बी के झा
NSK news India

नई दिल्ली, 24 सितंबर
दिल्ली में सरकार चलाने के तरीके में एक बड़ा संस्थागत बदलाव आकार ले रहा है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सरकार ने दिल्ली के विकास और नीतिगत फैसलों के लिए Delhi Institute for Transformation and Innovation यानी DITI नाम से नया नीति-थिंक टैंक बनाने की तैयारी शुरू कर दी है।
योजना विभाग ने इसका कैबिनेट नोट तैयार कर मंजूरी के लिए भेजा है। प्रस्तावित संस्था केंद्र के नीति आयोग की तर्ज पर दिल्ली की दीर्घकालिक विकास रणनीति तैयार करने, नीतियों पर शोध करने और सरकारी योजनाओं के प्रभाव का आकलन करने का काम करेगी।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मार्च 2026 के बजट भाषण में DITI की घोषणा की थी। इसके लिए मौजूदा वित्त वर्ष में 59 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया है। प्रस्तावित संस्थान का एक प्रमुख लक्ष्य ‘Vision Delhi 2047’ जैसे दीर्घकालिक विकास दस्तावेज तैयार करना बताया गया है। यानी दिल्ली में अब नीति बनाने की मशीनरी को नए सिरे से खड़ा करने की तैयारी है।
लेकिन इसके साथ एक राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल भी सामने है—क्या DITI केवल पुराने संस्थान का नाम और ढांचा बदलकर नई सरकार की प्राथमिकताओं का प्रतीक बनेगा, या वास्तव में दिल्ली की नीति-निर्माण व्यवस्था को अधिक पेशेवर और शोध-आधारित बनाएगा?
DDC से DITI तक—क्या बदलेगा?
दिल्ली संवाद एवं विकास आयोग यानी DDC का गठन 27 फरवरी 2015 को तत्कालीन दिल्ली सरकार की मंजूरी से हुआ था। आधिकारिक DDC दस्तावेज के मुताबिक इसका उद्देश्य सरकार को नीति संबंधी सलाह देना, देश-दुनिया की बेहतर नीतियों और प्रयोगों का अध्ययन करना तथा उन्हें दिल्ली के संदर्भ में लागू करने के लिए सुझाव देना था। DDC ने शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली, परिवहन, पर्यावरण, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार और महिला-बाल विकास जैसे क्षेत्रों में काम किया।
अब प्रस्तावित DITI को इसी तरह के नीति-निर्माण ढांचे का नया संस्करण माना जा रहा है, लेकिन इसमें डेटा, शोध, योजनाओं की निगरानी और दीर्घकालिक रणनीति पर अधिक जोर प्रस्तावित है।
मुख्यमंत्री होंगी अध्यक्ष, मुख्य सचिव संभालेंगे कार्यकारी समिति
प्रस्ताव के मुताबिक DITI की अध्यक्ष मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता होंगी। मुख्यमंत्री ही उपाध्यक्ष की नियुक्ति करेंगी।संस्था में दिल्ली सरकार के सभी मंत्री, मुख्य सचिव, दिल्ली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, नगर निगम आयुक्त और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष को शामिल करने का प्रस्ताव है।योजना विभाग के प्रशासनिक सचिव को सदस्य-सचिव बनाया जाएगा। आवश्यकता के अनुसार विशेषज्ञों को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया जा सकेगा।इसके अलावा मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक कार्यकारी समिति होगी, जो विभिन्न विभागों के बीच समन्वय, योजनाओं की निगरानी, मूल्यांकन और नवाचार से जुड़ी गतिविधियों को आगे बढ़ाएगी।
इस ढांचे का संकेत साफ है—सरकार नीति को केवल विभागीय फाइल नहीं, बल्कि डेटा और शोध पर आधारित दीर्घकालिक परियोजना के रूप में देखना चाहती है।
आठ क्षेत्रों पर फोकस
प्रस्तावित DITI के तहत दिल्ली की विकास जरूरतों से जुड़े आठ प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की योजना है। संस्था नीति अनुसंधान, कार्यक्रम डिजाइन, योजनाओं की निगरानी और उनके परिणामों के मूल्यांकन में विभागों की मदद करेगी। यानी किसी योजना के लिए सिर्फ बजट जारी होना पर्याप्त नहीं होगा। यह देखने की कोशिश होगी कि—पैसा कितना खर्च हुआ?
लाभ किसे मिला?
लाभ कितना मिला?
योजना का वास्तविक असर क्या हुआ?
और अगर परिणाम अपेक्षित नहीं हैं तो नीति में बदलाव क्या होना चाहिए?
यही मॉडल सफल हुआ तो दिल्ली की प्रशासनिक कार्यशैली में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है।
‘Vision Delhi 2047′ सबसे बड़ा टेस्ट
DITI के सामने सबसे महत्वाकांक्षी कामों में से एक दिल्ली का दीर्घकालिक विकास विजन तैयार करना होगा।दिल्ली की समस्याएं किसी एक विभाग तक सीमित नहीं हैं। प्रदूषण परिवहन से जुड़ा है, परिवहन शहरी नियोजन से, शहरी नियोजन आवास से और आवास बुनियादी सुविधाओं से।इसी तरह यमुना की सफाई केवल पर्यावरण विभाग का विषय नहीं है। इसमें सीवेज, उद्योग, नगर निकाय, जल बोर्ड और शहरी विकास सभी जुड़े हैं।
ऐसे में DITI की वास्तविक उपयोगिता इसी बात से तय होगी कि वह विभागों के बीच डेटा और नीति का पुल बना पाता है या नहीं।
रेखा सरकार की बड़ी प्रशासनिक प्रयोगशाला
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपने 2026-27 बजट में बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और प्रशासनिक सुधार को प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा था। 1,03,700 करोड़ रुपये के बजट में सरकार ने विकास और हरित परियोजनाओं पर विशेष जोर दिया। DITI इसी व्यापक प्रशासनिक दृष्टिकोण का संस्थागत हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।
दिल्ली सरकार ने बजट से पहले नागरिकों, शिक्षकों, छात्रों, कामकाजी महिलाओं और विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से सुझाव भी लिए थे। इस लिहाज से DITI को सरकार के ‘नीति से पहले शोध और संवाद’ वाले मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
लेकिन DITI के सामने सबसे बड़ा सवाल—स्वायत्तता या सरकारी नियंत्रण?
