G20 के बहाने दिसंबर में अमेरिका जाएंगे मोदी? ट्रंप से ‘वन-टू-वन’ मुलाकात की संभावना, व्यापार से रूस-तेल तक कई मुद्दे होंगे सामने, अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के संकेतों ने बढ़ाई हलचल, क्वाड नेताओं की बैठक भी संभावित

बी. के. झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 23 सितंबर

दिसंबर में फ्लोरिडा की जमीन पर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेता जुटेंगे और उसी मंच के इतर भारत-अमेरिका संबंधों की अगली दिशा पर भी नजरें रहेंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे की संभावनाएं तेज हो गई हैं। अगर यह यात्रा तय होती है तो मोदी 14 और 15 दिसंबर को फ्लोरिडा के ट्रंप नेशनल डोरल मियामी में होने वाले G20 शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले सकते हैं। सम्मेलन की मेजबानी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करेंगे।

हालांकि, भारत सरकार ने अभी प्रधानमंत्री की यात्रा को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है।लेकिन इस संभावित दौरे को सिर्फ G20 की औपचारिक बैठक तक सीमित मानना शायद तस्वीर का अधूरा हिस्सा होगा। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि मोदी और ट्रंप की G20 के इतर द्विपक्षीय मुलाकात हो सकती है।

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने संकेत दिया है कि ट्रंप G20 में आने वाले नेताओं में मोदी से मुलाकात को विशेष महत्व दे सकते हैं।

यानी फ्लोरिडा में G20 की मेज पर वैश्विक अर्थव्यवस्था होगी, लेकिन मोदी-ट्रंप की संभावित अलग बैठक की मेज पर भारत-अमेरिका के रिश्तों का अगला आर्थिक और रणनीतिक खाका भी हो सकता है।

G20 से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है मोदी-ट्रंप की अलग मुलाकात

अगर दोनों नेताओं की द्विपक्षीय बैठक होती है तो यह हाल के महीनों में चल रही भारत-अमेरिका बातचीत को राजनीतिक शीर्ष स्तर पर आगे बढ़ाने का अवसर होगी।भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। दोनों देशों के बीच रक्षा, ऊर्जा, तकनीक, महत्वपूर्ण खनिज और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भी निरंतर संपर्क बना हुआ है। सर्जियो गोर ने सितंबर में कहा था कि दोनों देश व्यापार समझौते को लेकर काफी करीब हैं।ऐसे में मोदी-ट्रंप वार्ता में सिर्फ राजनयिक औपचारिकताएं नहीं होंगी। बातचीत का केंद्र यह हो सकता है कि दोनों देश व्यापार विवाद से निकलकर दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी को किस दिशा में ले जाते हैं।

टैरिफ का दबाव और रूसी तेल—सबसे कठिन सवाल

मोदी-ट्रंप संभावित बैठक का सबसे संवेदनशील आर्थिक पहलू रूस से भारत की तेल खरीद हो सकता है।भारत की रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर वॉशिंगटन का दबाव बढ़ा है। अमेरिकी प्रतिबंध संबंधी प्रस्तावों में रूस से महत्वपूर्ण मात्रा में तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ का प्रावधान चर्चा में है। भारत ने ऊर्जा सुरक्षा और अपने नागरिकों के हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की है।इसलिए फ्लोरिडा में यदि मोदी और ट्रंप आमने-सामने बैठते हैं तो सवाल सिर्फ तेल खरीद का नहीं होगा।इसके पीछे बड़ा सवाल होगा—क्या भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों और अमेरिका की रूस नीति के बीच कोई व्यावहारिक संतुलन निकाल सकता है?

