बी के झा
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नई दिल्ली, 21 सितंबर
दिल्ली में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया अब केवल मतदाता सूची के आंकड़ों की कवायद नहीं रह गई है। पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और कई वरिष्ठ अधिकारियों के नामों को लेकर जारी नोटिसों ने राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है। इसी कड़ी में चुनाव आयुक्त डॉ. एसएस संधू को भेजे गए नोटिस को लेकर अब निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी यानी ERO ने स्थिति साफ कर दी है।
ERO, विधानसभा क्षेत्र-38 यानी दिल्ली कैंट के कार्यालय के मुताबिक, डॉ. संधू की मतदाता प्रविष्टि को SIR के दौरान ‘Discrepancy in Name’ यानी नाम में विसंगति की श्रेणी में चिह्नित किया गया था। यह स्थिति पिछले पुनरीक्षण की मतदाता सूची से मौजूदा रिकॉर्ड को लिंक करने की प्रक्रिया के दौरान सामने आई थी।लेकिन अब इस मामले में तस्वीर साफ हो चुकी है।ERO ने बताया है कि डॉ. संधू की ओर से उपलब्ध कराए गए तथ्य, विवरण और दस्तावेजों का विधिवत सत्यापन कर लिया गया है। उनकी मतदाता प्रविष्टि को वैलिडेट कर दिया गया है और उसे 4 नवंबर 2026 को प्रकाशित होने वाली अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए रखा गया है।
आखिर क्यों आया था नोटिस?
यही वह सवाल है जिसने सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा भ्रम पैदा किया। चुनाव अधिकारियों के अनुसार SIR के दौरान दो प्रमुख परिस्थितियों में नोटिस जारी किए जा रहे हैं।
पहली—जब किसी मतदाता की वर्तमान प्रविष्टि पिछली रिवीजन की मतदाता सूची से लिंक नहीं हो पाती।
दूसरी—जब लिंकिंग के दौरान रिकॉर्ड में कोई तार्किक विसंगति सामने आती है।
डॉ. संधू का मामला दूसरी श्रेणी से संबंधित था। यानी नोटिस का आधार उनकी नागरिकता या मतदाता होने की अंतिम अयोग्यता घोषित करना नहीं, बल्कि रिकॉर्ड में सामने आई नाम संबंधी विसंगति थी।
नोटिस का मतलब नाम कटना नहीं
दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने भी इस विवाद के बीच महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। आयोग के अनुसार नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है।प्राधिकरण ने कहा है कि किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे सुनवाई का अवसर दिया जाएगा और उचित कारणों वाला आदेश जारी किया जाएगा, जिसके खिलाफ अपील की व्यवस्था भी रहेगी।यानी SIR में नोटिस एक सत्यापन प्रक्रिया का हिस्सा है, अंतिम निष्कासन का फैसला नहीं।
33 लाख से ज्यादा मतदाताओं को नोटिस
दिल्ली में SIR के दौरान यह मामला इसलिए भी बड़ा बन गया है क्योंकि बड़ी संख्या में मतदाताओं की प्रविष्टियां सत्यापन के लिए चिन्हित हुई हैं। दिल्ली CEO कार्यालय के मुताबिक 19 सितंबर तक 31,63,930 नोटिस तैयार किए जा चुके थे। नोटिस उन मतदाताओं को भेजे गए जिनकी प्रविष्टियां पिछली सूची से लिंक नहीं हो सकीं या जिनके विवरण में तार्किक विसंगतियां मिलीं।इस सूची में देश के बेहद चर्चित नामों का सामने आना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का विषय बन गया।लालकृष्ण आडवाणी और उनके परिवार के कुछ सदस्यों को ‘नो मैपिंग’ श्रेणी में नोटिस मिला।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, CBI निदेशक प्रवीण सूद, SEBI अध्यक्ष तुहिन कांता पांडे और कई वरिष्ठ नौकरशाहों के नाम भी अलग-अलग तरह की विसंगतियों के संदर्भ में सामने आए हैं।
विपक्ष ने उठाए पारदर्शिता के सवाल
SIR को लेकर विपक्षी दलों ने प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने SIR को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज करते हुए इसे मतदाताओं के अधिकारों से जोड़कर देखा है। वहीं आम आदमी पार्टी ने अरविंद केजरीवाल और उनके परिवार को नोटिस मिलने के बाद चुनाव प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक सवाल उठाए हैं।विपक्ष की मुख्य चिंता यह है कि यदि बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस भेजे जा रहे हैं तो प्रत्येक मामले में कारण, सत्यापन प्रक्रिया और दस्तावेजों की मांग को लेकर पर्याप्त स्पष्टता होनी चाहिए।
यह बहस अब न्यायिक स्तर पर भी पहुंच चुकी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में 33 लाख से अधिक नोटिस पाने वाले मतदाताओं के नाम और नोटिस के कारण सार्वजनिक करने की मांग की गई है। मामले की सुनवाई 22 सितंबर को प्रस्तावित है।
कानूनविदों के लिए असली सवाल क्या?