यहीं से कहानी का दूसरा पक्ष शुरू होता है।जब मुख्यमंत्री स्वयं किसी नीति संस्थान की अध्यक्ष हों और उसमें सरकार के लगभग सभी प्रमुख अधिकारी तथा मंत्री सदस्य हों, तो संस्था की विशेषज्ञता और सरकारी जवाबदेही के बीच संतुलन महत्वपूर्ण होगा।
विशेषज्ञों की नियुक्ति किस आधार पर होगी?
क्या शोध रिपोर्ट सार्वजनिक होंगी?
क्या सरकार विशेषज्ञों की असहमति को भी रिकॉर्ड पर रखेगी?
क्या DITI की सिफारिशें केवल सरकार के निर्णयों को समर्थन देने तक सीमित रहेंगी या जरूरत पड़ने पर सरकार की योजनाओं की आलोचनात्मक समीक्षा भी कर सकेगी?
एक प्रभावी थिंक टैंक की असली ताकत सिर्फ सरकार के साथ होना नहीं, बल्कि सरकार को तथ्य के आधार पर असहज सवाल पूछ पाने की क्षमता भी होती है।
DDC का अनुभव बनेगा कसौटी
दिल्ली सरकार के अपने दस्तावेज बताते हैं कि DDC ने कई क्षेत्रों में नीतिगत काम किया था और 2021 में उसके ढांचे और दायरे के विस्तार की दिशा में भी कदम उठाए गए थे। इसलिए DITI की स्थापना को सिर्फ ‘पुराने को हटाकर नया लाने’ के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
असल सवाल यह है कि DDC से क्या सीखा गया और DITI में क्या अलग होगा?
यदि पुराने अनुभवों, शोध और उपयोगी संस्थागत क्षमता को संरक्षित करते हुए नई व्यवस्था बनाई जाती है, तो यह प्रशासनिक निरंतरता का उदाहरण हो सकता है।लेकिन यदि हर सरकार अपने साथ अपना अलग थिंक टैंक बनाती रही, तो नीति संस्थानों की स्थिरता और संस्थागत स्मृति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
राजनीतिक मायने भी कम नहीं
DDC का जन्म आम आदमी पार्टी सरकार के दौर में हुआ था। अब भाजपा सरकार उसके स्थान पर नई संस्थागत व्यवस्था तैयार कर रही है।इसलिए DITI सिर्फ प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं, बल्कि दिल्ली में शासन के मॉडल में बदलाव का राजनीतिक संदेश भी बन सकता है।
हालांकि, DDC का अस्तित्व अपने आप में किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं था; वह दिल्ली सरकार की संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा था। इसी तरह DITI की सफलता भी केवल इसके नाम या सरकार बदलने से तय नहीं होगी।
आखिरकार जनता के लिए मायने रखेगा—दिल्ली में प्रदूषण घटा या नहीं?
यातायात सुधरा या नहीं?
यमुना साफ हुई या नहीं?
सरकारी अस्पताल बेहतर हुए या नहीं?
स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ी या नहीं?
रोजगार के अवसर बढ़े या नहीं?
यदि DITI इन सवालों के जवाब डेटा के साथ सरकार के सामने रखता है, तो उसका महत्व केवल एक नए आयोग तक सीमित नहीं रहेगा।
एनएसके विश्लेषण
दिल्ली में DDC से DITI तक का सफर केवल नाम बदलने की कहानी नहीं है। यह इस बात की परीक्षा भी है कि सरकार नीति को राजनीति से कितना अलग रखकर डेटा, शोध और परिणामों से जोड़ सकती है।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की अध्यक्षता वाला प्रस्तावित DITI यदि विभागों के बीच तालमेल, स्वतंत्र विशेषज्ञता, पारदर्शी डेटा और योजनाओं के वास्तविक मूल्यांकन को मजबूत करता है, तो दिल्ली को दीर्घकालिक नीति-निर्माण का एक नया ढांचा मिल सकता है।
लेकिन यदि यह केवल सरकारी घोषणाओं को नीति का प्रमाणपत्र देने वाली संस्था बनकर रह गया, तो इसकी उपयोगिता पर सवाल उठेंगे।
दिल्ली को नए आयोग से ज्यादा जरूरत नई कार्यसंस्कृति की है।ऐसी कार्यसंस्कृति, जिसमें हर बड़ी योजना से पहले आंकड़े हों, फैसले के पीछे शोध हो, खर्च के बाद परिणाम का मूल्यांकन हो और सरकार के सामने जरूरत पड़ने पर असहज सच रखने की संस्थागत आजादी भी हो।
DDC का अध्याय अब इतिहास का हिस्सा बन रहा है; DITI का असली इम्तिहान अब शुरू होगा—फाइलों में नहीं, दिल्ली की सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों, हवा और यमुना के किनारे।
एनएसके की सीधी बात:
नाम DDC हो या DITI—दिल्ली की जनता को आयोग नहीं, नतीजे चाहिए।
