बी के झा
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पटना, 1 अक्टूबर
राजधानी पटना में बिजली विभाग की बिलिंग व्यवस्था से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने घरेलू उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ाने के साथ-साथ सरकारी डिजिटल सिस्टम की निगरानी और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
आलमगंज थाना क्षेत्र के गुलजारबाग स्थित जय हिंद गली निवासी घरेलू बिजली उपभोक्ता कृष्णा प्रसाद सिंह के बिजली खाते में अचानक 2 करोड़ 33 लाख 24 हजार 112 रुपये की राशि दिखाई देने लगी।घरेलू बिजली कनेक्शन पर इतनी बड़ी रकम देखकर कृष्णा प्रसाद सिंह के होश उड़ गए। उनके मुताबिक, मोबाइल पर करोड़ों रुपये की राशि देखने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और वह अचानक गिर पड़े। परिवार के सदस्यों ने उन्हें संभाला, पानी के छींटे दिए और दवा दी।यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब बिजली व्यवस्था को लगातार डिजिटल और स्मार्ट बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
दक्षिण बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (SBPDCL) की वेबसाइट पर भी ऑनलाइन बिलिंग, स्मार्ट मीटर और उपभोक्ता सेवाओं की डिजिटल व्यवस्था उपलब्ध है।
206 रुपए से सीधे 2• 33 करोड़
कृष्णा प्रसाद सिंह के अनुसार, 30 सितंबर 2026 को जब उन्होंने अपने बिजली खाते की जानकारी मोबाइल पर देखी तो वह हैरान रह गए। इससे पहले खाते में करीब 206 रुपये का बैलेंस दिखाई दे रहा था, लेकिन अचानक स्क्रीन पर 2,33,24,112 रुपये की राशि नजर आने लगी।एक सामान्य घरेलू उपभोक्ता के लिए यह आंकड़ा सिर्फ हैरानी पैदा करने वाला नहीं, बल्कि मानसिक रूप से परेशान करने वाला भी हो सकता है।
कृष्णा प्रसाद सिंह का कहना है कि उन्हें समझ ही नहीं आया कि आखिर उनके घरेलू कनेक्शन पर इतनी बड़ी राशि किस आधार पर दिखाई गई।
करोड़ों का आंकड़ा देखकर गिर पड़े उपभोक्ता
परिवार के मुताबिक, करोड़ों रुपये की रकम देखकर कृष्णा प्रसाद सिंह तनाव में आ गए और उनकी तबीयत बिगड़ गई। वह अचानक गिर पड़े। परिजनों ने उन्हें संभाला और तत्काल पानी के छींटे देकर होश में लाने की कोशिश की। इसके बाद उन्हें दवा दी गई।
सवाल यह है कि अगर किसी सामान्य परिवार के सामने अचानक करोड़ों रुपये का बिजली बिल आ जाए तो उसकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी?
डर, तनाव और घबराहट स्वाभाविक है। यही वजह है कि बिजली बिलिंग में एक छोटी सी तकनीकी गलती भी उपभोक्ता के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है।
बेटे को भेजना पड़ा बिजली विभाग के कार्यालय
मामले की जानकारी मिलने के बाद कृष्णा प्रसाद सिंह ने अपने बेटे को बिजली विभाग के कार्यालय भेजा। परिवार के अनुसार, वहां मौजूद विभागीय कर्मचारी ने बिल में गड़बड़ी होने की बात स्वीकार करते हुए उसे ठीक करने का आश्वासन दिया।इसके बाद परिवार को उम्मीद जगी कि करोड़ों रुपये की यह राशि वास्तविक बकाया नहीं है, बल्कि बिलिंग या सिस्टम से जुड़ी किसी त्रुटि का परिणाम है।
अगले दिन बदली तस्वीर, 2.33 करोड़ से 333.45 रुपये!
मामले में राहत की बात यह रही कि 1 अक्टूबर 2026 को बिजली खाते में सुधार कर दिया गया। सुधार के बाद खाते में 333 रुपये 45 पैसे का बैलेंस दिखाई देने लगा।यानी जिस खाते में कुछ समय पहले 2,33,24,112 रुपये दिखाई दे रहे थे, उसी खाते में सुधार के बाद महज 333.45 रुपये का बैलेंस सामने आया।घटना की यही तस्वीर पूरे मामले को और गंभीर बना देती है।
क्योंकि यदि करोड़ों रुपये की राशि वास्तव में गलत थी और विभागीय स्तर पर उसे अगले दिन ठीक किया जा सकता है, तो सवाल उठता है कि इतनी बड़ी राशि उपभोक्ता के खाते में प्रदर्शित होने से पहले सिस्टम ने उसे असामान्य मानकर रोक क्यों नहीं दिया?
