पहलगाम पर अनवर इब्राहिम की ‘सबूत वाली कूटनीति’! इजरायल पर स्टेट टेररिज्म का ठप्पा, पाकिस्तान पर बोलते ही क्यों थम गई जुबान?

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 13‌ सितंबर

नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान एक टीवी इंटरव्यू में जब उनसे इजरायल की कार्रवाई और हमास के संदर्भ में सवाल पूछा गया तो उन्होंने इजरायल की कार्रवाई को स्पष्ट शब्दों में ‘स्टेट टेररिज्म’ बताया। लेकिन जैसे ही सवाल पहलगाम और पाकिस्तान की कथित भूमिका पर पहुंचा, उनका स्वर बदल गया।

उन्होंने पाकिस्तान को सीधे तौर पर स्टेट-स्पॉन्सर्ड टेररिज्म का दोषी ठहराने से इनकार किया। उनका तर्क था कि इस निष्कर्ष के लिए ठोस सबूत आवश्यक हैं और उनकी जानकारी के अनुसार भारतीय या मलेशियाई खुफिया सहयोग में ऐसा निर्णायक प्रमाण उनके सामने नहीं आया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत की ओर से दी गई सूचनाओं को वह खारिज नहीं करते।

यही विरोधाभास अब बहस का केंद्र है।

एक सवाल, दो कसौटियां?

अनवर इब्राहिम का तर्क अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की पारंपरिक भाषा में समझा जा सकता है—आरोप और प्रमाण के बीच अंतर रखा जाए। लेकिन भारत के लिए सवाल इससे कहीं बड़ा है। पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकवादी हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी।

BRICS के 2026 के नई दिल्ली घोषणापत्र में भी इस हमले की कड़े शब्दों में निंदा की गई और आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात दोहराई गई।ऐसे में प्रश्न यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद की निंदा सामूहिक रूप से हो रही है, तब किसी एक देश की भूमिका पर टिप्पणी करते समय इतनी ऊंची प्रमाण-सीमा क्यों रखी जा रही है?

पाकिस्तान के लिए बयान बना ‘डिप्लोमैटिक ऑक्सीजन’?

अनवर इब्राहिम के इंटरव्यू की क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पाकिस्तान में इसे भारत के खिलाफ कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। भारतीय दृष्टिकोण से देखें तो यही इस बयान का सबसे संवेदनशील पहलू है।पाकिस्तान लंबे समय से भारत के उन आरोपों को खारिज करता रहा है जिनमें सीमा-पार आतंकवाद और आतंकी ढांचे को लेकर उसकी भूमिका पर सवाल उठाए जाते हैं।

ऐसे में मलेशियाई प्रधानमंत्री का यह कहना कि उन्हें पाकिस्तान के ‘स्टेट-स्पॉन्सर्ड टेररिज्म’ का ठोस प्रमाण नहीं मिला, पाकिस्तान को अपने पुराने तर्क को अंतरराष्ट्रीय मंच पर दोहराने का अवसर देता है।हालांकि इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि मलेशियाई प्रधानमंत्री ने पहलगाम हमले को सही ठहराया या आतंकवाद से इनकार किया।

उन्होंने साफ कहा कि आतंकवादी घटनाएं हुई हैं। विवाद मुख्यतः उन घटनाओं को पाकिस्तान की राज्य-प्रायोजित नीति से जोड़ने के प्रमाण को लेकर है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखना जरूरी है।भारत सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम से बातचीत के दौरान भारत ने उनकी ओर से पहलगाम आतंकी हमले की ‘strong condemnation’ के लिए धन्यवाद दिया था। जुलाई 2025 में भी प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS के दौरान अनवर इब्राहिम को पहलगाम हमले की कड़ी निंदा के लिए धन्यवाद दिया था।इसलिए मौजूदा इंटरव्यू को भारत विरोधी रुख में अचानक हुए पूर्ण परिवर्तन की तरह देखना जल्दबाजी होगी।

अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि अनवर इब्राहिम ने आतंकवाद की निंदा और पाकिस्तान को राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के लिए सीधे जिम्मेदार ठहराने के बीच एक स्पष्ट अंतर खींचा है।

हिंदू संगठनों और धर्माचार्यों के लिए असली सवाल

हिंदू संगठनों और संत-धर्माचार्यों की ओर से इस बयान पर प्रतिक्रिया आती है तो बहस का केंद्र भावनात्मक आरोप नहीं, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ समान मापदंड होना चाहिए।धर्माचार्यों का संभावित तर्क यह हो सकता है कि आतंकवाद का शिकार होने वाले व्यक्ति के लिए यह मायने नहीं रखता कि हमलावर के पीछे किस देश की नीति थी; लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आतंकवाद के नेटवर्क, वित्तपोषण, प्रशिक्षण और संरक्षण की पहचान करना उतना ही आवश्यक है।

सवाल यह है कि यदि आतंकवाद के पीछे किसी राज्य की भूमिका के प्रमाण सामने आते हैं, तो क्या कूटनीतिक रिश्ते उस प्रमाण की व्याख्या को प्रभावित करने चाहिए?

