बी के झा
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श्रीनगर / नई दिल्ली, 28 सितंबर
जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिलाने की मांग सोमवार को विधानसभा के भीतर एक बड़े राजनीतिक और संवैधानिक टकराव में बदल गई।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा पेश राज्यhood प्रस्ताव पर भाजपा ने साफ कहा कि वह जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली के खिलाफ नहीं है, लेकिन प्रस्ताव में 5 अगस्त 2019 से पहले की संवैधानिक व्यवस्था, 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव और अनुच्छेद 370-35A से जुड़े संदर्भों को शामिल करने पर उसे गंभीर आपत्ति है।दिनभर चले हंगामे, नारेबाजी और विपक्षी विरोध के बीच भाजपा विधायक सदन के वेल में पहुंच गए। बाद में भाजपा विधायकों ने वॉकआउट किया और उनके अनुपस्थित रहने के दौरान विधानसभा ने राज्यhood बहाली का प्रस्ताव पारित कर दिया।
राज्यhood की मांग बनी, लेकिन असली विवाद भाषा पर
उमर अब्दुल्ला के मूल प्रस्ताव में भारत सरकार से जम्मू-कश्मीर को ‘तत्काल और शीघ्र’ पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग की गई थी। प्रस्ताव में विधानसभा द्वारा 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को पारित पुराने प्रस्तावों का भी उल्लेख था।
यही संदर्भ भाजपा के विरोध का मुख्य आधार बना।
भाजपा का तर्क है कि राज्यhood की मांग को उन पुराने संवैधानिक मुद्दों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, जिन्हें वह 2019 के बाद समाप्त हो चुका विषय मानती है।नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने कहा कि भाजपा राज्यhood की पक्षधर है, लेकिन प्रस्ताव की भाषा और उसमें पुराने संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ स्वीकार्य नहीं हैं। उनके अनुसार जम्मू-कश्मीर सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्र है और ऐसे विषयों को प्रस्ताव में शामिल करने पर आपत्ति है।
एनसी और पीडीपी ने क्यों जोड़े 370 और 35A के संदर्भ?
विवाद तब और गहरा गया जब प्रस्ताव में संशोधन पेश किए गए। कई नेशनल कॉन्फ्रेंस विधायकों ने अनुच्छेद 370 और 35A से जुड़े संदर्भ जोड़ने की मांग की। पीडीपी विधायक वहीद पारा ने भी संशोधन पेश कर अनुच्छेद 370 और 35A को उनके पूर्व स्वरूप में बहाल करने तथा स्वायत्तता से संबंधित संदर्भ शामिल करने की मांग रखी।
कुल दस संशोधन प्रस्तावित किए गए, जिनमें कई का उद्देश्य मूल प्रस्ताव का दायरा बढ़ाना था।यानी जिस प्रस्ताव का मूल केंद्र राज्यhood की बहाली था, वह बहस आगे बढ़ते-बढ़ते जम्मू-कश्मीर की पुरानी संवैधानिक स्थिति और 2019 के बाद हुए बदलावों तक पहुंच गई।
भाजपा का पलटवार—‘राज्यhood चाहिए, लेकिन 370 की बहस नहीं’
भाजपा नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी राज्यhood की बहस के लिए तैयार है, लेकिन अनुच्छेद 370 और 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव को मौजूदा प्रस्ताव के साथ जोड़ने का समर्थन नहीं करेगी। भाजपा ने आरोप लगाया कि राज्यhood के मुद्दे की आड़ में पुराने राजनीतिक और संवैधानिक मुद्दों को फिर से बहस में लाया जा रहा है।
भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर को हटाने के लिए भी नोटिस दिया। पार्टी का आरोप था कि राज्यhood प्रस्ताव को जिस तरीके से कार्यवाही में लिया गया, उसमें विधानसभा के नियमों का पालन नहीं हुआ। अध्यक्ष ने कहा कि ऐसे प्रस्ताव के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।
उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी का सवाल—सीमावर्ती राज्य सिर्फ जम्मू-कश्मीर नहीं
सत्तापक्ष की ओर से भाजपा के तर्कों का जवाब देते हुए उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर अकेला सीमावर्ती राज्य नहीं है। उनका तर्क था कि यदि सीमा से लगे होने को राज्यhood या संवैधानिक अधिकारों की मांग के खिलाफ आधार बनाया जाए, तो राजस्थान जैसे अन्य सीमावर्ती राज्यों के संदर्भ में भी यही सवाल उठना चाहिए।
सत्तापक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि संसद और केंद्र सरकार की ओर से राज्यhood बहाल करने को लेकर की गई राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को कब पूरा किया जाएगा।
2000 का प्रस्ताव फिर क्यों बना मुद्दा?
