अरब सागर में भारत-पाक नौसैनिक टक्कर से तनाव ! PNS हुनैन की भारतीय युद्धपोत से भिड़ंत के बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे पर लगाए गंभीर आरोप; 1991 के समझौते का हवाला देकर दिल्ली ने जताया कड़ा विरोध, इस्लामाबाद ने बताया ‘उकसावे वाली कार्रवाई’; सवाल—क्या समुद्र की यह टक्कर किसी बड़े सैन्य संकट का संकेत है?

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली/इस्लामाबाद, 17 सितंबर

अरब सागर में भारतीय और पाकिस्तानी नौसैनिक पोतों की टक्कर ने पिछले साल के सैन्य तनाव के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों को एक बार फिर संवेदनशील मोड़ पर ला दिया है।

15 सितंबर की शाम उत्तरी अरब सागर में पाकिस्तान नौसेना का PNS Hunain एक भारतीय नौसैनिक युद्धपोत के संपर्क में आया। भारत का कहना है कि घटना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई और पाकिस्तानी नौसैनिक इकाई ने तेज गति से असुरक्षित तथा गैर-पेशेवर तरीके से भारतीय पोत के करीब आकर टक्कर की स्थिति पैदा की।

पाकिस्तान इसके उलट दावा कर रहा है कि भारतीय पोत ने उसके एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन में उकसावे वाली गतिविधि की।घटना के बाद मामला समुद्र से निकलकर कूटनीतिक गलियारों तक पहुंच गया। नई दिल्ली ने पाकिस्तान के चार्ज डी’अफेयर्स को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया। इसके जवाब में इस्लामाबाद ने भी भारतीय राजनयिक को बुलाकर अपनी शिकायत दर्ज कराई। यानी दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप अब आधिकारिक राजनयिक स्तर पर पहुंच चुके हैं।

क्या हुआ था अरब सागर में?

भारतीय पक्ष के अनुसार भारतीय नौसैनिक पोत नियमित निगरानी मिशन पर था। भारतीय सूत्रों का दावा है कि PNS Hunain तेज गति से भारतीय युद्धपोत के करीब आया और असुरक्षित तरीके से उसकी दिशा काटने की कोशिश की, जिसके बाद दोनों पोतों के बीच संपर्क हुआ। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक भारतीय पोत को कोई बड़ी संरचनात्मक क्षति या जनहानि नहीं हुई और वह अपना मिशन जारी रखने में सक्षम रहा, जबकि पाकिस्तानी पोत को नुकसान पहुंचने के बाद वापस बंदरगाह की ओर जाते देखा गया।

हालांकि पाकिस्तान का संस्करण पूरी तरह अलग है। इस्लामाबाद का कहना है कि उसकी नौसेना SEASPARK-26 अभ्यास कर रही थी और भारतीय पोत ने पाकिस्तानी युद्धपोत के बेहद करीब आकर आक्रामक गतिविधि की। पाकिस्तान ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और 1991 के द्विपक्षीय समझौते के उल्लंघन से जोड़ा है।यानी इस समय घटना की जिम्मेदारी को लेकर दोनों देशों के आधिकारिक दावे आमने-सामने हैं।

1991 का समझौता क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत ने अपने विरोध में 1991 के Advance Notice on Military Exercises, Manoeuvres and Troop Movements समझौते के Article 10 का उल्लेख किया है।इस समझौते का मकसद ही दोनों देशों की सैन्य गतिविधियों के बीच गलतफहमी और आकस्मिक टकराव की संभावना कम करना था। रिपोर्टों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में दोनों देशों के नौसैनिक पोतों और पनडुब्बियों के बीच कम-से-कम तीन समुद्री मील की दूरी बनाए रखने का प्रावधान है।इसलिए विवाद केवल एक समुद्री दुर्घटना का नहीं रह गया है। अगर किसी पक्ष ने वास्तव में निर्धारित सुरक्षा प्रावधानों का उल्लंघन किया है तो यह दोनों देशों के बीच स्थापित सैन्य विश्वास-निर्माण तंत्र के लिए गंभीर विषय बन सकता है।

क्या यह युद्ध की शुरुआत है?

यही वह सवाल है जिसने भारत में सुरक्षा विशेषज्ञों से लेकर आम नागरिकों तक चर्चा तेज कर दी है।लेकिन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अभी इस घटना को युद्ध की शुरुआत कहना उचित नहीं होगा।दोनों देशों ने राजनयिक विरोध दर्ज कराया है। भारत ने सैन्य इकाइयों को संबंधित समझौतों का सम्मान करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सावधानी बरतने को कहा है। इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल दोनों पक्ष घटना को सैन्य कार्रवाई में बदलने के बजाय कूटनीतिक और सैन्य चैनलों के जरिए संभालने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन चिंता इसलिए गंभीर है क्योंकि यह घटना ऐसे समय हुई है जब भारत-पाकिस्तान संबंध पहले से बेहद संवेदनशील हैं और दोनों देशों के बीच पिछले साल प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष हो चुका है।

रक्षा विशेषज्ञों के लिए असली चिंता क्या?

