लाल टोपी से नीली ड्रेस तक… अखिलेश के नए ड्रेसकोड पर बीजेपी का वार, ‘बहरूपिए का खेल’ वाला तंज

बी के झा

NSK news Ind

लखनऊ, 8 सितंबर

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ सियासी रंग भी तेजी से बदलने लगे हैं। समाजवादी पार्टी की राजनीति में इन दिनों ‘लाल’ की जगह ‘नीला’ रंग चर्चा के केंद्र में है। सपा के पारंपरिक लाल गमछे से लेकर छात्र सभा के नए ड्रेसकोड तक, पार्टी के रंगों में आए बदलाव ने यूपी की सियासत में नई बहस छेड़ दी है।

बीजेपी ने इसी बदलाव को मुद्दा बनाते हुए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है।सपा की महानगर और जिला अध्यक्षों की बैठक में अखिलेश यादव खुद लाल गमछे की जगह नीला गमछा डाले नजर आए। इसके बाद पार्टी की छात्र सभा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए भी नया ड्रेसकोड तय किया गया है। अब छात्र सभा से जुड़े कार्यकर्ता नीली शर्ट और नीली पैंट या नीली टी-शर्ट और नीली जींस में नजर आएंगे।

सपा के इस बदलाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। इसकी वजह यह है कि समाजवादी पार्टी की पारंपरिक राजनीतिक पहचान लंबे समय से लाल टोपी, लाल गमछे और समाजवादी झंडे से जुड़ी रही है। वहीं, नीला रंग उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी की पहचान से भी जोड़ा जाता रहा है।

बीजेपी ने साधा निशाना, कहा- ‘बहरूपिए का खेल जारी है’

सपा के नए रंग पर बीजेपी ने निशाना साधने में देर नहीं की। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष और केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर अखिलेश यादव पर तंज कसा।

उन्होंने लिखा—’लाल टोपी, नीली ड्रेस… जारी है बहरूपिए का खेल।चुनाव देख बदल लिया है भेष, नहीं भूलेगा उत्तर प्रदेश।

‘पंकज चौधरी ने आरोप लगाया कि चुनाव करीब आते ही अखिलेश यादव की राजनीति फिर रंग और भेष बदलने तक सिमट गई है। उन्होंने कहा कि सपा की बदलती पहचान उसकी अवसरवादी राजनीति को सामने लाती है।बीजेपी नेता का दावा है कि केवल रंग और पहनावा बदलने से जनता की धारणा नहीं बदली जा सकती। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता राजनीतिक दिखावे को समझती है और सपा चाहे जितने रंग बदल ले, लोग उसके राजनीतिक अवसरवाद को पहचान चुके हैं।

आखिर नीला ही क्यों?

सियासत में उठ रहे कई सवालअखिलेश यादव के इस बदलाव को सिर्फ ड्रेसकोड का मामला नहीं माना जा रहा है। चुनावी राजनीति में प्रतीकों और रंगों का अपना अलग महत्व होता है। ऐसे में सपा छात्र सभा के लिए नीले रंग की पोशाक तय किए जाने के बाद इसके राजनीतिक संदेश को लेकर चर्चा तेज हो गई है।खासकर इसलिए क्योंकि उत्तर प्रदेश में नीला रंग दलित राजनीति और बसपा की पहचान से गहराई से जुड़ा रहा है। ऐसे में सपा के पारंपरिक लाल रंग के बीच नीले रंग की बढ़ती मौजूदगी को राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

हालांकि, सपा की ओर से ड्रेसकोड में बदलाव के पीछे किसी खास राजनीतिक रणनीति या गठबंधन का आधिकारिक कारण सामने नहीं आया है। इसलिए इसके सियासी अर्थों को फिलहाल राजनीतिक विश्लेषण और संभावनाओं के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

लाल टोपी सपा की पहचान, नीला रंग नई रणनीति?

समाजवादी पार्टी की तस्वीर लंबे समय से लाल टोपी और लाल गमछे के बिना अधूरी मानी जाती रही है। पार्टी के कार्यकर्ता हों या बड़े नेता, सार्वजनिक कार्यक्रमों में लाल रंग सपा की राजनीतिक ब्रांडिंग का अहम हिस्सा रहा है।ऐसे में अचानक नीले रंग को प्रमुखता मिलना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है।

क्या यह सिर्फ छात्र सभा को अलग पहचान देने की कोशिश है?

या फिर इसके पीछे युवा और नए सामाजिक समीकरणों तक पहुंच बनाने की रणनीति है?

यही वह सवाल है जिसने सपा के नए ड्रेसकोड को महज कपड़ों के रंग से निकालकर चुनावी रणनीति की बहस में ला खड़ा किया है।

बीजेपी ने पहले ही पकड़ लिया ‘नीला’ रंग

बीजेपी के हमले से साफ है कि वह सपा के इस बदलाव को चुनावी मुद्दे के रूप में भुनाने की कोशिश करेगी। पंकज चौधरी का ‘बहरूपिए का खेल’ वाला तंज इसी राजनीतिक नैरेटिव की ओर इशारा करता है।

दूसरी ओर, अखिलेश यादव के लिए चुनौती यह होगी कि पार्टी की पारंपरिक समाजवादी पहचान को बरकरार रखते हुए नए सामाजिक और युवा वर्गों तक अपनी राजनीतिक पहुंच कैसे मजबूत की जाए।

यानी यूपी की चुनावी पिच तैयार होने लगी है और इस बार मुकाबला सिर्फ नारों और मुद्दों का नहीं, बल्कि रंगों और प्रतीकों का भी दिखाई दे सकता है।

लाल टोपी के बीच नीली ड्रेस की एंट्री ने सियासत का रंग जरूर बदल दिया है—

अब देखना यह है कि यह रंग चुनावी मैदान में कितना असर छोड़ता है।

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