यही संतुलन दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों पर भी असर डाल सकता है।ट्रंप के लिए भारत, मोदी के लिए अमेरिका—दोनों की अपनी प्राथमिकताएं

अमेरिका के लिए भारत हिंद-प्रशांत में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। रक्षा सहयोग, तकनीक, महत्वपूर्ण खनिज और आपूर्ति शृंखला जैसे क्षेत्र दोनों देशों के रिश्तों को व्यापक बना रहे हैं।भारत के लिए अमेरिका दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण बाजारों में से एक है और उच्च तकनीक, निवेश, रक्षा सहयोग तथा वैश्विक कूटनीति में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है।इसलिए दोनों देशों के बीच मतभेद होने के बावजूद संबंधों को पूरी तरह टकराव की दिशा में ले जाना किसी के लिए आसान विकल्प नहीं है।यही वजह है कि संभावित मोदी-ट्रंप बैठक को मतभेदों के बीच समझौते की गुंजाइश तलाशने वाली बातचीत के रूप में देखना अधिक महत्वपूर्ण होगा।

सर्जियो गोर के बयान ने क्यों बढ़ाई अटकलें?

मोदी के अमेरिका दौरे को लेकर अटकलें अचानक नहीं उठीं।अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने पहले ही कहा था कि अमेरिका प्रधानमंत्री मोदी की वापसी का स्वागत करेगा। बाद में उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि ट्रंप से पूछा जाए कि G20 में आने वाले नेताओं में वे किससे मिलना चाहेंगे, तो मोदी उनकी प्राथमिकता में होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप मोदी को मित्र मानते हैं और इसलिए उनकी यात्रा केवल सामूहिक G20 बैठक तक सीमित रहने की संभावना नहीं है।हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि अमेरिकी राजदूत के संकेत और मीडिया रिपोर्ट औपचारिक भारतीय घोषणा का विकल्प नहीं हैं।

प्रधानमंत्री की यात्रा और बैठक का अंतिम कार्यक्रम दोनों सरकारों की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा।

क्वाड की बैठक हुई तो तस्वीर और बड़ी होगी

G20 सम्मेलन के आसपास क्वाड नेताओं की बैठक की भी तैयारी की खबरें हैं। क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।भारतीय और अन्य सदस्य देशों के अधिकारी इस संभावित बैठक की तैयारियों पर काम कर रहे हैं। सितंबर की शुरुआत में क्वाड शेरपाओं की बैठक भी हुई थी, जिसमें आगामी गतिविधियों की तैयारी पर चर्चा हुई थी।अगर G20 के दौरान मोदी-ट्रंप द्विपक्षीय बैठक और क्वाड बैठक दोनों होती हैं तो फ्लोरिडा यात्रा भारत के लिए केवल आर्थिक कूटनीति का कार्यक्रम नहीं रहेगी।यह बहुपक्षीय मंच, द्विपक्षीय संबंध और हिंद-प्रशांत रणनीति—तीनों को एक ही जगह साधने का अवसर बन सकती है।

चीन और रूस के बीच भारत का संतुलन भी महत्वपूर्ण

मोदी की संभावित अमेरिका यात्रा ऐसे समय हो सकती है जब भारत एक साथ कई रणनीतिक मोर्चों पर सक्रिय है।चीन के साथ भारत संवाद बढ़ा रहा है। रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंधों का अपना महत्व है। वहीं अमेरिका के साथ तकनीकी, आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी लगातार बढ़ रही है।ऐसे माहौल में भारत की विदेश नीति का मूल प्रश्न किसी एक शक्ति के साथ खड़ा होना नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के लिए अलग-अलग साझेदारियों को संतुलित करना है।इस लिहाज से ट्रंप के साथ मोदी की संभावित मुलाकात का महत्व केवल भारत-अमेरिका रिश्तों तक सीमित नहीं होगा। यह दुनिया को यह संकेत भी दे सकती है कि नई दिल्ली अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और ऊर्जा हितों को भी बनाए रखना चाहती है।

व्यापार समझौता—फ्लोरिडा में निकल सकता है कोई रास्ता?

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है। अमेरिकी पक्ष के अनुसार दोनों देश समझौते के करीब हैं, हालांकि बातचीत में कुछ मुद्दे अब भी सुलझाए जाने बाकी हैं।यदि दिसंबर तक कोई समझौता तैयार होता है या बातचीत निर्णायक चरण में पहुंचती है तो G20 का मंच दोनों नेताओं को उसे राजनीतिक समर्थन देने का अवसर दे सकता है।

लेकिन व्यापार समझौते की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि दोनों देशों की घरेलू आर्थिक प्राथमिकताएं अलग हैं।अमेरिका अपने बाजार और उद्योगों के हितों की रक्षा करना चाहता है। भारत भी कृषि, उद्योग, रोजगार और घरेलू बाजार से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर अपने हितों की रक्षा करेगा।इसलिए किसी समझौते तक पहुंचना केवल राजनीतिक रिश्तों की गर्मजोशी से नहीं, बल्कि कठिन आर्थिक सौदेबाजी से तय होगा।

जून की मुलाकात के बाद अब दिसंबर की बारी?

