बी के झा
NSK news Ind

लखनऊ/बलिया, 26 सितंबर
समाजवादी राजनीति के वरिष्ठ नेता, पूर्व नेता प्रतिपक्ष और आठ बार विधायक रहे राम गोविंद चौधरी का शुक्रवार रात लखनऊ स्थित पीजीआई में निधन हो गया। उनके निधन के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में संघर्ष, विचार और जमीनी जनसरोकारों से जुड़ा एक लंबा अध्याय समाप्त हो गया।चौधरी लंबे समय तक समाजवादी राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे। लेकिन उनके जीवन का अंतिम दौर भी उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता की एक तस्वीर छोड़ गया।
कुछ महीने पहले जब उनकी तबीयत खराब थी और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव उनका हालचाल जानने अस्पताल पहुंचे थे, तब सामने आए एक वीडियो में राम गोविंद चौधरी बिस्तर पर लेटे हुए नेताओं से कहते दिखाई देते हैं—‘चुनाव जीतना है, अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाना है।’यह वाक्य उनके राजनीतिक जीवन के अंतिम दिनों की उस प्रतिबद्धता को सामने रखता है, जिसमें बीमारी के बावजूद उनकी चिंता व्यक्तिगत स्वास्थ्य से अधिक पार्टी और नेतृत्व के भविष्य को लेकर दिखाई दी।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ संघर्ष
राम गोविंद चौधरी की राजनीतिक यात्रा सत्ता के गलियारों से नहीं, बल्कि छात्र आंदोलन से शुरू हुई थी।वर्ष 1972 में वह टाउन कॉलेज छात्रसंघ के महामंत्री निर्वाचित हुए। इसके दो साल बाद 1974 में छात्रों ने उन्हें दोबारा अपना नेता चुना और वह छात्रसंघ अध्यक्ष बने।यह वह दौर था जब देश की राजनीति बड़े उथल-पुथल से गुजर रही थी।
जयप्रकाश नारायण के आंदोलन ने युवाओं और छात्रों की एक पूरी पीढ़ी को राजनीति के केंद्र में ला दिया था। चौधरी भी इसी आंदोलन से जुड़े और जनपद छात्र युवा वाहिनी के सह-संयोजक रहे।आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आंदोलन करने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया। उनकी गिरफ्तारी के लिए इनाम तक घोषित किया गया था। टीडी कॉलेज परिसर से उनकी गिरफ्तारी हुई और करीब 24 महीने तक जेल में रहना पड़ा।यही संघर्ष आगे चलकर उनकी राजनीति की पहचान बना।
जेल से निकलते ही चंद्रशेखर से मुलाकात
जेल से बाहर निकलने के बाद उनके राजनीतिक जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।जिस दिन वह बलिया जेल से बाहर निकले, उसी दिन पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने बलिया कलेक्ट्रेट पहुंचे थे।चौधरी के साथ उमड़े छात्रों के हुजूम ने चंद्रशेखर का ध्यान खींचा। उन्होंने राम गोविंद चौधरी को मिलने के लिए बुलाया। यह मुलाकात आगे चलकर दोनों के बीच राजनीतिक और आत्मीय संबंधों की नींव बनी।
चंद्रशेखर से मिले मार्गदर्शन ने चौधरी की राजनीति को नई दिशा दी और छात्र आंदोलन से निकला यह युवा नेता धीरे-धीरे विधानसभा की राजनीति के केंद्र में पहुंच गया।
1977 में पहली बार विधानसभा पहुंचे
वर्ष 1977 में राम गोविंद चौधरी ने तत्कालीन चिलकहर विधानसभा क्षेत्र से जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।इसके बाद उन्होंने लगातार पांच बार इस क्षेत्र का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया।वर्ष 1991 में उन्हें मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनाया गया। खाद्य प्रसंस्करण एवं उद्यान विभाग की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने सरकार में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।
यहीं से उनकी राजनीति केवल विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि शासन और संगठन दोनों स्तरों पर उनका प्रभाव बढ़ता गया।
समाजवादी राजनीति में बढ़ा कद
