सत्य निकेतन हादसा: हजारों की वसूली के बीच छात्रों की जिंदगी का सौदा? हरिराम भिवाड़ी से हिरासत में, MCD के 5 अधिकारी सस्पेंड; क्या सात मौतों की जवाबदेही यहीं खत्म हो जाएगी? अब असली सवाल सिस्टम से

बी के झा

नई दिल्ली, 7 सितंबर

दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत के ढहने से सात लोगों की मौत के बाद अब कार्रवाई का सिलसिला तेज हो गया है। हादसे के बाद से फरार चल रहे कथित बिल्डिंग मालिक हरिराम को दिल्ली पुलिस ने राजस्थान के भिवाड़ी से हिरासत में ले लिया है। पुलिस ने उसकी तलाश के लिए दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में छापेमारी की थी और 10 अलग-अलग टीमें लगाई गई थीं। उसके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर भी जारी किया गया था।

लेकिन सत्य निकेतन की सात मौतों के बाद सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मकान मालिक कौन था और वह हादसे के बाद क्यों भागा?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस इमारत में छात्र रह रहे थे, वह प्रशासन की नजरों से कैसे बची रही?

और उससे भी बड़ा सवाल—क्या मालिक की हिरासत और पांच MCD अधिकारियों के निलंबन के बाद सरकार की जवाबदेही पूरी मान ली जाए?

यही सवाल आज दिल्ली के उन हजारों परिवारों के सामने खड़ा है, जो अपने बच्चों को पढ़ने के लिए राजधानी भेजते हैं और उन्हें सुरक्षित हॉस्टल न मिलने पर महंगे PG में रहने को मजबूर होते हैं।

10 पुलिस टीमें लगीं, तीन राज्यों में छापेमारी के बाद भिवाड़ी से मिला हरिराम

हादसे के बाद हरिराम अपने घर और परिचितों के ठिकानों से गायब था। दिल्ली पुलिस ने उसकी तलाश में करीब 10 टीमें बनाईं। इन टीमों में स्थानीय पुलिस, स्पेशल स्टाफ और ऑपरेशन यूनिट के पुलिसकर्मी शामिल थे।गुरुग्राम समेत दिल्ली-NCR के कई इलाकों में छापेमारी हुई। उसके रिश्तेदारों और करीबियों से भी पूछताछ की गई। पुलिस को आशंका थी कि वह NCR में ही कहीं छिपा हो सकता है।बाद में पुलिस ने उसे राजस्थान के भिवाड़ी से हिरासत में लिया।

अब उससे इमारत के मालिकाना हक, PG संचालन, निर्माण/मरम्मत गतिविधियों और हादसे से जुड़े दूसरे पहलुओं पर पूछताछ की जा रही है। पुलिस ने मामले में हरिराम और अन्य लोगों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या, भवन के रखरखाव में लापरवाही और लोगों की सुरक्षा को खतरे में डालने जैसे आरोपों में मामला दर्ज किया है।

मालिक पर कार्रवाई हुई, लेकिन निगरानी किसकी थी?

यहां से मामला केवल एक मकान मालिक तक सीमित नहीं रह जाता। MCD कमिश्नर संजीव खिरवार के अनुसार यह इमारत पुरानी थी और उसे पहले कोई नोटिस या सीलिंग कार्रवाई नहीं दी गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि इमारत के संबंध में पहले कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई थी।अगर यह तथ्य जांच में सही साबित होता है तो सवाल और गंभीर हो जाता है—

क्या किसी इमारत के खिलाफ शिकायत नहीं मिलना ही उसकी सुरक्षित होने की गारंटी है?

क्या प्रशासन का काम सिर्फ शिकायत आने के बाद जागना है?

या फिर उन इलाकों में नियमित निरीक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए जहां बड़ी संख्या में छात्र, किरायेदार और PG निवासी रहते हैं?

यही वह बिंदु है जहां व्यक्तिगत लापरवाही और सिस्टम की जवाबदेही के बीच अंतर करना जरूरी हो जाता है।

पांच MCD अधिकारी सस्पेंड, मगर क्या यह पर्याप्त है?

सत्य निकेतन हादसे के बाद MCD ने दक्षिणी जोन के पांच अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया है। इनमें डिप्टी कमिश्नर समेत बिल्डिंग विभाग से जुड़े अधिकारी शामिल हैं।सरकार की ओर से यह कार्रवाई निश्चित तौर पर जवाबदेही तय करने की दिशा में पहला कदम है।लेकिन एक गंभीर सवाल फिर भी कायम है—निलंबन जांच की शुरुआत है या जवाबदेही का अंत?

अगर जांच में किसी अधिकारी की लापरवाही सामने आती है तो विभागीय कार्रवाई के साथ कानूनी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।और अगर जांच में यह सामने आता है कि नियमों का उल्लंघन हुआ, अवैध निर्माण हुआ या PG के रूप में भवन का इस्तेमाल सुरक्षा मानकों के विपरीत किया गया, तो केवल एक मालिक या कुछ अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराकर क्या पूरा सच सामने आ पाएगा?