सिर्फ गलती नहीं, सिस्टम की जांच का भी सवाल
बिजली विभाग की ओर से राशि सुधार दिए जाने के बाद तत्काल समस्या भले ही खत्म हो गई हो, लेकिन इससे बड़ा सवाल अब भी कायम है—बिलिंग सिस्टम में ऐसी असाधारण राशि दर्ज होने के बाद उसे सत्यापित करने की व्यवस्था क्या है?
क्या करोड़ों रुपये का बिल किसी घरेलू कनेक्शन पर स्वतः जनरेट हो सकता है?
क्या असामान्य खपत या असामान्य बिल राशि के लिए कोई डिजिटल अलर्ट सिस्टम है?
क्या बिल उपभोक्ता तक पहुंचने से पहले उसका मानवीय या तकनीकी सत्यापन होता है?
और यदि ऐसा सिस्टम मौजूद है, तो इस मामले में वह सक्रिय क्यों नहीं हुआ?
इन सवालों के जवाब बिजली विभाग की पारदर्शिता और उपभोक्ता विश्वास के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।’बिजली बिल की गलती जान पर भारी पड़ सकती है’कृष्णा प्रसाद सिंह ने इस घटना पर नाराजगी जताते हुए कहा कि घरेलू उपभोक्ता के खाते में अचानक करोड़ों रुपये की राशि दिखाई देना बेहद गंभीर मामला है। उनका कहना है कि ऐसी गलती किसी व्यक्ति को मानसिक रूप से बुरी तरह प्रभावित कर सकती है और विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में किसी दूसरे उपभोक्ता को ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े।
पटना जिला प्रशासन की वेबसाइट पर बिजली बिल भुगतान के लिए दक्षिण बिहार विद्युत वितरण कंपनी को अधिकृत सेवा के रूप में दर्शाया गया है।
बिहार में डिजिटल बिजली व्यवस्था के बीच जवाबदेही का सवाल
बिहार में बिजली व्यवस्था को तकनीकी रूप से मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर निवेश और आधुनिकीकरण की योजनाएं चल रही हैं। राज्य सरकार के ऊर्जा विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, पटना शहर के विभिन्न विद्युत प्रमंडलों में भूमिगत केबलिंग तथा SCADA-DMS जैसी व्यवस्थाओं के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएं स्वीकृत की गई हैं।ऐसे में उपभोक्ता के खाते में करोड़ों रुपये की असामान्य राशि का दिखाई देना सिर्फ एक व्यक्ति की परेशानी के रूप में खत्म नहीं किया जाना चाहिए। तकनीक पर जितना खर्च बढ़ रहा है, उतनी ही मजबूत ऑडिट, सत्यापन और जवाबदेही की व्यवस्था भी जरूरी है।
स्थानीय समाजसेवी ने उठाया बड़ा सवाल
मामले पर एक वरिष्ठ स्थानीय समाजसेवी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कहा कि यह घटना केवल बिजली बिल की तकनीकी गड़बड़ी मानकर समाप्त नहीं की जानी चाहिए। उनके अनुसार, सरकारी विभागों में जवाबदेही और निगरानी का सवाल लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है।उन्होंने बिहार में सरकारी व्यवस्थाओं में कथित भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए कहा कि यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी को सिस्टम में गड़बड़ी की जानकारी होती है तो उसकी शिकायत का प्रभावी समाधान होना चाहिए।
इसी संदर्भ में उन्होंने झंझारपुर के कार्यपालक अभियंता नटवर लाल गुप्ता से कथित बातचीत का हवाला देते हुए कुछ शिकायतों का उल्लेख किया।
समाजसेवी के अनुसार, बातचीत में अधिकारी ने विभागीय स्तर पर दबाव और अधीनस्थ स्तर पर उनकी बात नहीं सुने जाने की समस्या व्यक्त की थी।
राजनीतिक गलियारों में भी उठ सकता है जवाबदेही का सवाल
पटना की इस घटना ने स्वाभाविक रूप से सरकारी सिस्टम की जवाबदेही को लेकर राजनीतिक बहस की गुंजाइश पैदा कर दी है। विपक्षी दल यदि इस मामले को मुद्दा बनाते हैं तो उनका मुख्य सवाल संभवतः यही होगा कि एक घरेलू उपभोक्ता के खाते में करोड़ों रुपये की राशि पहुंचने से पहले सिस्टम की निगरानी कहां थी?