समुद्र में युद्धपोतों की नजदीकी गतिविधि अपने आप में असामान्य नहीं है। असली खतरा तब पैदा होता है जब दो विरोधी देशों की सैन्य इकाइयां बेहद करीब आ जाएं, चेतावनियों की अनदेखी हो या किसी स्थानीय घटना को राजनीतिक नेतृत्व अलग अर्थ दे दे।

रक्षा मामलों के जानकारों के मुताबिक आधुनिक सैन्य संकट में सबसे बड़ा खतरा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि miscalculation यानी गलत अनुमान से भी पैदा हो सकता है।एक छोटी समुद्री घटना अगर गलत तरीके से पेश की जाए, सोशल मीडिया पर उग्र दावों के साथ फैले और उसके बाद राजनीतिक दबाव बढ़े, तो संकट तेजी से व्यापक रूप ले सकता है।इसीलिए सैन्य तैयारी के साथ-साथ सैन्य-से-सैन्य संवाद और संकट प्रबंधन तंत्र भी महत्वपूर्ण है।

GD बख्शी की चेतावनी ने क्यों बढ़ाई चर्चा?

इसी बीच सेवानिवृत्त मेजर जनरल जीडी बख्शी की रक्षा तैयारियों को लेकर दी गई चेतावनियां भी चर्चा में हैं। उन्होंने भारत से सैन्य तैयारी में तेजी लाने और वायु रक्षा, लड़ाकू विमान तथा नौसैनिक क्षमता जैसे क्षेत्रों में कमियों को दूर करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।उनके सुझाए विकल्पों में रूस से अतिरिक्त S-400, S-500, Su-57 जैसे प्लेटफॉर्म तथा पनडुब्बी और मिसाइल क्षमता बढ़ाने के प्रस्ताव शामिल हैं।हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये जीडी बख्शी के सुझाव हैं, भारत सरकार द्वारा घोषित सैन्य खरीद योजना नहीं। इसलिए इन सुझावों को सरकारी नीति की तरह प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

क्या भारत को एक साथ पश्चिम और उत्तरी मोर्चे की चिंता करनी होगी?

भारत की सुरक्षा चुनौती पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। देश की पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान और उत्तरी सीमा पर चीन है। इसलिए भारतीय सैन्य योजना लंबे समय से दो अलग-अलग दिशाओं में संभावित चुनौतियों को ध्यान में रखती रही है।लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि अरब सागर की घटना के बाद भारत को निश्चित रूप से एक साथ दो मोर्चों पर युद्ध का सामना करना पड़ेगा।ऐसी स्थिति का आकलन सैन्य तैनाती, खुफिया जानकारी, कूटनीतिक घटनाक्रम और दोनों पड़ोसी देशों के वास्तविक कदमों पर निर्भर करेगा।यही वजह है कि रक्षा विशेषज्ञ अक्सर two-front contingency की तैयारी और वास्तविक दो-मोर्चे के युद्ध के बीच अंतर करते हैं।

चीन की भूमिका—सबसे बड़ा रणनीतिक सवाल

भारत-पाकिस्तान संकट में चीन की भूमिका पर चर्चा स्वाभाविक है क्योंकि चीन और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से रक्षा एवं रणनीतिक संबंध हैं।पाकिस्तान की नौसेना के आधुनिकीकरण में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पाकिस्तान के Hangor-class submarines कार्यक्रम और अन्य रक्षा सहयोग इसका उदाहरण हैं।लेकिन इस आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि अरब सागर की मौजूदा घटना में चीन की प्रत्यक्ष भूमिका है, फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक प्रमाणों से साबित नहीं होता।

भारत के लिए वास्तविक चिंता इससे बड़ी है—यदि भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता है तो चीन किस स्तर तक पाकिस्तान के साथ खड़ा होगा?

इसका जवाब अभी अनुमान का विषय है। बीजिंग की वास्तविक नीति उस समय के रणनीतिक और कूटनीतिक हालात पर निर्भर करेगी।

तुर्की का कोण भी कम महत्वपूर्ण नहीं

पाकिस्तान और तुर्की के बीच रक्षा संबंध पिछले वर्षों में मजबूत हुए हैं। पाकिस्तान ने तुर्की से नौसैनिक प्लेटफॉर्म और रक्षा तकनीक हासिल की है तथा दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग भी रहा है।

PNS Hunain स्वयं तुर्की निर्मित जहाज नहीं है; यह Damen के OPV 2600 डिजाइन पर आधारित पोत है और 2024 में पाकिस्तानी नौसेना में शामिल हुआ था।इसलिए मौजूदा टक्कर को सीधे तुर्की की सैन्य भूमिका से जोड़ना अभी प्रमाणित नहीं है। हां, अगर भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव किसी बड़े सैन्य संकट में बदलता है तो पाकिस्तान के रक्षा साझेदारों की राजनीतिक और सैन्य स्थिति निश्चित रूप से रणनीतिक गणना का हिस्सा बनेगी।

क्या तुर्की युद्ध में पाकिस्तान का साथ देगा?

यह सवाल राजनीतिक रूप से चर्चा में हो सकता है, लेकिन अभी इसका निश्चित जवाब देना संभव नहीं है। तुर्की-पाकिस्तान के बीच रणनीतिक संबंध हैं, मगर किसी संभावित भारत-पाकिस्तान युद्ध में तुर्की सीधे सैन्य हस्तक्षेप करेगा—ऐसा कोई वर्तमान सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं है।कूटनीतिक समर्थन, हथियारों की आपूर्ति, तकनीकी सहयोग और प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप चार अलग-अलग स्तर हैं। इन्हें एक ही श्रेणी में रखना रणनीतिक विश्लेषण को कमजोर कर सकता है।

क्या भारत के भीतर भी सुरक्षा चुनौती बढ़ सकती है?

किसी भी भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान आंतरिक सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय बन जाती है।लेकिन ‘भारत के अंदर पाकिस्तान समर्थक लोग खतरा हैं’ जैसी व्यापक धारणा को बिना प्रमाण के पूरे किसी समुदाय या नागरिक समूह पर लागू करना उचित नहीं होगा।

सुरक्षा एजेंसियों की वास्तविक चिंता उन विशिष्ट व्यक्तियों या नेटवर्कों से होती है जिनके खिलाफ आतंकवाद, जासूसी, हिंसा या अवैध गतिविधियों के ठोस सबूत हों।इसके अलावा आधुनिक संघर्ष में साइबर हमले, दुष्प्रचार, फर्जी वीडियो, फेक न्यूज और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की कोशिशें भी सुरक्षा चुनौती बन सकती हैं।इसलिए आंतरिक सुरक्षा का जवाब सामूहिक संदेह नहीं, बल्कि खुफिया जानकारी, कानून और साक्ष्य आधारित कार्रवाई है।

विदेश मंत्रालय की लाइन—संयम के साथ कड़ा विरोध

भारत ने पाकिस्तान के चार्ज डी’अफेयर्स को तलब करके स्पष्ट संदेश दिया है कि वह घटना को सामान्य नहीं मान रहा।लेकिन साथ ही भारत ने सैन्य इकाइयों से उचित सावधानी और द्विपक्षीय समझौतों का सम्मान करने को कहा है।

यानी नई दिल्ली की तत्काल प्रतिक्रिया दो हिस्सों वाली दिखाई देती है—कूटनीतिक स्तर पर कड़ा विरोध और सैन्य स्तर पर अनावश्यक escalation से बचाव।

रक्षा मंत्रालय के सामने अब क्या चुनौती?

रक्षा मंत्रालय और भारतीय नौसेना के सामने सबसे महत्वपूर्ण काम घटना की पूरी operational picture तैयार करना होगा।

किस पोत ने कितनी गति से दिशा बदली?

किस दूरी पर दोनों जहाज थे?

क्या रेडियो चेतावनी दी गई?

किसने किस दिशा में maneuver किया?

क्या 1991 समझौते की दूरी संबंधी शर्त लागू होती थी?

और क्या घटना में किसी प्रकार की जानबूझकर की गई गतिविधि का संकेत है?

इन सवालों के जवाब सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि जहाजों के लॉग, संचार रिकॉर्ड, रडार डेटा और उपलब्ध अन्य साक्ष्यों से मिलेंगे।

विपक्ष के लिए भी बड़ा सवाल—सरकार कितनी जानकारी सार्वजनिक करे?

विपक्षी दलों की ओर से सरकार से सवाल उठना स्वाभाविक है कि समुद्री सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत है और घटना की पूरी जानकारी संसद तथा जनता को कब दी जाएगी।लेकिन रक्षा मामलों में हर operational detail सार्वजनिक करना संभव नहीं होता। इसलिए एक संतुलित बहस यह हो सकती है कि सरकार संवेदनशील सैन्य जानकारी सुरक्षित रखते हुए घटना की जिम्मेदारी, सुरक्षा प्रोटोकॉल और भविष्य की रोकथाम पर पर्याप्त जानकारी दे।

2011की घटना की याद क्यों आई?

