‘रवैया सुधारो, तेल कहीं और से खरीदो’—अमेरिका की भारत-चीन को खुली चेतावनी; रूस पर शिकंजा कसने वाला बड़ा बिल अमेरिकी संसद से पास, ट्रंप को रूसी तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार; भारतीय ऊर्जा सुरक्षा और रूस से रिश्तों पर बढ़ा दबाव

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली/वॉशिंगटन, 17 सितंबर

रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच तनाव अब एक नए और ज्यादा संवेदनशील मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़ा ‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026’ पारित कर दिया है। विधेयक को 262-159 मतों से मंजूरी मिली। इससे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर परिस्थितियों के अनुसार 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। बिल अभी अपने-आप भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क नहीं लगा रहा है। इसके लागू होने के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति और कानून में निर्धारित परिस्थितियों के अनुसार प्रशासनिक कार्रवाई जरूरी होगी।

लेकिन राजनीतिक संदेश बेहद स्पष्ट है—वॉशिंगटन रूस की ऊर्जा खरीद के जरिए मॉस्को तक पहुंचने वाले राजस्व को सीमित करना चाहता है और इसके लिए भारत तथा चीन जैसे बड़े खरीदारों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने को तैयार है।और इसी बीच अमेरिकी डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने भारत और चीन को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा कि दोनों देश अपना रवैया सुधारें और तेल-गैस कहीं और से खरीदें।

उनका संदेश था—“Appeasement is not a strategy.”अमेरिका का संदेश सिर्फ रूस को नहीं, भारत को भी

इस विधेयक का मूल निशाना रूस है। अमेरिका का आरोप है कि रूसी ऊर्जा से होने वाली आय यूक्रेन युद्ध के लिए मॉस्को की आर्थिक क्षमता को बनाए रखने में मदद करती है।लेकिन कानून में विदेशी खरीदारों पर संभावित टैरिफ का प्रावधान इसे रूस के खिलाफ सामान्य प्रतिबंध से कहीं आगे ले जाता है।अब सवाल यह है कि अमेरिका रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए भारत और चीन जैसे देशों पर कितनी दूर तक दबाव डाल सकता है?

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता रहा है। इसलिए यदि वॉशिंगटन वास्तव में 100 प्रतिशत तक टैरिफ का इस्तेमाल करता है तो इसका असर केवल भारत-अमेरिका व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। ऊर्जा लागत, रिफाइनिंग अर्थशास्त्र, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत, निर्यात प्रतिस्पर्धा और वैश्विक तेल बाजार तक इसकी लहर पहुंच सकती है।

ब्लूमेंथल की खुली चेतावनी

विधेयक के प्रतिनिधि सभा से पारित होने के बाद सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने भारत और चीन को स्पष्ट संदेश दिया।उन्होंने कहा कि दोनों देशों को अपना रवैया सुधारना चाहिए और तेल तथा गैस कहीं और से खरीदना चाहिए। ब्लूमेंथल ने रूस के साथ आर्थिक संबंधों को लेकर ‘तुष्टिकरण’ की नीति को रणनीति मानने से इनकार किया।यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल रूस के खिलाफ अमेरिकी नीति नहीं बताता, बल्कि भारत जैसे देश को भी यह संदेश देता है कि यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में वॉशिंगटन अपनी आर्थिक नीति में ‘तटस्थ खरीदार’ और ‘रूस के समर्थक’ के बीच अंतर को पहले की तुलना में कम करने की कोशिश कर रहा है।लेकिन भारत के लिए तस्वीर इतनी आसान नहीं है।

भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल—तेल कहां से आएगा?

भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसकी ऊर्जा जरूरत लगातार बढ़ रही है।रूसी तेल खरीदने का एक प्रमुख कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों और उपलब्ध कीमतों से जुड़ा रहा है। यदि किसी देश से अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी दर पर ऊर्जा उपलब्ध होती है तो उसे छोड़ना केवल विदेश नीति का फैसला नहीं होता—इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।भारत के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है।

एक तरफ अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं। दूसरी तरफ रूस के साथ लंबे समय से चले आ रहे रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक संबंध हैं।नई दिल्ली को इन दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा।

100% टैरिफ का मतलब क्या भारत पर तुरंत 100% टैक्स?

यहीं सबसे ज्यादा भ्रम फैलने की संभावना है।इस कानून का अर्थ यह नहीं है कि आज से भारत के हर अमेरिकी निर्यात पर 100 प्रतिशत शुल्क लग गया।विधेयक राष्ट्रपति को 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। इसका इस्तेमाल कब, किस देश पर और कितनी दर से किया जाएगा, यह अमेरिकी प्रशासन के फैसले और कानून की शर्तों पर निर्भर करेगा।

यानी फिलहाल इसे ‘100% टैरिफ का खतरा’ कहना ज्यादा सटीक है, न कि ‘भारत पर 100% टैरिफ लग चुका है।’यही अंतर अंतरराष्ट्रीय व्यापार की इस खबर को समझने के लिए बेहद जरूरी है।

अमेरिकी संसद में भी पूरी सहमति नहीं

दिलचस्प बात यह है कि भारत और चीन पर संभावित टैरिफ को लेकर अमेरिका के भीतर भी मतभेद हैं।सीनेट ने अगस्त में विधेयक को 86-11 के भारी बहुमत से आगे बढ़ाया था। प्रतिनिधि सभा में यह 262-159 से पारित हुआ और इसमें 58 डेमोक्रेट सांसदों ने रिपब्लिकन सांसदों के साथ मतदान किया।लेकिन डेमोक्रेटिक नेतृत्व के कुछ प्रमुख सदस्यों ने राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने पर आपत्ति जताई। उनकी चिंता यह है कि इन शक्तियों का इस्तेमाल सहयोगी देशों के खिलाफ भी किया जा सकता है और व्यापक छूट या नियमों में मौजूद खामियां कानून की प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकती हैं।इसका अर्थ है कि अमेरिकी राजनीति में भी बहस सिर्फ रूस को दंडित करने पर नहीं, बल्कि राष्ट्रपति को कितनी आर्थिक शक्ति दी जाए, इस सवाल पर भी है।

रूस के ‘शैडो फ्लीट’ पर भी शिकंजा

विधेयक का एक बड़ा हिस्सा रूस के तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर केंद्रित है।ये वे जहाज और समुद्री नेटवर्क हैं जिन पर रूस के तेल कारोबार को मौजूदा प्रतिबंधों से बचाने में मदद करने के आरोप लगते रहे हैं।विधेयक रूस के ऊर्जा क्षेत्र के साथ-साथ अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले नेटवर्क को निशाना बनाने का प्रयास करता है। साथ ही ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को भी बढ़ाने का प्रावधान है।यानी अमेरिकी रणनीति का लक्ष्य केवल रूस के तेल को खरीदने वालों पर दबाव डालना नहीं है, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला को महंगा और कठिन बनाना भी है।

चीन पर भी अमेरिकी दबाव

भारत के साथ चीन भी इस कानून के संभावित निशाने पर है।चीन रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार है और इसलिए वॉशिंगटन का दबाव केवल नई दिल्ली पर केंद्रित नहीं है। अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि अगर रूस को ऊर्जा से होने वाली आमदनी रोकनी है तो उसके बड़े खरीदारों पर भी आर्थिक दबाव डालना होगा।लेकिन चीन और अमेरिका के बीच पहले से व्यापारिक और रणनीतिक तनाव मौजूद है। ऐसे में रूस के मुद्दे पर नया टैरिफ हथियार वैश्विक व्यापार को और जटिल कर सकता है।

क्या अमेरिका भारत को रूस से दूर कर पाएगा?

यह सबसे बड़ा रणनीतिक प्रश्न है।भारत-अमेरिका संबंध पिछले वर्षों में तेजी से मजबूत हुए हैं। रक्षा, तकनीक, निवेश और इंडो-पैसिफिक रणनीति में दोनों देशों का सहयोग महत्वपूर्ण है।लेकिन इसके साथ भारत ने रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को भी पूरी तरह समाप्त नहीं किया है।भारत का दृष्टिकोण यह रहा है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के फैसले उसकी अपनी जरूरतों के अनुसार होने चाहिए।यही वजह है कि अमेरिकी दबाव के बावजूद नई दिल्ली के सामने रूस से ऊर्जा खरीद पूरी तरह बंद करने का फैसला आसान नहीं होगा।