वहीं सत्ता पक्ष की ओर से यह तर्क दिया जा सकता है कि तकनीकी गड़बड़ी सामने आने के बाद उसे तत्काल ठीक कर दिया गया और इससे यह भी साबित होता है कि शिकायत निवारण व्यवस्था काम कर रही है।दोनों पक्षों के बीच वास्तविक राजनीतिक बहस का केंद्र यही होना चाहिए कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कौन-से तकनीकी और प्रशासनिक सुधार किए जाएंगे।
शिक्षाविदों की नजर में ‘डिजिटल भरोसे’ का सवाल
शिक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था के जानकारों के लिए यह मामला एक व्यापक प्रश्न भी खड़ा करता है—क्या डिजिटल सिस्टम सिर्फ तेज होना चाहिए या उतना ही जवाबदेह भी?
जब सरकारी सेवाएं तेजी से ऑनलाइन हो रही हैं, तब एक गलत आंकड़ा हजारों किलोमीटर दूर बैठे किसी व्यक्ति तक कुछ सेकंड में पहुंच सकता है। इसलिए डिजिटल प्रशासन में मानवीय हस्तक्षेप कम करने के साथ-साथ गलत आंकड़ों को पहचानने वाली तकनीकी सुरक्षा भी जरूरी है।
एक घरेलू उपभोक्ता के खाते में करोड़ों रुपये का बिल दिखाई देना इस बात का उदाहरण है कि डिजिटल सुविधा के साथ डिजिटल जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है।
कानूनविदों के लिए भी महत्वपूर्ण सवाल
कानूनी विशेषज्ञों के नजरिए से भी ऐसे मामलों में यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि यदि गलत बिल के कारण किसी उपभोक्ता को आर्थिक या शारीरिक नुकसान होता है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी।
क्या विभाग केवल राशि सुधारकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर देता है?
या फिर ऐसी असाधारण बिलिंग के कारणों की जांच कर यह तय किया जाना चाहिए कि गलती किस स्तर पर हुई?
क्या उपभोक्ता को गलत बिल के कारण हुए मानसिक तनाव या अन्य नुकसान के लिए किसी शिकायत निवारण तंत्र का सहारा लेना चाहिए?
इन सवालों का स्पष्ट उत्तर विभागीय जांच और लागू उपभोक्ता नियमों के आधार पर ही दिया जा सकता है।
एक करोड़ों का बिल, लेकिन असली मुद्दा उससे बड़ा
पटना का यह मामला देखने में भले ही एक असाधारण बिजली बिल की कहानी हो, लेकिन इसके भीतर सरकारी डिजिटल व्यवस्था की विश्वसनीयता का बड़ा सवाल छिपा है।2,33,24,112 रुपये से 333.45 रुपये तक का सफर सिर्फ एक आंकड़े का बदलाव नहीं है। यह सवाल है कि सिस्टम ने इतनी बड़ी विसंगति को पहले क्यों नहीं पकड़ा और अगर उपभोक्ता ने खुद इसे नहीं देखा होता तो क्या होता?
बिहार में आम नागरिक सरकारी सेवाओं से सुविधा, पारदर्शिता और समय पर समाधान की उम्मीद करता है। बिजली जैसा आवश्यक क्षेत्र सीधे हर परिवार की जिंदगी से जुड़ा है। ऐसे में बिलिंग व्यवस्था में एक बड़ी गलती भी उपभोक्ता के विश्वास को प्रभावित कर सकती है।
एनएसके का सवाल
करोड़ों रुपये का गलत बिल बनने के बाद उसे ठीक कर देना समाधान जरूर है, लेकिन ऐसी गलती हुई क्यों—इसकी जवाबदेही तय करना उससे भी ज्यादा जरूरी है।
बिजली विभाग को चाहिए कि इस मामले की तकनीकी जांच कर यह स्पष्ट करे कि 2.33 करोड़ रुपये की राशि किस स्तर पर और किस कारण से उपभोक्ता के खाते में प्रदर्शित हुई, क्या यह स्मार्ट मीटर/बिलिंग सॉफ्टवेयर/डेटा एंट्री से जुड़ी त्रुटि थी
और भविष्य में ऐसी असामान्य राशि को उपभोक्ता के खाते में प्रदर्शित होने से पहले रोकने के लिए क्या व्यवस्था की जा रही है।
क्योंकि सवाल सिर्फ कृष्णा प्रसाद सिंह के 333 रुपये के बैलेंस का नहीं है—सवाल बिहार के लाखों बिजली उपभोक्ताओं के भरोसे का है।