मोदी और ट्रंप की आखिरी मुलाकात जून में फ्रांस के एवियां में G7 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी। दोनों नेताओं ने व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और तकनीक समेत भारत-अमेरिका सहयोग के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की थी।अगर दिसंबर में फिर आमने-सामने मुलाकात होती है तो कुछ ही महीनों में यह दोनों नेताओं की दूसरी महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय बैठक होगी।इस बीच व्यापार और रूस-तेल के सवाल पर परिस्थितियां बदली हैं। इसलिए दिसंबर की संभावित बातचीत जून की चर्चा का महज विस्तार नहीं होगी। उसके सामने कई नए सवाल होंगे।

फ्लोरिडा में मोदी के सामने तीन बड़ी चुनौतियां

पहली चुनौती—व्यापार:टैरिफ विवाद और प्रस्तावित व्यापार समझौते के बीच ऐसा रास्ता निकालना जिससे भारतीय उद्योग और निर्यात प्रभावित न हों तथा अमेरिकी बाजार तक भारतीय पहुंच भी बनी रहे।

दूसरी चुनौती—ऊर्जा:रूसी तेल पर अमेरिकी दबाव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना।

तीसरी चुनौती—रणनीतिक साझेदारी:क्वाड और हिंद-प्रशांत में अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाते हुए रूस और चीन के साथ भारत के अन्य महत्वपूर्ण संबंधों के लिए रणनीतिक जगह बनाए रखना।

एन एस के विश्लेषण:

फ्लोरिडा में सिर्फ दो नेता नहीं, दो रणनीतियां आमने-सामने होंगी

यदि प्रधानमंत्री मोदी दिसंबर में अमेरिका जाते हैं और ट्रंप के साथ द्विपक्षीय बैठक होती है तो इसे महज एक और राजनयिक मुलाकात के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।ट्रंप के सामने अमेरिका की आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताएं होंगी—व्यापार घाटा, अमेरिकी उद्योग, ऊर्जा सुरक्षा और चीन के मुकाबले हिंद-प्रशांत में साझेदारी।

मोदी के सामने भारत की प्राथमिकताएं होंगी—ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात बाजार, तकनीकी सहयोग, निवेश, रक्षा साझेदारी और रणनीतिक स्वायत्तता। यानी दोनों नेताओं की मेज पर दोस्ती की भाषा जरूर होगी, लेकिन उसके पीछे हितों का कठोर गणित भी होगा।

G20 में दुनिया की अर्थव्यवस्था पर चर्चा होगी। क्वाड में हिंद-प्रशांत की रणनीति पर मंथन हो सकता है। और मोदी-ट्रंप की संभावित बंद कमरे की बातचीत में भारत-अमेरिका संबंधों के उन सवालों पर चर्चा हो सकती है, जिनका असर आने वाले वर्षों की साझेदारी पर पड़ेगा।फ्लोरिडा की बैठक इसलिए महत्वपूर्ण नहीं होगी कि मोदी और ट्रंप एक-दूसरे से मिलेंगे।

असली महत्व इस बात का होगा कि दोनों नेता मतभेदों के बावजूद कितनी जमीन साझा कर पाते हैं।और भारत के लिए सबसे बड़ी कसौटी यही होगी—अमेरिका के साथ साझेदारी कितनी गहरी हो, लेकिन इतनी नहीं कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता सीमित हो जाए;

रूस से रिश्ते कितने मजबूत रहें, लेकिन इतने नहीं कि अमेरिकी बाजार और तकनीकी सहयोग पर संकट आए;

और चीन से प्रतिस्पर्धा कितनी हो, लेकिन संवाद के दरवाजे बंद न हों।

दिसंबर का फ्लोरिडा सम्मेलन इसी संतुलन की अगली परीक्षा बन सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *