बी के झा
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नई दिल्ली, 26 सितंबर
बिहार की राजनीति में चुनावी रणनीतिकार से सक्रिय राजनेता बने प्रशांत किशोर अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जन सुराज का राजनीतिक आधार तैयार करने की कवायद में जुट गए हैं। बिहार में पहली चुनावी जीत हासिल करने के बाद उनकी पार्टी ने दिल्ली में संगठन खड़ा करने की तैयारी तेज कर दी है। रविवार को दिल्ली में जन सुराज समर्थकों की प्रस्तावित बैठक को इसी विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।बैठक में दिल्ली के लिए एक स्टीयरिंग कमेटी के गठन की घोषणा हो सकती है। यही कमेटी राजधानी में पार्टी की प्रारंभिक संगठनात्मक संरचना तैयार करने, पदाधिकारियों के चयन और जमीनी नेटवर्क खड़ा करने की जिम्मेदारी संभाल सकती है।
यानी प्रशांत किशोर का दिल्ली मिशन महज राजनीतिक दौरा नहीं, बल्कि बिहार से बाहर जन सुराज की पहली बड़ी संगठनात्मक प्रयोगशाला बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
बांकीपुर की जीत ने बदला जन सुराज का आत्मविश्वास
प्रशांत किशोर के लिए दिल्ली की रणनीति समझने से पहले बांकीपुर के नतीजे को देखना जरूरी है।3 अगस्त 2026 को हुए बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने भाजपा के नीरज कुमार को 19,324 वोटों से हराया। किशोर को 64,151 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार को 44,827 वोट मिले। इस जीत के साथ जन सुराज ने पहली बार किसी विधानसभा सीट पर अपना खाता खोला।खास बात यह रही कि बांकीपुर पर भाजपा का लंबे समय से मजबूत प्रभाव रहा था। ऐसे में वहां मिली जीत ने जन सुराज को बिहार से बाहर विस्तार की राजनीतिक संभावना पर सोचने का आधार जरूर दिया है।
हालांकि इससे दिल्ली में पार्टी की चुनावी ताकत के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। दिल्ली का सामाजिक, राजनीतिक और चुनावी गणित बिहार से अलग है।
अब दिल्ली क्यों?
जन सुराज की दिल्ली रणनीति में पूर्वांचली मतदाता एक महत्वपूर्ण सामाजिक समूह के तौर पर दिखाई दे रहा है। दिल्ली में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आए लोगों की बड़ी आबादी है। ऐसे में बिहार से निकलकर राष्ट्रीय राजधानी में संगठन खड़ा करने के लिए यह समूह पार्टी के लिए स्वाभाविक राजनीतिक संपर्क क्षेत्र बन सकता है।लेकिन जन सुराज के सामने चुनौती यह है कि दिल्ली की राजनीति में पूर्वांचली पहचान अकेला चुनावी मुद्दा नहीं है। यहां स्थानीय शासन, बिजली-पानी, प्रदूषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, अनधिकृत कॉलोनियां, महिला सुरक्षा और नगर निगम से जुड़े सवाल भी सीधे मतदाताओं को प्रभावित करते हैं।इसलिए दिल्ली में जन सुराज को अपनी बिहार वाली राजनीतिक भाषा को राजधानी के स्थानीय मुद्दों के साथ जोड़ना होगा।
‘आप’ और भाजपा के बीच तीसरे विकल्प की जगह?
जन सुराज के सामने दिल्ली में पहले से स्थापित दो बड़े राजनीतिक ध्रुव हैं—भाजपा और आम आदमी पार्टी। कांग्रेस भी राजधानी की राजनीति में मौजूद है।ऐसे में प्रशांत किशोर की पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती संगठन खड़ा करने की होगी।पार्टी से जुड़े नेताओं के मुताबिक दिल्ली में संगठन अभी प्रारंभिक अवस्था में है। ऐसे में स्टीयरिंग कमेटी का गठन केवल पद बांटने की कवायद नहीं, बल्कि बूथ से लेकर विधानसभा स्तर तक संगठन खड़ा करने की पहली सीढ़ी हो सकती है।पार्टी खुद को समावेशी राजनीतिक मंच के तौर पर पेश करने की बात कर रही है। उसका दावा है कि वह किसी एक समुदाय पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्गों को जोड़ने की कोशिश करेगी।
कौन संभालेगा दिल्ली की कमान?
प्रस्तावित दिल्ली स्टीयरिंग कमेटी में बिहार और जन सुराज से जुड़े कई नामों की चर्चा है। इनमें
अधिवक्ता तथागत हर्षवर्धन,
दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज के प्रोफेसर शांतनु कुमार,
हिमाचल प्रदेश पुलिस के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक जेपी सिंह,
पूर्व IES अधिकारी कुंवर चंद्रेश,
अधिवक्ता अबू अफ्फान फारूकी,
प्रियंका सिंह,
कारोबारी अजय सिंह
और ONGC के पूर्व निदेशक बादी-उद-दोजा जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं।
हालांकि इन नामों को अंतिम सूची मानने से पहले पार्टी की औपचारिक घोषणा का इंतजार करना जरूरी होगा।