यह घटना 2011 के उस समुद्री टकराव की याद भी दिलाती है जब पाकिस्तानी नौसैनिक पोत PNS Babur और भारतीय INS Godavari के बीच Gulf of Aden में संपर्क हुआ था। उस समय भी दोनों पक्षों ने घटना की जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग दावे किए थे।लेकिन आज की परिस्थितियां ज्यादा संवेदनशील हैं, क्योंकि दोनों देशों के बीच पिछले वर्ष प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष हो चुका है।इसलिए किसी भी नई सैन्य घटना की राजनीतिक संवेदनशीलता पहले की तुलना में ज्यादा है।

आम नागरिक पूछ रहा है—क्या फिर युद्ध होगा?

देश में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या समुद्र में हुई यह टक्कर किसी बड़े संघर्ष की भूमिका है।एक आम नागरिक का कहना है कि भारत को युद्ध नहीं चाहिए, लेकिन किसी भी खतरे के सामने कमजोर भी नहीं दिखना चाहिए। उसके अनुसार मजबूत सेना और मजबूत कूटनीति दोनों साथ-साथ चलनी चाहिए।

एक शिक्षाविद का मत है कि युद्ध के नारों से ज्यादा जरूरी है कि जनता को सही जानकारी मिले। उनके अनुसार भारत-पाकिस्तान जैसे परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच तनाव को सोशल मीडिया की उत्तेजना से नहीं बल्कि संस्थागत संवाद और तथ्यात्मक सूचनाओं से संभालना चाहिए।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े विश्लेषकों की चिंता यह है कि समुद्र में accidental escalation को रोकने के लिए दोनों देशों के सैन्य संचार तंत्र सक्रिय रहना चाहिए।

फिलहाल सबसे बड़ा खतरा युद्ध नहीं, गलत अनुमान

अरब सागर की यह घटना गंभीर है। दोनों देशों ने राजनयिक विरोध दर्ज कराया है और एक-दूसरे पर आरोप लगाए हैं। भारत इसे अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र की घटना और पाकिस्तानी पोत के असुरक्षित व्यवहार से जोड़ रहा है, जबकि पाकिस्तान इसे अपने EEZ और नौसैनिक अभ्यास में भारतीय ‘उकसावे’ के रूप में देख रहा है।

लेकिन अभी उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर इसे पाकिस्तान की ओर से युद्ध की औपचारिक शुरुआत कहना जल्दबाजी होगी।

असल परीक्षा अब यह है कि दोनों देशों की सेनाएं और सरकारें इस घटना के बाद क्या करती हैं।अगर सैन्य और कूटनीतिक चैनल सक्रिय रहते हैं, जांच होती है और समुद्री सुरक्षा प्रोटोकॉल मजबूत किए जाते हैं तो घटना एक गंभीर लेकिन सीमित संकट रह सकती है।लेकिन अगर आरोपों के बाद सैन्य तैनाती, जवाबी कार्रवाई और राजनीतिक बयानबाजी लगातार बढ़ती है, तो जोखिम का स्तर अलग हो सकता है।

निष्कर्ष

अरब सागर में PNS Hunain और भारतीय नौसैनिक पोत की टक्कर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारत-पाकिस्तान के बीच शांति कितनी नाजुक है।एक समुद्री टक्कर से युद्ध शुरू नहीं होता, लेकिन परमाणु हथियार संपन्न दो देशों के बीच ऐसी घटनाओं को हल्के में भी नहीं लिया जा सकता।

भारत को अपनी नौसैनिक निगरानी, वायु रक्षा, मिसाइल क्षमता और समुद्री संचार व्यवस्था मजबूत रखनी होगी। साथ ही चीन और तुर्की जैसे पाकिस्तान के रणनीतिक साझेदारों की गतिविधियों पर नजर रखना भी स्वाभाविक सुरक्षा आवश्यकता है।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात—तैयारी और संयम दोनों साथ चाहिए।

भारत के लिए संदेश यही होना चाहिए कि देश की सुरक्षा तैयारियों में कोई ढिलाई न हो, लेकिन हर सैन्य घटना को युद्ध का संकेत मानकर प्रतिक्रिया भी न दी जाए।

क्योंकि आज के परमाणु युग में असली रणनीतिक ताकत केवल युद्ध लड़ने की क्षमता नहीं, बल्कि युद्ध को अनावश्यक रूप से शुरू होने से रोकने की क्षमता भी है।

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