कानूनी दृष्टि से मतदाता सूची का शुद्धिकरण और पात्र मतदाताओं के नाम की सुरक्षा—दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। निर्वाचन प्रक्रिया में गलत, डुप्लीकेट या अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना प्रशासनिक आवश्यकता हो सकती है, लेकिन किसी पात्र मतदाता का नाम हटाने की प्रक्रिया में नोटिस, जवाब, सुनवाई और अपील जैसी प्रक्रियात्मक सुरक्षा महत्वपूर्ण होती है।इसी वजह से डॉ. संधू का मामला एक उपयोगी उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां नोटिस जारी हुआ, दस्तावेज प्रस्तुत हुए, सत्यापन हुआ और उसके बाद प्रविष्टि को वैलिडेट कर दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि नोटिस और अंतिम निर्णय दो अलग-अलग चरण हैं।
शिक्षाविद और सामाजिक संगठनों के लिए भी बड़ा मुद्दा
शिक्षाविदों और नागरिक समाज से जुड़े संगठनों की दृष्टि से SIR जैसी व्यापक प्रक्रिया की सफलता केवल हटाए गए या सत्यापित नामों की संख्या से नहीं मापी जाएगी। असली कसौटी यह होगी कि आम नागरिक के लिए प्रक्रिया कितनी समझने योग्य, सुलभ और पारदर्शी रहती है।खास तौर पर बुजुर्गों, स्थानांतरित होकर दिल्ली में रहने वालों, लंबे समय से बाहर रहने वाले लोगों और ऐसे परिवारों के लिए दस्तावेज जुटाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए प्रशासनिक सत्यापन के साथ नागरिक सहायता तंत्र भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
डॉ. संधू के मामले ने खोला बड़ा सवाल
डॉ. एसएस संधू स्वयं निर्वाचन आयोग से जुड़े शीर्ष पद पर रहे हैं। ऐसे व्यक्ति की प्रविष्टि का SIR के दौरान फ्लैग होना पहली नजर में असाधारण जरूर लगता है। लेकिन ERO के स्पष्टीकरण के बाद उपलब्ध आधिकारिक तस्वीर यह है कि मामला नाम में विसंगति से जुड़ी जांच का था और आवश्यक दस्तावेजों के सत्यापन के बाद उनकी प्रविष्टि वैलिड कर दी गई है।
इससे एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक संदेश भी सामने आता है—SIR में किसी व्यक्ति का कद नहीं, रिकॉर्ड में मिली विसंगति प्रक्रिया का आधार है। उसी प्रक्रिया में फिर दस्तावेजों के सत्यापन के बाद स्थिति स्पष्ट की जाती है।
एन एस के विश्लेषण
दिल्ली की SIR प्रक्रिया अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां मतदाता सूची की शुद्धता और मतदाता के अधिकार—दोनों को साथ लेकर चलना होगा।
चुनाव आयोग का तर्क है कि नोटिस सत्यापन की प्रक्रिया है, जबकि विपक्ष और नागरिक अधिकार समूह पारदर्शिता तथा संभावित बहिष्करण को लेकर सवाल उठा रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच तथ्यात्मक अंतर समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नोटिस को अंतिम निर्णय न माना जाए।
डॉ. एसएस संधू का मामला फिलहाल इसका स्पष्ट उदाहरण है—नोटिस आया, दस्तावेजों की जांच हुई, प्रविष्टि वैलिड हुई और अंतिम मतदाता सूची में नाम शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
अब 4 नवंबर को प्रकाशित होने वाली अंतिम सूची और उससे पहले पूरी होने वाली दावों-आपत्तियों की प्रक्रिया इस व्यापक SIR कवायद की अगली महत्वपूर्ण परीक्षा होगी।
