बी के झा
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लखनऊ, 26 सितंबर
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने उसकी पटकथा लिखनी शुरू कर दी है। भाजपा अपनी सामाजिक पकड़ को बनाए रखने की कोशिश में है, समाजवादी पार्टी अपने पीडीए समीकरण को और मजबूत करने में जुटी है, कांग्रेस गठबंधन की जमीन तलाश रही है और बहुजन समाज पार्टी अपने परंपरागत दलित आधार को बचाने की चुनौती से जूझ रही है।ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सवर्ण मतदाता किस ओर जाएंगे, बल्कि यह है कि दलित और अति पिछड़ा मतदाता किस राजनीतिक गठजोड़ पर भरोसा करेगा?
यूपी विधानसभा में 403 सीटें हैं, जिनमें 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। निर्वाचन आयोग के 2022 के विधानसभा आंकड़ों में भी 84 एससी आरक्षित सीटों की पुष्टि होती है।यानी दलित मतदाता केवल एक बड़ा सामाजिक समूह नहीं, बल्कि प्रदेश की सत्ता का समीकरण बदलने की क्षमता रखने वाला महत्वपूर्ण चुनावी वर्ग है।
बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती—अपना आधार बचाने की
कांशीराम और मायावती की राजनीति ने उत्तर प्रदेश में दलित वोट को लंबे समय तक एक मजबूत राजनीतिक धुरी बनाए रखा। लेकिन हाल के चुनावों में इस आधार में विभाजन साफ दिखाई दिया है।2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा उत्तर प्रदेश में एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका राज्य में वोट शेयर करीब 9.4 प्रतिशत रहा। CSDS-Lokniti के पोस्ट-पोल सर्वे के मुताबिक 44 प्रतिशत जाटव मतदाताओं ने बसपा को वोट दिया, जबकि गैर-जाटव दलितों में बसपा का समर्थन सिर्फ 15 प्रतिशत रहा।
यही आंकड़ा 2027 की राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण कहानी बन सकता है—दलित वोट खत्म नहीं हुआ है, लेकिन उसका राजनीतिक ठिकाना पहले जैसा एक जगह नहीं रहा।
2024 ने बदल दिया दलित वोट का गणित
2024 के लोकसभा चुनाव में जाटव वोट का 44 प्रतिशत बसपा के साथ रहा। वहीं 25 प्रतिशत जाटव मतदाता इंडिया गठबंधन की ओर गए और 24 प्रतिशत ने एनडीए का समर्थन किया।गैर-जाटव दलितों में तस्वीर और अलग रही। इस वर्ग के 56 प्रतिशत मतदाताओं ने इंडिया गठबंधन का समर्थन किया, जबकि 29 प्रतिशत एनडीए और 15 प्रतिशत बसपा के साथ रहे।
यानी गैर-जाटव दलित वोट 2027 के चुनावी गणित का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।2019 की तुलना में भी बड़ा बदलाव दिखा।
CSDS-Lokniti के आंकड़ों के मुताबिक 2019 में एनडीए को गैर-जाटव दलितों का करीब 48 प्रतिशत समर्थन मिला था, जो 2024 में घटकर 29 प्रतिशत रह गया। दूसरी तरफ जाटवों में एनडीए का समर्थन 17 प्रतिशत से बढ़कर 24 प्रतिशत हुआ।
भाजपा की चुनौती भी कम नहीं
दलित वोट को लेकर सिर्फ सपा-कांग्रेस और बसपा ही सक्रिय नहीं हैं। भाजपा ने भी लंबे समय से गैर-जाटव दलित समूहों के बीच अपना आधार बनाने की कोशिश की है।2024 में एनडीए को जाटव मतदाताओं का 24 प्रतिशत और गैर-जाटव दलितों का 29 प्रतिशत समर्थन मिला। इससे स्पष्ट है कि दलित मतदाता किसी एक राजनीतिक खेमे में पूरी तरह बंद नहीं है।
यही कारण है कि 2027 से पहले भाजपा के सामने चुनौती केवल अपने परंपरागत समर्थन को बनाए रखने की नहीं, बल्कि दलितों के बीच 2024 में हुए वोट-शिफ्ट को समझने और उसका राजनीतिक जवाब देने की भी है।
सपा-कांग्रेस के लिए 2024 की कहानी कितनी दोहराएगी?