2027 MCD से 2030 विधानसभा तक नजर?
जन सुराज के दिल्ली विस्तार की चर्चा में सबसे दिलचस्प पहलू इसका संभावित चुनावी रोडमैप है।पार्टी की ओर से कहा गया है कि वह दिल्ली में आने वाले चुनावों में हिस्सा लेने की तैयारी कर रही है। इसमें 2027 के दिल्ली नगर निगम चुनाव, उसके बाद लोकसभा चुनाव और आगामी विधानसभा चुनाव शामिल हैं।अगर पार्टी MCD चुनाव में उतरती है तो उसके लिए यह चुनाव दिल्ली में संगठन की वास्तविक ताकत को परखने का पहला बड़ा मैदान बन सकता है।MCD चुनाव विधानसभा चुनाव से अलग तरह का चुनाव है। यहां वार्ड स्तर का संगठन, स्थानीय उम्मीदवार, मोहल्ले की समस्याएं और व्यक्तिगत जनसंपर्क बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। जन सुराज के लिए यही चुनाव यह भी बताएगा कि प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत लोकप्रियता संगठनात्मक वोट में कितनी बदल पाती है।
बिहार का प्रदर्शन भी बना रहेगा सवाल
दिल्ली अभियान के बीच प्रशांत किशोर को बिहार का सवाल भी साथ लेकर चलना होगा।2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन कोई सीट नहीं जीत सका। इसके बाद अगस्त 2026 में बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत ने पार्टी को पहली विधानसभा सीट दिलाई।इस विरोधाभास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।एक तरफ बड़ी संख्या में सीटों पर लड़कर शून्य सफलता और दूसरी तरफ बांकीपुर जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्र में जीत—जन सुराज के लिए यही दो आंकड़े उसकी राजनीति की वास्तविक तस्वीर समझने की कुंजी हैं।
वरिष्ठ शिक्षाविद का तंज—’पहले बिहार में आधार मजबूत करें
‘प्रशांत किशोर के दिल्ली विस्तार पर एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने तंज कसते हुए कहा कि उन्हें पहले बिहार में अपना जनाधार मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए और उसके बाद दिल्ली में राजनीतिक जमीन तलाशनी चाहिए।उन्होंने कहा कि यदि दिल्ली में संगठन खड़ा करने का मकसद सिर्फ राजनीतिक दायरा बढ़ाना है तो यह जन सुराज का अपना फैसला है, लेकिन पार्टी को यह भी देखना होगा कि कहीं बिहार विधानसभा चुनाव जैसा प्रदर्शन दिल्ली में भी न दोहराएं जाए।हालांकि यह टिप्पणी संबंधित शिक्षाविद की राजनीतिक राय है, इसे चुनावी तथ्य या भविष्यवाणी के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
PK के सामने सबसे बड़ी परीक्षा—’चेहरा’ से ‘संगठन’ तक
प्रशांत किशोर की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत फिलहाल उनका व्यक्तिगत राजनीतिक प्रोफाइल है। लेकिन किसी राजनीतिक दल का विस्तार सिर्फ एक लोकप्रिय चेहरे से नहीं होता।दिल्ली में जन सुराज को बूथ कार्यकर्ता चाहिए, स्थानीय चेहरे चाहिए, वार्ड स्तर की टीम चाहिए और ऐसे उम्मीदवार चाहिए जो स्थानीय समस्याओं से सीधे जुड़े हों।
बांकीपुर में किशोर की व्यक्तिगत मौजूदगी और लंबे समय तक किए गए जमीनी अभियान ने उन्हें जीत दिलाई। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने चुनाव से पहले घर-घर संपर्क और बूथ स्तर पर अभियान चलाया था।लेकिन दिल्ली में यही मॉडल कितनी सीटों पर दोहराया जा सकता है—यह आने वाले समय में संगठन की वास्तविक क्षमता से तय होगा।
एनएसके विश्लेषण:
दिल्ली में ‘जन सुराज’ की असली परीक्षा अभी बाकी
प्रशांत किशोर ने बिहार में रणनीतिकार से राजनेता तक का सफर तय कर लिया है। बांकीपुर की जीत ने उनके राजनीतिक प्रयोग को पहली चुनावी सफलता भी दी है। अब दिल्ली में संगठन खड़ा करने की तैयारी उनके अभियान का अगला चरण है।
लेकिन दिल्ली बिहार नहीं है।यहां जन सुराज को पूर्वांचली मतदाताओं तक पहुंच बनाने के साथ-साथ दिल्ली के स्थानीय मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनानी होगी। उसे यह भी साबित करना होगा कि बांकीपुर की जीत केवल एक विधानसभा क्षेत्र की सफलता नहीं, बल्कि संगठन खड़ा करने की व्यापक क्षमता का हिस्सा बन सकती है।
2027 का MCD चुनाव इसलिए जन सुराज के लिए सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि दिल्ली में उसके संगठन की पहली बड़ी अग्निपरीक्षा बन सकता है।
बांकीपुर ने प्रशांत किशोर को विधानसभा का रास्ता दिखाया है; अब दिल्ली यह तय करेगी कि जन सुराज का सफर एक सीट से आगे बढ़कर संगठन की राजनीति बन पाता है या नहीं।
