सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, 22 आरोपियों को नोटिस, CJI बोले—मामला दोबारा खोलने का सवाल नहीं, लेकिन यह जरूर देखेंगे कि सुनवाई निष्पक्ष थी या नहीं

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 28‌ सितंबर

करीब दो दशक पुराने सोहराबुद्दीन शेख कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में एक बार फिर कानूनी हलचल तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर CBI और 22 आरोपियों को नोटिस जारी किया है, जिसमें हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी किए जाने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।

मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर 2026 को होगी।यह याचिका सोहराबुद्दीन के भाई रूबाबुद्दीन शेख ने दायर की है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं।

‘92 गवाहों का मुकरना चिंता का विषय’सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण

सवाल गवाहों के बड़ी संख्या में मुकरने को लेकर उठा।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मामले में कई गवाहों के बयान बदले और अभियोजन पक्ष की कहानी को प्रभावित करने वाले घटनाक्रम सामने आए।न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने 92 गवाहों के मुकरने को चिंता का विषय बताया। अदालत ने संकेत दिया कि वह उन गवाहों के बयानों को देखना चाहती है, जिन पर याचिकाकर्ता भरोसा कर रहा है।यही बिंदु अब इस मुकदमे की अगली कानूनी पड़ताल का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है—क्या गवाहों के मुकरने के बावजूद मुकदमे की प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष रही थी?

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया—‘मामला दोबारा नहीं खोलेंगे’

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सीमा भी स्पष्ट कर दी। अदालत ने कहा कि वह मामले को नए सिरे से खोलने नहीं जा रही है। हालांकि, अदालत यह जांच सकती है कि निचली अदालत में सुनवाई निष्पक्ष तरीके से हुई थी या नहीं।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को 2014 में मिली डिस्चार्ज की स्थिति को इस याचिका के जरिए दोबारा नहीं खोला जाएगा। उस पहलू से जुड़ी कार्यवाही पहले ही अंतिम रूप ले चुकी है।

इससे साफ है कि मौजूदा सुप्रीम कोर्ट की पड़ताल का केंद्र 22 आरोपियों के बरी होने के खिलाफ उठाई गई चुनौती और ट्रायल की निष्पक्षता है, न कि मामले के हर पुराने पहलू को नए सिरे से खोलना।

2005 से अब तक लंबा कानूनी सफर

सोहराबुद्दीन शेख की नवंबर 2005 में गुजरात में पुलिस मुठभेड़ में मौत हुई थी। मामले में उनकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की मौत से जुड़े आरोप भी जांच के दायरे में आए।मामले की जांच पहले गुजरात CID के पास थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर CBI ने आगे की जांच की।

दिसंबर 2018 में विशेष CBI अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया था। इसके बाद पीड़ित परिवार की ओर से इस फैसले को चुनौती दी गई।

7 मई 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए 22 आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ अपीलें खारिज कर दीं। बरी किए गए 22 आरोपियों में 21 पुलिसकर्मी थे।

हाईकोर्ट के फैसले में क्या था?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि अभियोजन की कहानी मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित थी और कथित साजिश को पर्याप्त रूप से साबित नहीं किया जा सका। अदालत ने अभियोजन के मामले में कई कड़ियों के टूटे होने और प्रत्यक्ष साक्ष्य के अभाव का भी उल्लेख किया।

यानी एक तरफ हाईकोर्ट का निष्कर्ष है कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका, तो दूसरी तरफ अब सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल यह है कि उस निष्कर्ष तक पहुंचने वाली न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष थी या नहीं।

अब 28 अक्टूबर पर टिकी निगाहें

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने से मामले में एक नया कानूनी अध्याय जरूर खुला है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आरोप सिद्ध हो गए हैं या बरी किए गए लोगों के खिलाफ कोई अंतिम निष्कर्ष निकल चुका है।

अब CBI और 22 आरोपियों के जवाब, याचिकाकर्ता द्वारा भरोसा किए जा रहे गवाहों के बयान और ट्रायल की प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे।

28 अक्टूबर की सुनवाई यह स्पष्ट कर सकती है कि सुप्रीम कोर्ट इस चुनौती को किस सीमा तक आगे सुनता है और कथित तौर पर बड़ी संख्या में गवाहों के मुकरने के मुद्दे को किस कानूनी नजरिए से देखता है।

करीब 20 वर्ष पुराने इस मामले में अब सवाल केवल पुराने फैसलों का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और उपलब्ध साक्ष्यों के मूल्यांकन का भी बन गया है।

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