साल 2000 में फारूक अब्दुल्ला सरकार के दौरान विधानसभा ने जम्मू-कश्मीर को 1953 से पहले की अधिक स्वायत्तता वाली स्थिति बहाल करने का प्रस्ताव पारित किया था। केंद्र सरकार ने उस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था।अब उमर अब्दुल्ला सरकार के नए प्रस्ताव में 2000 के प्रस्ताव का संदर्भ आते ही भाजपा ने इसे पुराने स्वायत्तता एजेंडे को फिर से राजनीतिक विमर्श में लाने की कोशिश के रूप में देखा।
यहीं से विवाद का मूल प्रश्न सामने आता है—क्या राज्यhood की बहाली को 2019 से पहले की संवैधानिक व्यवस्था के सवाल से अलग रखा जा सकता है, या दोनों मुद्दे जम्मू-कश्मीर की राजनीति में स्वाभाविक रूप से जुड़े हुए हैं?
कानूनविदों की नजर में असली संवैधानिक प्रश्न
संवैधानिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विधानसभा का ऐसा प्रस्ताव अपने आप में केंद्र सरकार या संसद पर बाध्यकारी कानून नहीं बन जाता। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत तत्कालीन राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में पुनर्गठित किया गया था।
इसीलिए कानूनविदों के बीच बहस का केंद्र केवल यह नहीं है कि विधानसभा क्या मांग कर रही है, बल्कि यह भी है कि राज्यhood बहाल करने का संवैधानिक और विधायी रास्ता क्या होगा और उस प्रक्रिया में केंद्र तथा संसद की क्या भूमिका होगी।
2026 में प्रकाशित Indian Law Review के एक अध्ययन में भी 2019 के संवैधानिक बदलावों, अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के बाद बनी संवैधानिक स्थिति का विश्लेषण किया गया है।
शिक्षाविदों के लिए भी बड़ा सवाल—राज्यhood बनाम विशेष दर्जा
शिक्षाविदों और संविधान के अध्येताओं के लिए यह घटनाक्रम दो अलग-अलग संवैधानिक प्रश्नों को एक साथ सामने लाता है।
पहला—क्या जम्मू-कश्मीर को फिर पूर्ण राज्य बनाया जाए?
दूसरा—2019 से पहले लागू विशेष संवैधानिक व्यवस्था को लेकर राजनीतिक दावों का वर्तमान संवैधानिक ढांचे में क्या स्थान है?
दोनों प्रश्नों को एक ही प्रस्ताव में रखने से राजनीतिक संदेश व्यापक हो सकता है, लेकिन इससे राज्यhood की अपेक्षाकृत सर्वमान्य मांग के साथ अनुच्छेद 370 और स्वायत्तता का विवाद भी जुड़ जाता है।
विपक्षी आवाजों में भी मतभेद
दिलचस्प बात यह है कि राज्यhood की मांग के व्यापक समर्थन के बावजूद विपक्षी राजनीति में भी इस प्रस्ताव की भाषा को लेकर अलग-अलग राय सामने आई है।
पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने कहा कि राज्यhood को अनुच्छेद 370 और 35A के मुद्दे से अलग रखना अधिक व्यापक राजनीतिक समर्थन जुटा सकता था। उनके अनुसार राज्यhood की मांग अपने आप में व्यापक रूप से स्वीकार्य है, लेकिन पुराने संवैधानिक मुद्दों को साथ जोड़ने से बहस का केंद्र बदल गया।
इससे स्पष्ट है कि विवाद केवल भाजपा बनाम नेशनल कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं है;
राज्यhood की मांग के साथ उसकी राजनीतिक भाषा और संवैधानिक दायरे को लेकर भी अलग-अलग मत मौजूद हैं।
सदन का फैसला, लेकिन गेंद अब केंद्र के पाले में
विधानसभा ने प्रस्ताव पारित कर दिया है, लेकिन यह अंतिम संवैधानिक फैसला नहीं है। प्रस्ताव के बाद अब राजनीतिक दबाव केंद्र सरकार पर जाएगा कि वह जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के प्रश्न पर क्या रुख अपनाती है।इस पूरे घटनाक्रम ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में तीन समानांतर सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या राज्यhood जल्द बहाल होगा?
क्या राज्यhood की मांग को 2019 से पहले की संवैधानिक व्यवस्था से अलग रखा जा सकेगा?
और क्या विधानसभा की यह पहल केंद्र और जम्मू-कश्मीर के बीच लंबे समय से चले आ रहे संवैधानिक-राजनीतिक संवाद को नई दिशा देगी?
फिलहाल इतना तय है कि राज्यhood की मांग अब केवल चुनावी घोषणा या राजनीतिक बयान नहीं रही; यह जम्मू-कश्मीर विधानसभा के औपचारिक प्रस्ताव के रूप में केंद्र के सामने पहुंच चुकी है।
लेकिन अनुच्छेद 370, 35A और स्वायत्तता को लेकर मतभेद ने इस मांग के रास्ते को राजनीतिक रूप से कहीं अधिक जटिल बना दिया है।
