बी के झा
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नई दिल्ली, 1 अक्टूबर
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रही बहस अब तकनीक बनाम कानून के एक बेहद अहम सवाल तक पहुंच गई है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की उस प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें कथित तौर पर सॉफ्टवेयर की व्यवस्था के कारण मतदाताओं के Form 8 आवेदन पर कार्रवाई नहीं हो सकी और छह सदस्यों वाले एक परिवार के नाम मतदाता सूची से हट गए।
जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि चुनावी प्रक्रिया में कानून और नियम सर्वोपरि हैं। अदालत के मुताबिक तकनीकी व्यवस्था ऐसी नहीं हो सकती जो वैधानिक प्रक्रिया पर हावी हो जाए।
‘अब कानून नहीं, सॉफ्टवेयर के हिसाब से चलेंगे?
’मामला गोवा के सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र के एक परिवार से जुड़ा है। परिवार के छह सदस्यों ने एक ही विधानसभा क्षेत्र के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में पता बदलने के लिए Form 8 दाखिल किया था। इसके बावजूद SIR के दौरान उनके नाम मतदाता सूची से हट गए।चुनाव आयोग की ओर से अदालत में बताया गया कि SIR की प्रक्रिया के दौरान सिस्टम Form 8 को प्रोसेस करने की अनुमति नहीं दे रहा था। इसी तकनीकी व्यवस्था के चलते आवेदन पर कार्रवाई नहीं हो सकी और नाम हट गए।
यहीं से अदालत के सवालों का असली केंद्र सामने आया।
खंडपीठ ने सवाल किया कि यदि कानून किसी मतदाता को अपना पता बदलने के लिए Form 8 का अधिकार देता है, तो महज इसलिए उस अधिकार को कैसे रोका जा सकता है कि सॉफ्टवेयर उस समय आवेदन स्वीकार नहीं कर रहा था?
अदालत ने बेहद तल्ख अंदाज में पूछा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि SIR के नाम पर कानून और नियमों को कुछ समय के लिए किनारे रखकर सिस्टम के निर्देशों को ही सर्वोपरि बना दिया गया?
‘बिना सुनवाई किसी का नाम कैसे हटा सकते हैं?
’कोर्ट ने चुनाव आयोग से सीधा सवाल किया कि आखिर किस कानूनी प्रावधान के तहत किसी मतदाता का नाम बिना उसे सुनवाई का अवसर दिए मतदाता सूची से हटाया जा सकता है।
खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम हटाया जाना है तो उसे पहले अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया में मतदाता को केवल एक डेटा एंट्री या सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड की तरह नहीं देखा जा सकता।यही टिप्पणी पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन गई है—मतदाता सूची में नाम केवल एक डिजिटल रिकॉर्ड नहीं, बल्कि मतदान के संवैधानिक अधिकार से जुड़ा मामला है।
‘ERO के पास होनी चाहिए सॉफ्टवेयर की चाबी’
अदालत ने Electoral Registration Officer यानी ERO की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए।खंडपीठ ने कहा कि ERO के पास सॉफ्टवेयर को खोलने, उसमें आवश्यक बदलाव करने और अपने वैधानिक आदेश के अनुसार किसी प्रविष्टि को संशोधित या हटाने की क्षमता होनी चाहिए। अधिकारी किसी तीसरे व्यक्ति अथवा सॉफ्टवेयर के आदेश पर निर्भर होकर असहाय नहीं हो सकता।
अदालत का संदेश साफ था—तकनीक प्रशासन की मदद के लिए है, कानून को नियंत्रित करने के लिए नहीं।छह नाम हटे हैं तो कितने और लोग प्रभावित हुए होंगे?
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मामले के व्यापक प्रभाव पर भी चिंता जताई। खंडपीठ ने सवाल उठाया कि यदि एक परिवार के छह लोगों को ऐसी परेशानी का सामना करना पड़ा और वे अदालत तक पहुंच गए, तो ऐसे कितने मतदाता हो सकते हैं जो इसी तरह की समस्या के बावजूद अदालत तक नहीं पहुंचे?
