पीएम मोदी से मिले बचपन के दोस्त असगर अली वोरा, BJP विधायक पर जमीन हड़पने के आरोप; CBI जांच की मांग से गरमाई सियासत, कांग्रेस ने भी साधा पीएम मोदी पर निशाना

बी के झा

NSK news India

नई दिल्ली/मुंबई, 14 सितंबर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके कथित बचपन के दोस्त असगर अली वोरा की मुलाकात के बाद महाराष्ट्र के मीरा-भायंदर से जुड़ा एक पुराना जमीन विवाद अचानक राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। वोरा ने प्रधानमंत्री के सामने अपनी जमीन से जुड़े विवाद को उठाते हुए भारतीय जनता पार्टी के विधायक नरेंद्र मेहता से जुड़े लोगों पर गंभीर आरोप लगाए हैं और पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की है।

वोरा का दावा है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गुजरात के वडनगर स्थित बी.एन. स्कूल में पढ़ चुके हैं। महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने प्रधानमंत्री और वोरा की मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की। सरनाईक ने उम्मीद जताई कि प्रधानमंत्री अपने पुराने मित्र को न्याय दिलाने की दिशा में जरूर पहल करेंगे।

1989 में खरीदी जमीन, 2011 के बाद बदल गई कहानी

असगर अली वोरा के मुताबिक, उन्होंने वर्ष 1989 में भायंदर पूर्व के नवघर इलाके में करीब 2,810 वर्गमीटर जमीन एक पंजीकृत एग्रीमेंट के जरिए खरीदी थी। उनका दावा है कि उन्होंने न तो यह जमीन बेची और न ही किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था के नाम हस्तांतरित की।वोरा का आरोप है कि वर्ष 2011 में उनकी जानकारी के बिना कथित तौर पर जाली दस्तावेज तैयार किए गए और जमीन को दो हिस्सों में बांटकर अलग-अलग संस्थाओं के नाम मालिकाना हक दिखाया गया।उनके अनुसार, एक हिस्से का मालिक स्वयं बिल्डर्स को और दूसरे हिस्से का मालिक सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शंस को दर्शाया गया। वोरा का आरोप है कि सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शंस का संबंध भाजपा विधायक नरेंद्र मेहता से है।

नगर निगम से लेकर पुलिस और राजस्व विभाग तक उठे सवाल

वोरा ने मीरा-भायंदर नगर निगम के नगर नियोजन विभाग पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि जमीन पर अपने स्वामित्व के दावे के बावजूद निगम ने विवादित भूखंड पर निर्माण की अनुमति दे दी।उन्होंने नगर निगम, राजस्व विभाग और स्थानीय पुलिस के कुछ अधिकारियों पर भी आरोप लगाया कि कथित दस्तावेजी हेराफेरी में शामिल लोगों के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई।

हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित पक्षों का आधिकारिक और विस्तृत पक्ष सामने आना अभी बाकी है। इसलिए मामले में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।

2015 में FIR, 2026 में CID रिपोर्ट का दावावोरा के मुताबिक, उन्होंने कथित जालसाजी को लेकर वर्ष 2015 में एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके बाद मामला न्यायालय तक पहुंचा। उनका दावा है कि एफआईआर दर्ज होने के करीब 11 वर्ष बाद, यानी 2026 में सीआईडी की रिपोर्ट अदालत में पेश की गई।वोरा ने इस कथित देरी को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

उनका आरोप है कि राजनीतिक प्रभाव के कारण जांच और कार्रवाई की रफ्तार प्रभावित हुई हो सकती है।वोरा ने यह भी दावा किया कि वर्ष 2025 में उनके खिलाफ बिना पूर्व सूचना दिए और उनका पक्ष सुने बिना जवाबी मुकदमा दर्ज कराया गया।

पीएम से मुलाकात के बाद प्रशासन सक्रिय

प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद यह विवाद एक बार फिर प्रशासनिक स्तर पर सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। मामले में 16 सितंबर को सुनवाई निर्धारित की गई है और संबंधित कंपनियों के प्रतिनिधियों को उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।अब निगाहें इस बात पर हैं कि सुनवाई के दौरान जमीन के दस्तावेज, कथित स्वामित्व परिवर्तन, निर्माण की अनुमति और जांच प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड किस तस्वीर को सामने रखते हैं।

पवन खेड़ा का पीएम मोदी पर सीधा हमला

मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। कांग्रेस नेता और सांसद पवन खेड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया पर सवाल किया कि क्या प्रधानमंत्री अपने बचपन के मित्र असगर अली को कथित भू-माफिया विधायक से न्याय दिलाएंगे या इस मामले में भी उन्हें धर्म ही दिखाई देगा।

खेड़ा की टिप्पणी ने विवाद को जमीन के कागजात और प्रशासनिक कार्रवाई से आगे बढ़ाकर सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

अब असली परीक्षा जांच की निष्पक्षता की

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जमीन का असली मालिक कौन है। असली सवाल यह भी है कि यदि दस्तावेजों में हेराफेरी हुई है तो वह किस स्तर पर हुई, किसके लाभ के लिए हुई और वर्षों तक प्रशासनिक तंत्र उसकी तह तक क्यों नहीं पहुंच पाया?

प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत परिचय का दावा किसी व्यक्ति के जमीन संबंधी अधिकार को अपने आप साबित नहीं करता। लेकिन यदि वोरा द्वारा लगाए गए आरोप दस्तावेजों और जांच में सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल निजी संपत्ति विवाद नहीं रहेगा, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड, नगर नियोजन, पुलिस कार्रवाई और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा।

अब गेंद जांच एजेंसियों और संबंधित प्रशासन के पाले में है। निष्पक्ष जांच ही यह तय करेगी कि यह महज जमीन का पुराना विवाद है या फिर इसके पीछे दस्तावेजी हेराफेरी और प्रभाव के इस्तेमाल की कोई बड़ी कहानी छिपी है।

एनएसके की नजर अब 16 सितंबर की सुनवाई और आगे होने वाली कार्रवाई पर रहेगी।

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