2024 में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने यूपी की राजनीति में बड़ा बदलाव दर्ज किया। दोनों दलों ने मिलकर 43 लोकसभा सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 33 सीटों पर रही और बसपा का खाता नहीं खुला।
CSDS-Lokniti के आंकड़ों में गैर-जाटव दलितों का 56 प्रतिशत समर्थन इंडिया गठबंधन को मिला। जाटवों में भी 25 प्रतिशत मतदाताओं ने गठबंधन का समर्थन किया।यही आंकड़ा सपा और कांग्रेस को 2027 के लिए उम्मीद देता है। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों का मतदान व्यवहार एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं।
स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय मुद्दे, सरकार के कामकाज, कानून-व्यवस्था, आरक्षण, रोजगार और कल्याणकारी योजनाएं विधानसभा चुनाव में अलग प्रभाव डाल सकती हैं।इसलिए 2024 के आंकड़े दिशा तो बताते हैं, लेकिन 2027 का नतीजा तय नहीं करते।
पश्चिमी यूपी में दलित वोट क्यों अहम?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित आबादी कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय है। अलीगढ़, आगरा, बिजनौर, सहारनपुर, मेरठ और बुलंदशहर जैसे इलाकों में दलित मतदाताओं की संख्या चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।यहीं पर जाटव, गैर-जाटव, जाट, मुस्लिम, ओबीसी और सवर्ण मतों का आपसी तालमेल कई सीटों पर मुकाबले की दिशा बदल सकता है।
2024 में पश्चिमी यूपी में भाजपा को अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन मिला था, जबकि राज्य के अन्य हिस्सों में इंडिया गठबंधन ने अपनी स्थिति मजबूत की।
क्षेत्रीय अंतर यह संकेत देता है कि पूरे उत्तर प्रदेश के लिए एक ही जातीय या राजनीतिक फार्मूला लागू करना आसान नहीं होगा।
2027 का असली सवाल: दलित वोट किसके साथ जाएगा?
उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति अब केवल ‘बसपा बनाम बाकी दल’ की पुरानी धुरी पर नहीं चल रही। 2024 के आंकड़ों ने दिखाया कि दलित मतदाता अलग-अलग समूहों में अलग राजनीतिक विकल्प चुन रहा है।जाटव मतदाताओं में बसपा अभी भी महत्वपूर्ण ताकत है, जबकि गैर-जाटव दलितों में उसका प्रभाव काफी कम हुआ है।
दूसरी तरफ भाजपा और इंडिया गठबंधन दोनों के पास दलित मतदाताओं का एक हिस्सा है।यही वजह है कि 2027 में असली राजनीतिक लड़ाई केवल सवर्ण बनाम दलित की नहीं होगी। मुकाबला इस बात का भी होगा कि कौन-सा दल जाटव और गैर-जाटव दलितों के बीच बने अलग-अलग राजनीतिक रुझानों को अपने पक्ष में जोड़ पाता है।
और इसके साथ अति पिछड़ा वोट जुड़ गया तो समीकरण और जटिल हो जाएगा।
एनएसके का निष्कर्ष
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की जमीन पर अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है। दलित मतदाता किसी एक दल की स्थायी जागीर नहीं है।
2024 ने कम से कम इतना स्पष्ट कर दिया कि बसपा का पारंपरिक आधार विभाजित हुआ है, गैर-जाटव दलितों में नए राजनीतिक झुकाव उभरे हैं और भाजपा-सपा-कांग्रेस—तीनों के लिए इस वर्ग की अहमियत बढ़ी है।इसलिए अगले विधानसभा चुनाव की सबसे बड़ी कहानी शायद यह नहीं होगी कि ‘कौन किस जाति के साथ है?’
बल्कि सवाल होगा—दलित वोट किसके साथ जाएगा, अति पिछड़ा किसके साथ खड़ा होगा और इन दोनों को जोड़कर कौन अपना व्यापक सामाजिक समीकरण तैयार कर पाएगा?
यूपी की सत्ता का रास्ता 2027 में इन्हीं बदलते सामाजिक समीकरणों से होकर गुजर सकता है।