यही सवाल SIR की तकनीकी व्यवस्था को लेकर सबसे बड़ी चिंता पैदा करता है।यदि किसी सॉफ्टवेयर की सीमा के कारण वैध आवेदन पर कार्रवाई नहीं हो पाती और उसका परिणाम मतदाता सूची से नाम हटने के रूप में सामने आता है, तो फिर जवाबदेही किसकी होगी—सॉफ्टवेयर की, अधिकारी की या चुनाव आयोग की?
‘Form 8 नहीं चला तो Form 6 क्यों?
’चुनाव आयोग की ओर से यह भी बताया गया कि कुछ मतदाताओं के नाम दोबारा सूची में शामिल हुए, जिन्होंने Form 6 दाखिल किया था। आयोग ने अदालत को यह भी बताया कि संबंधित परिवार ने न तो एन्यूमरेशन फॉर्म जमा किया था और न ही Form 6 भरने के लिए तैयार था।इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि जब सिस्टम ने Form 8 के जरिए पता बदलने की प्रक्रिया ही स्वीकार नहीं की, तो फिर मतदाता से Form 6 भरने को कहना समस्या का समाधान कैसे हो सकता है?
अदालत के मुताबिक यही मूल समस्या थी—मतदाता को उस कानूनी रास्ते से आगे बढ़ने नहीं दिया गया, जिसका इस्तेमाल वह अपने रिकॉर्ड में बदलाव के लिए कर सकता था।
SIR कोई ‘कानून से अलग’ प्रक्रिया नहीं—हाईकोर्ट खंडपीठ ने कहा कि SIR को कानून से अलग कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसे Registration of Electors Rules, 1960 के Rule 13 और Representation of the People Act, 1950 की Section 22 के अनुरूप रखने की बात कही।
अदालत के मुताबिक मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया चल रही हो, तब भी वैधानिक प्रावधानों के तहत मतदाता Form 6, Form 7 और Form 8 के जरिए संबंधित आवेदन कर सकता है। कोई पुनरीक्षण प्रक्रिया इन कानूनी प्रावधानों को अपने आप निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
EC की सफाई—किसी का नाम जानबूझकर नहीं हटाया
चुनाव आयोग के वकील ने अदालत में कहा कि आयोग का किसी व्यक्ति का नाम जानबूझकर हटाने का कोई इरादा नहीं था।लेकिन अदालत ने इरादे से आगे बढ़कर कानूनी प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना। अदालत की टिप्पणी का सार यही था कि किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे अपनी बात रखने का अवसर देना आवश्यक है।
एनएसके विश्लेषण:
चुनावी लोकतंत्र में ‘क्लिक’ से बड़ा है नागरिक का अधिकार
SIR के इस मामले ने चुनावी व्यवस्था के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—क्या डिजिटल सिस्टम कानून के अनुसार चलेगा या कानून को सिस्टम के अनुसार ढाल दिया जाएगा?
तकनीक चुनावी प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने का माध्यम हो सकती है। लेकिन यदि तकनीकी व्यवस्था किसी वैधानिक अधिकार के इस्तेमाल में बाधा बनती है, तो सवाल केवल सॉफ्टवेयर की क्षमता का नहीं रह जाता; सवाल जवाबदेही और नागरिक अधिकार का बन जाता है।
मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी कड़ी है। उसमें किसी नाम का जुड़ना या हटना महज डेटाबेस में बदलाव नहीं है। उसके पीछे एक नागरिक का मतदान अधिकार और लोकतांत्रिक भागीदारी जुड़ी होती है।
बॉम्बे हाईकोर्ट की सुनवाई ने फिलहाल इसी मूल सिद्धांत को सामने रखा है—सिस्टम कितना भी आधुनिक क्यों न हो, उसके ऊपर कानून होना चाहिए।
और लोकतंत्र में अंतिम सवाल शायद यही है—सॉफ्टवेयर आदेश देगा या कानून?
अदालत की टिप्पणियों ने इस सवाल को अब चुनावी व्यवस्था के केंद्र में ला खड़ा किया है।
