासन के पास नहीं, हर किरायेदार के पास होनी चाहिए।
सरकार के सामने अब पांच बड़े सवाल
सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली सरकार और MCD के सामने कम से कम पांच तत्काल सवाल हैं—
पहला— सत्य निकेतन,
मुखर्जी नगर,
लक्ष्मी नगर,
राजेंद्र नगर और दिल्ली के अन्य छात्र इलाकों में चल रहे PG का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कब होगा?
दूसरा— कितने PG के पास आवश्यक अनुमति और फायर सेफ्टी व्यवस्था है?
तीसरा— अवैध निर्माण पर कार्रवाई हादसे के बाद ही क्यों होती है?
चौथा— छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती हॉस्टल की व्यवस्था कब बढ़ाई जाएगी?
पांचवां— अगर किसी इमारत को खतरा था तो वहां रहने वाले छात्रों को पहले से चेतावनी क्यों नहीं मिली?’
किराया’ और ‘जिंदगी’ के बीच सरकार को खींचनी होगी सुरक्षा की रेखा
सत्य निकेतन की राख और मलबे में सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं दबे हैं।वहां दिल्ली के उन हजारों छात्रों का डर दबा है, जो हर महीने हजारों रुपये देकर किसी कमरे में इसलिए रहते हैं क्योंकि वह उनके कॉलेज के पास है।वे माता-पिता भी सवाल पूछ रहे हैं जिन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए राजधानी भेजा है।
और अब दिल्ली को तय करना होगा—क्या छात्र के लिए सुरक्षित कमरा एक सुविधा है या उसका अधिकार?
अगर हजारों रुपये किराया लेने वाली इमारत में आपातकालीन निकास तक सुरक्षित नहीं है,
अगर भवन की संरचनात्मक स्थिति की नियमित जांच नहीं होती,
अगर नियम कागजों पर हैं और कार्रवाई हादसे के बाद होती है,
तो फिर सवाल केवल एक PG का नहीं है।सवाल पूरी व्यवस्था का है।
सत्य निकेतन हादसा दिल्ली को एक मौका दे रहा है—या तो राजधानी अपने छात्र आवासों को सुरक्षित बनाए, या अगली बार मलबे के नीचे किसी और परिवार का सपना मिलेगा।
NSK का सवाल
दिल्ली सरकार बताए—क्या राजधानी के सभी छात्र PG और हॉस्टलों का समयबद्ध स्ट्रक्चरल एवं फायर सेफ्टी ऑडिट कराया जाएगा?
क्योंकि सात मौतों के बाद सिर्फ मुआवजा नहीं, जवाबदेही भी चाहिए।