राजनीति भी गर्म, विपक्ष ने पूछा—’सिस्टम कब जागेगा?

‘सत्य निकेतन हादसे ने दिल्ली की राजनीति को भी गर्म कर दिया है।कांग्रेस ने घटना को केवल दुर्घटना मानने के बजाय इसे प्रशासनिक विफलता से जोड़ते हुए सरकार पर हमला बोला है। पार्टी ने आरोप लगाया कि राजधानी में भ्रष्टाचार और नियामकीय लापरवाही के कारण ऐसी घटनाएं हो रही हैं।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने छात्रों के लिए पर्याप्त हॉस्टल सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि अच्छे हॉस्टल नहीं होने के कारण छात्र असुरक्षित और अमानवीय परिस्थितियों वाले PG में रहने को मजबूर होते हैं।

AAP की ओर से भी MCD और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए।

AAP विधायक अमानतुल्लाह खान ने हादसे के बाद MCD की लापरवाही पर तीखी प्रतिक्रिया दी।वहीं पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी हादसे को लेकर सरकार की कथित लापरवाही पर सवाल उठाए और बड़े स्तर पर कार्रवाई की मांग की।

दूसरी तरफ BJP ने विपक्ष पर त्रासदी को राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगाया और कहा कि ऐसे समय में राजनीति के बजाय राहत एवं बचाव पर ध्यान दिया जाना चाहिए।यानी हादसे के मलबे से सिर्फ शव और घायल नहीं निकले—दिल्ली की व्यवस्था पर गंभीर राजनीतिक सवाल भी बाहर आए हैं।

छात्रों का सवाल: हॉस्टल नहीं तो सुरक्षित PG कौन देगा?

सत्य निकेतन की सबसे बड़ी त्रासदी सिर्फ सात लोगों की मौत नहीं है।इस हादसे ने दिल्ली में पढ़ने वाले लाखों छात्रों के आवास का सवाल भी सामने ला दिया है।दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रतियोगी परीक्षाओं, कोचिंग संस्थानों और दूसरे शिक्षण संस्थानों में पढ़ने के लिए देश के अलग-अलग राज्यों से छात्र राजधानी आते हैं।लेकिन क्या दिल्ली के पास इन छात्रों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित हॉस्टल हैं?

जब जवाब ‘नहीं’ होता है तो छात्र PG बाजार की तरफ जाते हैं।यहीं से शुरू होता है—कमरे का किराया, एडवांस, मेंटेनेंस, बिजली-पानी के नाम पर शुल्क और तमाम दूसरी वसूली।

लेकिन इन पैसों के बदले छात्र को मिलता क्या है?

क्या उसे सुरक्षित भवन मिलता है?

क्या भवन का स्ट्रक्चरल ऑडिट हुआ है?

क्या फायर सेफ्टी मानकों का पालन हो रहा है?

क्या निकासी का सुरक्षित रास्ता है?

क्या बेसमेंट में अवैध निर्माण या खुदाई तो नहीं हो रही?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या प्रशासन को पता है कि उस भवन में कितने छात्र रह रहे हैं?

‘शिकायत नहीं मिली’ वाली व्यवस्था पर भी सवाल जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार किसी भवन की सुरक्षा व्यवस्था केवल शिकायत आधारित नहीं हो सकती, खासकर तब जब उसका इस्तेमाल बड़ी संख्या में लोगों के रहने के लिए हो रहा हो।अगर किसी भवन में दर्जनों छात्र रह रहे हैं, उसमें लगातार निर्माण या बदलाव हो रहा है और वह घनी आबादी वाले क्षेत्र में है, तो प्रशासन को केवल शिकायत का इंतजार नहीं करना चाहिए।

सिविल इंजीनियरिंग और शहरी नियोजन के जानकारों के लिए भी यह हादसा एक गंभीर चेतावनी है कि पुराने भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा, अवैध बदलाव और बदलते उपयोग की नियमित निगरानी जरूरी है।एक सामान्य मकान जब बड़े पैमाने पर PG या हॉस्टल में बदल जाता है तो उसके ऊपर लोगों का भार, पानी की खपत, बिजली व्यवस्था, निकासी व्यवस्था और सुरक्षा संबंधी जोखिम भी बढ़ जाते हैं।

इसलिए सवाल सिर्फ ‘बिल्डिंग कितनी पुरानी थी’ का नहीं है।सवाल है—उसका इस्तेमाल किस रूप में किया जा रहा था और क्या वह उस उपयोग के लिए सुरक्षित थी?

कानूनविदों की नजर में असली जांच किन सवालों पर होनी चाहिए?

कानूनी विशेषज्ञों की दृष्टि से जांच को सिर्फ भवन मालिक की भूमिका तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।जांच में कम से कम इन बिंदुओं को देखा जाना चाहिए—

1. भवन का स्वीकृत नक्शा क्या था?

