“घर-घर विराजे मंगलमूर्ति, शुरू हुआ 10 दिवसीय गणेशोत्सव; पहले दिन गणेश चालीसा और आरती से करें बप्पा का अभिनंदन”

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 14 सितंबर

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के साथ सोमवार से देशभर में गणेशोत्सव का शुभारंभ हो गया है। अगले दस दिनों तक घरों, मंदिरों और सार्वजनिक पंडालों में प्रथम पूज्य भगवान गणेश की विधि-विधान से आराधना की जाएगी।

कहीं ढोल-नगाड़ों के बीच बप्पा का स्वागत होगा तो कहीं परिवार के लोग श्रद्धा और भक्ति के साथ गणेश प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना करेंगे।धार्मिक मान्यताओं में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता और बुद्धि-विवेक के देवता के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी का स्मरण करने से कार्य निर्विघ्न पूरा होने की कामना की जाती है। यही कारण है कि गणेश चतुर्थी का पहला दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है।

पहले दिन गणेश चालीसा का पाठ क्यों?

गणेशोत्सव के प्रथम दिन गणपति की प्रतिमा स्थापित करने के बाद श्रद्धालु स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान गणेश का ध्यान, पूजन और आरती करते हैं। धार्मिक आस्था के अनुसार, इस अवसर पर गणेश चालीसा का पाठ करना शुभ माना जाता है।भक्तों की मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक गणेश चालीसा का पाठ करने से मन को एकाग्रता मिलती है और भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है। हालांकि, इसका फल पूरी तरह धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत विश्वास का विषय है।

गणेश चालीसा

दोहा

विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

चौपाई

जय जय जय गणपति गणराजू।

मंगल भरण करण शुभ काजू॥

जै गजबदन सदन सुखदाता।

विश्व विनायका बुद्धि विधाता॥

वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना।

तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

राजत मणि मुक्तन उर माला।

स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।

मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित।

चरण पादुका मुनि मन राजित॥

धनि शिव सुवन षडानन भ्राता।

गौरी लालन विश्व-विख्याता॥

ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे।

मुषक वाहन सोहत द्वारे॥

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।

अति शुची पावन मंगलकारी॥

एक समय गिरिराज कुमारी।

पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।

तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा॥

अतिथि जानी के गौरी सुखारी।

बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा।

मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।

बिना गर्भ धारण यहि काला॥

गणनायक गुण ज्ञान निधाना।

पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

अस कही अन्तर्धान रूप हवै।

पालना पर बालक स्वरूप हवै॥

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।

लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।

नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥

शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं।

सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा।

देखन भी आये शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।

बालक, देखन चाहत नाहीं॥

गिरिजा कछु मन भेद बढायो।

उत्सव मोर, न शनि तुही भायो॥

कहत लगे शनि, मन सकुचाई।

का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।

शनि सों बालक देखन कहयऊ॥

पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।

बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥

गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी।

सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी॥

हाहाकार मच्यौ कैलाशा।

शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।

काटी चक्र सो गज सिर लाये॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो।

प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।

प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।

पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥

चले षडानन, भरमि भुलाई।

रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।

तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

धनि गणेश कही शिव हिये हरषे।

नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।

शेष सहसमुख सके न गाई॥

मैं मतिहीन मलीन दुखारी।

करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।

जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥

अब प्रभु दया दीना पर कीजै।

अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

दोहा

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।

नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥

सम्बन्ध अपने सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।

पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ती गणेश॥

पूजा के बाद करें गणेश जी की आरती

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

जय गणेश जय गणेश…

एकदंत दयावंत, चार भुजा धारी।

माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी॥

जय गणेश जय गणेश…

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।

लड्डू के भोग लगे, संत करें सेवा॥

जय गणेश जय गणेश…

अंधे को आंख देत, कोढ़िन को काया।

बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥

जय गणेश जय गणेश…

‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

जय गणेश जय गणेश…

बप्पा की पूजा में पढ़ें ये मंत्र

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

एकदन्ताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नमः।

प्रपन्न जनपालाय प्रणतार्ति विनाशिने॥

ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि,तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥

ॐ गं गणपतये नमो नमः।

ॐ वक्रतुण्डाय हुं॥

गणेशोत्सव का संदेश: उत्सव के साथ संस्कार भी गणेशोत्सव केवल प्रतिमा स्थापना और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह पर्व भारतीय परंपरा में बुद्धि, विवेक, अनुशासन और शुभारंभ के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। ऐसे में उत्सव के दौरान श्रद्धा के साथ स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक सद्भाव और सार्वजनिक व्यवस्था का ध्यान रखना भी जरूरी है।

घर हो या सार्वजनिक पंडाल—गणपति के स्वागत का वास्तविक भाव तभी सार्थक माना जा सकता है, जब भक्ति के साथ जिम्मेदारी भी दिखाई दे।

दस दिनों तक चलने वाला यह उत्सव इसी आस्था, उल्लास और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक है।

एन एस के न्यूज इंडिया की ओर से सभी पाठकों को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं।

🌹🙏”गणपति बप्पा मोरया! मंगल मूर्ति मोरया!“🙏🌹

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