वर्ष 2000 में वह समाजवादी जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने। इसके बाद वर्ष 2002 में बांसडीह विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे।उन्होंने तत्कालीन कैबिनेट मंत्री बच्चा पाठक को करीब 6,000 मतों से हराकर विधानसभा में वापसी की।वर्ष 2004 में मुलायम सिंह यादव सरकार में उन्हें बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया।लेकिन लंबी राजनीतिक यात्रा में जीत के साथ हार भी आई।
264 वोट की हार ने भी नहीं तोड़ा हौसला
2007 का विधानसभा चुनाव राम गोविंद चौधरी के लिए बड़ा झटका था। बांसडीह से वह महज करीब 264 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए।लेकिन यह हार उनके राजनीतिक सफर का अंत नहीं बनी।वर्ष 2012 में उन्होंने वापसी की और विधानसभा चुनाव जीता। अखिलेश यादव के नेतृत्व में बनी सरकार में उन्हें बेसिक शिक्षा तथा बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की जिम्मेदारी मिली। बाद में समाज कल्याण और पंचायती राज जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी उनके पास रहे।
2017 में बने नेता प्रतिपक्ष
2017 का विधानसभा चुनाव राम गोविंद चौधरी के राजनीतिक जीवन का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव था।उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी केतकी सिंह को करीब 1,655 मतों से हराया। इसके बाद समाजवादी पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी।सत्ता से बाहर होने के बाद विधानसभा में सरकार के सामने विपक्ष की आवाज के रूप में चौधरी की भूमिका महत्वपूर्ण रही।उनकी शैली में आक्रामक राजनीतिक तेवर के साथ ग्रामीण समाज और आम लोगों के मुद्दों को प्रमुखता मिलती रही।
शिक्षा और पंचायत से जुड़े फैसलों की छाप
राम गोविंद चौधरी की पहचान केवल चुनाव जीतने वाले नेता या मंत्री के रूप में नहीं रही। उनके कार्यकाल में शिक्षा और पंचायती राज से जुड़े कई फैसलों को उनके समर्थक उनकी राजनीतिक विरासत का हिस्सा मानते हैं।बेसिक शिक्षा मंत्री के रूप में शिक्षकों के खातों में सीधे ऑनलाइन वेतन भेजने की व्यवस्था, शिक्षामित्रों के समायोजन और सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूलों में पदों से अधिक कार्यरत शिक्षकों के अधिसंख्य पदों पर समायोजन जैसे फैसले उनके कार्यकाल से जुड़े रहे।पंचायती राज मंत्री के रूप में ग्राम प्रधानों और ब्लॉक प्रमुखों को मानदेय देने की व्यवस्था भी उनके कार्यकाल की प्रमुख पहलों में शामिल रही।
इन फैसलों के जरिए उनकी राजनीति का एक पक्ष सामने आता है—विधानसभा की राजनीति के साथ गांव, शिक्षक, पंचायत और ग्रामीण प्रशासन से जुड़े सवालों पर जोर।
अंतिम समय तक अखिलेश के लिए चिंता
राम गोविंद चौधरी का राजनीतिक सफर कई दशकों तक फैला रहा। उन्होंने छात्र आंदोलन देखा,
आपातकाल में जेल गए,
चंद्रशेखर से राजनीतिक संबंध बनाए,
जनता पार्टी के दौर से समाजवादी राजनीति तक पहुंचे,
मंत्री बने,
चुनाव हारे,
फिर लौटे और अंततः विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाली।लेकिन उनके जीवन के अंतिम दिनों का वह वीडियो अब उनकी राजनीतिक यात्रा का भावनात्मक दस्तावेज बन गया है।
अस्पताल के बिस्तर पर जब शरीर साथ देने की स्थिति में नहीं था, तब भी उनकी जुबान पर चुनाव और अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने की बात थी।एक राजनेता के लिए इससे बड़ा राजनीतिक परिचय शायद यही हो सकता है कि जीवन की अंतिम घड़ी तक उसकी चिंता सत्ता से अधिक अपने राजनीतिक विचार और संगठन के भविष्य को लेकर बनी रहे।
राम गोविंद चौधरी का निधन समाजवादी पार्टी के लिए केवल एक वरिष्ठ नेता का जाना नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत है, जिसने आंदोलन की राजनीति से अपनी शुरुआत की और सत्ता के गलियारों तक अपनी जगह बनाई।
बलिया की धरती से निकला यह संघर्षशील समाजवादी चेहरा अब इतिहास का हिस्सा है, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा और उनके अंतिम शब्द लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की सियासत में याद किए जाते रहेंगे।