2. वास्तविक निर्माण उससे कितना अलग था?

3. क्या भवन में कोई अनधिकृत मंजिल या संरचनात्मक बदलाव हुआ?

4. PG/हॉस्टल संचालन की अनुमति और रिकॉर्ड क्या थे?

5. हाल में कोई मरम्मत, बेसमेंट कार्य या खुदाई हुई थी?

6. क्या किसी अधिकारी ने भवन का निरीक्षण किया था?

7. अगर निरीक्षण हुआ था तो रिपोर्ट क्या थी?

8. क्या किसी स्तर पर शिकायत या सूचना मिली थी?

9. क्या भवन में फायर और आपातकालीन निकासी की पर्याप्त व्यवस्था थी?

10. अगर नियमों का उल्लंघन हुआ तो उस पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि यह सिर्फ एक मालिक की लापरवाही थी या फिर कई स्तरों पर हुई संस्थागत विफलता।

समाजसेवी और छात्र संगठन भी पूछ रहे हैं—PG की देशव्यापी ‘सेफ्टी ऑडिट’ कब?

हादसे के बाद छात्र और शिक्षक संगठनों की ओर से दिल्ली के PG आवासों का व्यापक ऑडिट कराने की मांग उठ रही है। ABVP ने MCD कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर जवाबदेही की मांग की और आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी उठाई।यह मांग सिर्फ राजनीतिक नहीं है।अगर आज सत्य निकेतन है तो कल कोई और इलाका हो सकता है।

दिल्ली में मुखर्जी नगर,

लक्ष्मी नगर, राजेंद्र नगर,

पटेल नगर,

नेहरू विहार,

बेर सराय,

कटवरिया सराय,

सत्य निकेतन जैसे छात्र बहुल इलाकों में हजारों छात्र PG और किराये के मकानों में रहते हैं।इसलिए जरूरत सिर्फ एक भवन की जांच की नहीं, बल्कि पूरे छात्र आवास तंत्र के सुरक्षा ऑडिट की है।

NSK का सवाल: सात मौतों के बाद अगला कदम क्या?

हरिराम हिरासत में है।

MCD के पांच अधिकारी निलंबित हैं।

जांच की घोषणा हो चुकी है।

हाईकोर्ट में याचिका पहुंच चुकी है।

राजनीतिक दल बयान दे रहे हैं।

लेकिन इन सबके बीच सात परिवारों के घरों में मातम है।मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से दिल्ली पढ़ने आए युवाओं के परिवारों ने अपने बच्चों को इस उम्मीद से राजधानी भेजा था कि वे बेहतर भविष्य बनाएंगे। लेकिन वे उसी शहर में जिंदगी हार गए, जहां वे अपने सपनों को आकार देने आए थे।

हादसे में जान गंवाने वालों में दूसरे राज्यों से आए छात्र भी शामिल हैं।इसलिए अब सरकार के सामने चुनौती सिर्फ दोषी खोजने की नहीं है।चुनौती यह साबित करने की है कि दिल्ली में किसी छात्र की जिंदगी किराये के एक कमरे से सस्ती नहीं है। और यही वह सवाल है, जिसका जवाब दिल्ली को चाहिए

क्या हर हादसे के बाद—एक मालिक गिरफ्तार होगा,

कुछ अधिकारी निलंबित होंगे,

एक जांच समिति बनेगी,

कुछ दिन राजनीतिक बयानबाजी होगी, और फिर सब कुछ सामान्य हो जाएगा?

या इस बार दिल्ली की सरकार ऐसी व्यवस्था बनाएगी जिसमें—हर PG का पंजीकरण हो,हर छात्रावास का सुरक्षा ऑडिट हो,

खतरनाक भवनों की सूची सार्वजनिक हो,

अवैध निर्माण पर समय रहते कार्रवाई हो,

जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो,और छात्रों तथा उनके अभिभावकों को यह अधिकार मिले कि वे जिस भवन में अपने बच्चे को भेज रहे हैं, उसकी सुरक्षा स्थिति जान सकें?

क्योंकि सत्य निकेतन की सात मौतें सिर्फ एक इमारत के गिरने की कहानी नहीं हैं।यह उस व्यवस्था का आईना हैं, जहां छात्र बेहतर भविष्य की तलाश में दिल्ली आते हैं, लेकिन सुरक्षित छत की तलाश अब भी उनकी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

मालिक की गिरफ्तारी जरूरी है।

अधिकारियों पर कार्रवाई जरूरी है।

लेकिन उससे भी जरूरी है—उस सिस्टम की पहचान, जिसने खतरे को हादसा बनने से पहले नहीं पहचाना।

NSK का सीधा सवाल है—क्या दिल्ली सरकार इस बार सिर्फ मलबा हटाएगी, या उस व्यवस्था को भी हटाएगी जिसके नीचे भ्रष्टाचार, लापरवाही और निगरानी की कमी दबकर रह गई है?

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