विशेषज्ञों की नजर में असली लड़ाई तेल की नहीं, रणनीतिक स्वायत्तता की

विदेश नीति विशेषज्ञों के अनुसार, यह विवाद केवल रूस के तेल की कीमत का मामला नहीं है। इसके केंद्र में भारत की strategic autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता का सवाल भी है।भारत यदि अमेरिकी दबाव में रूसी ऊर्जा खरीद कम करता है तो इससे वॉशिंगटन के साथ रिश्तों को फायदा मिल सकता है, लेकिन ऊर्जा आपूर्ति की लागत और रूस के साथ संबंधों पर उसका प्रभाव भी देखना होगा।

दूसरी तरफ अगर भारत रूसी तेल खरीद जारी रखता है और अमेरिका टैरिफ लागू करता है तो भारतीय निर्यातकों और अमेरिकी बाजार तक पहुंच पर दबाव बढ़ सकता है।इसलिए नई दिल्ली को दोनों तरफ की लागत और लाभ का हिसाब करना होगा।

भारत के लिए तीन संभावित रास्ते

इस पूरे विवाद में भारत के सामने मोटे तौर पर तीन रणनीतिक विकल्प दिखाई देते हैं।

पहला—रूसी तेल की खरीद धीरे-धीरे कम करना। इससे अमेरिकी दबाव घट सकता है, लेकिन भारत की ऊर्जा खरीद लागत और आपूर्ति व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

दूसरा—रूस से खरीद जारी रखते हुए अमेरिका से बातचीत करना। इसमें भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हित का तर्क सामने रख सकता है।

तीसरा—ऊर्जा स्रोतों को और विविध बनाना। यानी रूस के साथ-साथ पश्चिम एशिया, अमेरिका, अफ्रीका और अन्य उत्पादक देशों से आयात बढ़ाकर किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम करना।इनमें से कौन सा रास्ता अपनाया जाएगा, यह अंततः भारत की आर्थिक और विदेश नीति प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।

क्या भारत के खिलाफ अमेरिकी दबाव बढ़ता जा रहा है?

ताजा घटनाक्रम को अलग-अलग घटनाओं की बजाय एक श्रृंखला के रूप में देखने पर तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होती है।पहले अमेरिकी टैरिफ नीति को लेकर भारत-अमेरिका के बीच तनाव रहा। अब रूस से ऊर्जा खरीद पर संभावित 100 प्रतिशत तक टैरिफ का अधिकार देने वाला कानून सामने आया है।और उसके तुरंत बाद एक अमेरिकी सीनेटर भारत को सार्वजनिक तौर पर रूस से तेल खरीद बंद करने की सलाह देता है।यह निश्चित रूप से अमेरिकी दबाव के बढ़ते स्तर का संकेत है। लेकिन इसे सीधे तौर पर भारत-अमेरिका संबंधों के टूटने के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा।

रूस की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी

मॉस्को के लिए भारत और चीन केवल ग्राहक नहीं हैं। दोनों देश रूसी ऊर्जा व्यापार के महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं।अगर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत रूसी तेल की खरीद कम करता है तो रूस को अपने ऊर्जा निर्यात के लिए नए बाजार तलाशने पड़ सकते हैं।इसका असर वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ सकता है।यानी अमेरिकी कानून का वास्तविक प्रभाव केवल वॉशिंगटन और मॉस्को के बीच नहीं रहेगा—इसका असर दिल्ली, बीजिंग और वैश्विक ऊर्जा बाजार तक पहुंच सकता है।

अब भारत के सामने असली परीक्षा

अमेरिका का संदेश स्पष्ट है—रूस से ऊर्जा खरीदकर मॉस्को की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले देशों को आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

भारत का संदेश भी उतना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए—ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति के फैसले उसके अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर होंगे।

आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा नजर इस बात पर होगी कि राष्ट्रपति ट्रंप इस कानून पर क्या फैसला लेते हैं और यदि हस्ताक्षर होते हैं तो भारत के खिलाफ उपलब्ध 100 प्रतिशत तक के टैरिफ अधिकार का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है।

फिलहाल खतरा टैरिफ लगने का है, टैरिफ लग चुका होने का नहीं। लेकिन अमेरिकी संसद के इस कदम ने भारत के लिए एक नई रणनीतिक चुनौती जरूर खड़ी कर दी है।

अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत रूस से तेल खरीदेगा या नहीं।

सवाल यह है कि क्या नई दिल्ली अमेरिकी दबाव, रूस से पुराने संबंध और देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों—तीनों के बीच ऐसा संतुलन बना पाएगी, जिसमें भारत का राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर रहे?

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