बी के झा
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नई दिल्ली, 28 सितंबर
कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली नकली दवाओं और जीवनरक्षक इंजेक्शन की कथित बिक्री एवं आपूर्ति का मामला अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। इस गंभीर मुद्दे को लेकर अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने जनहित याचिका (PIL) दायर कर नकली दवाओं के निर्माण और वितरण पर प्रभावी रोक लगाने तथा ऐसे अपराधों को संगठित अपराध के दायरे में लाने की मांग की है।याचिका में कहा गया है कि नकली दवाओं का कारोबार केवल आर्थिक धोखाधड़ी का मामला नहीं है। जब किसी मरीज को जीवन बचाने के लिए जरूरी दवा के नाम पर नकली या घटिया उत्पाद दिया जाता है, तो उसके परिणाम सीधे उसकी जिंदगी पर पड़ सकते हैं।
अस्पतालों तक पहुंच रही नकली दवाएं?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दावा किया कि बेंगलुरु के अस्पतालों में नकली कैंसर दवाओं की सप्लाई और राजस्थान में नकली जीवनरक्षक इंजेक्शन पहुंचने जैसे मामले सामने आए हैं।उन्होंने अदालत के समक्ष नकली दवाओं के निर्माण, आपूर्ति और बिक्री की पूरी श्रृंखला पर कठोर कार्रवाई की जरूरत बताई।
उनका तर्क था कि यदि अपराधी संगठित तरीके से ऐसी दवाएं तैयार कर बाजार और अस्पतालों तक पहुंचा रहे हैं, तो इसे सामान्य मिलावट या धोखाधड़ी के अपराध तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा।‘
‘आतंकवाद से भी ज्यादा मौतें’—याचिकाकर्ता की दलील
सुनवाई के दौरान उपाध्याय ने नकली दवाओं के खतरे की गंभीरता बताते हुए कहा कि आतंकवादी एक वर्ष में जितनी जान लेते हैं, उससे कहीं अधिक मौतें नकली दवाओं से हो सकती हैं। यह आंकड़ा उन्होंने अपनी दलील के समर्थन में रखा।उन्होंने नकली दवा बनाने और बेचने वाले नेटवर्क को संगठित अपराध की श्रेणी में शामिल करने की मांग की।
हालांकि, यह आंकड़ा और तुलना याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में रखी गई दलील है, इसे सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
कानून में खामी या कानून के अमल का सवाल?
सुनवाई में नकली दवाओं के खिलाफ मौजूदा कानूनी प्रावधानों पर भी चर्चा हुई। याचिकाकर्ता की ओर से कानून में कथित कमी का मुद्दा उठाया गया, जिस पर जस्टिस बागची ने कहा कि इस संबंध में कानून मौजूद है और इसमें उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है।याचिकाकर्ता का कहना था कि किसी व्यक्ति को नकली दवा देना अपराध है, लेकिन नकली दवाओं के निर्माण और उनके संगठित वितरण को व्यापक रूप से ‘ऑर्गेनाइज्ड क्राइम’ के ढांचे में लाने की जरूरत है।
यहीं से मामला महज दवा की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि कानून की धार, प्रवर्तन तंत्र और आपूर्ति श्रृंखला की जवाबदेही का बन जाता है।
CJI ने नकली कफ सिरप मामले का किया जिक्र
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान नकली कफ सिरप से जुड़े मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले सामने आने पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कड़े आदेश जारी कर चुका है।
अदालत के सामने यह सवाल भी आया कि यदि मुकदमों को तेजी से निपटाने का निर्देश दिया जाए तो क्या व्यावहारिक समस्याएं सामने नहीं आएंगी।
CJI ने संकेत दिया कि अदालत तीन महीने के भीतर मुकदमे की कार्यवाही पूरी करने जैसे निर्देश दे सकती है, लेकिन गवाहों के सामने न आने और अन्य व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण मुकदमों में देरी हो सकती है।
कोर्ट ने कहा—पहले सरकार के सामने रखें सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपने सुझाव और सिफारिशें संबंधित सरकारी अधिकारियों के समक्ष रखे और उन्हें उन पर कार्रवाई करने का अवसर दिया जाए।
अदालत ने संकेत दिया कि यदि प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर प्रभावी कार्रवाई संभव है, तो केवल मामले को अदालत में लंबित रखने की तुलना में संबंधित अधिकारियों के माध्यम से समाधान की दिशा में आगे बढ़ना अधिक प्रभावी हो सकता है।
नकली दवा का सवाल आखिर कितना गंभीर?
नकली दवा का अपराध किसी सामान्य बाजारू धोखाधड़ी जैसा नहीं है। मरीज डॉक्टर की पर्ची और दवा के नाम पर भरोसा करता है। कैंसर जैसे मामलों में जहां इलाज पहले ही बेहद जटिल और महंगा होता है, वहां यदि असली दवा के नाम पर नकली उत्पाद मरीज तक पहुंच जाए तो उसके सामने खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
अब असली चुनौती यह है कि नकली दवा बनाने वाले से लेकर सप्लायर, वितरक और बाजार में उसे पहुंचाने वाले पूरे नेटवर्क तक जवाबदेही कैसे तय की जाए।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंची यह PIL इसी बड़े सवाल को सामने रखती है—क्या जीवनरक्षक दवाओं की नकली सप्लाई को केवल दवा कानून के उल्लंघन तक सीमित रखा जाए, या इसके संगठित नेटवर्क के खिलाफ कहीं अधिक कठोर कानूनी ढांचा तैयार किया जाए?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपने सुझाव संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखने को कहा है।
आगे की कार्रवाई सरकार और संबंधित नियामक तंत्र की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगी।