यही प्रश्न हिंदू संगठनों से लेकर सुरक्षा विशेषज्ञों तक की बहस का आधार बन सकता है।

मुस्लिम संगठनों के लिए भी परीक्षा की घड़ी

इस मुद्दे को हिंदू बनाम मुस्लिम बहस में बदलना खतरनाक होगा। भारत के मुस्लिम संगठनों की ओर से सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही होना चाहिए कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं और किसी निर्दोष नागरिक की हत्या का कोई औचित्य नहीं।

जमीअत उलमा-ए-हिंद पहले ही पहलगाम के बाद भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के मुद्दे पर देश के साथ एकजुटता व्यक्त कर चुकी है। संगठन ने सरकार की सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में भी राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के समर्थन की बात कही थी।इसलिए अनवर इब्राहिम के बयान को भारतीय मुसलमानों की राय के रूप में पेश करना भी उतना ही गलत होगा जितना इसे किसी पूरे धार्मिक समुदाय के खिलाफ इस्तेमाल करना।

विपक्ष के लिए भी कठिन सवाल

दिलचस्प बात यह है कि BRICS सम्मेलन के दौरान अनवर इब्राहिम ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से भी मुलाकात की।ऐसे में भारतीय विपक्ष के सामने भी स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे—क्या वह अनवर इब्राहिम के पाकिस्तान संबंधी इस बयान पर कोई स्पष्ट राजनीतिक प्रतिक्रिया देगा?

विपक्ष यदि भारत सरकार की विदेश नीति की आलोचना करता है तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि आतंकवाद के प्रश्न पर उसकी अपनी कसौटी क्या है। दूसरी ओर, सरकार समर्थक पक्ष के लिए भी चुनौती यही है कि वह केवल राजनीतिक हमला करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध प्रमाणों और कूटनीतिक दस्तावेजों के आधार पर अपना पक्ष रखे।

शिक्षाविदों और राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में

राजनीतिक विश्लेषण का एक पक्ष कहेगा कि अनवर इब्राहिम की भाषा ‘प्रमाण-आधारित कूटनीति’ है। किसी संप्रभु देश के प्रधानमंत्री के लिए दूसरे देश को राज्य-प्रायोजित आतंकवाद का दोषी घोषित करना एक गंभीर राजनयिक कदम है।

दूसरा पक्ष यह सवाल उठाएगा कि आतंकवाद के मामलों में केवल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध प्रत्यक्ष प्रमाण को ही अंतिम कसौटी मानना कितना उचित है, खासकर तब जब खुफिया सूचनाओं का बड़ा हिस्सा स्वभावतः सार्वजनिक नहीं किया जाता।यानी विवाद केवल अनवर इब्राहिम के बयान का नहीं है।

विवाद इस बात का है कि आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक व्यवस्था में ‘सबूत’ की कसौटी कौन तय करेगा और उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

BRICS के मंच से निकली बड़ी तस्वीर

इस पूरे विवाद को BRICS घोषणापत्र से अलग करके देखना भी उचित नहीं होगा।

नई दिल्ली घोषणापत्र में BRICS देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा की और आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ शून्य-सहिष्णुता की प्रतिबद्धता दोहराई।

चीन समेत BRICS के सदस्य देशों का इस निंदा में शामिल होना भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक संदेश माना जा रहा है। हालांकि घोषणापत्र में पाकिस्तान का नाम लेकर उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया गया।

यहीं भारत की कूटनीति ओर अनवर इब्राहिम के इंटरव्यू के बीच एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है—एक ओर बहुपक्षीय मंच आतंकवादी हमले की निंदा करता है, दूसरी ओर द्विपक्षीय राजनीतिक सवाल पर मलेशियाई प्रधानमंत्री जिम्मेदारी तय करने के लिए और प्रमाण मांगते हैं।

निष्कर्ष:

दोस्ती अपनी जगह, आतंकवाद अपनी जगह

अनवर इब्राहिम ने इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना ‘करीबी दोस्त’ बताया और भारत तथा पाकिस्तान दोनों से संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया। यह कूटनीतिक संतुलन उनकी विदेश नीति का हिस्सा हो सकता है।लेकिन भारत के लिए असली कसौटी दोस्ती नहीं, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ समान दृष्टिकोण है।

कूटनीति में संवाद जरूरी है, लेकिन आतंकवाद पर दोहरी कसौटी की गुंजाइश कितनी होनी चाहिए—यही वह सवाल है जिसका जवाब आने वाले दिनों में मलेशिया ही नहीं, पूरी वैश्विक कूटनीति को देना होगा।

और सबसे बड़ा प्रश्न यही—अगर पहलगाम के पीछे पाकिस्तान की भूमिका का प्रमाण भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखता है, तो क्या कुआलालंपुर अपनी वर्तमान स्थिति पर पुनर्विचार करेगा?

फिलहाल अनवर इब्राहिम ने दरवाजा बंद नहीं किया है। उन्होंने सिर्फ इतना कहा है कि दरवाजा खोलने के लिए उन्हें ‘ठोस सबूत’ चाहिए।

यही भारत की अगली कूटनीतिक चुनौती भी है और परीक्षा भी।

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