CEC नियुक्ति कानून पर सुप्रीम कोर्ट का अगला कदम: ‘हम विचार करेंगे, फैसला लेंगे’—CJI सूर्यकांत के इस बयान के मायने क्या?

बी के झा

NSK news India

नई दिल्ली, 8 अक्टूबर

भारत में चुनाव केवल सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता की सबसे बड़ी कसौटी हैं। ऐसे में चुनाव आयोग के प्रमुख—मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों (ECs)—की नियुक्ति किस प्रक्रिया से हो, चयन समिति में कौन-कौन शामिल हो और उस प्रक्रिया में न्यायपालिका की क्या भूमिका होनी चाहिए, यह सवाल महज नियुक्ति का प्रशासनिक विवाद नहीं है।

इसी संवेदनशील मुद्दे पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में उस समय नया मोड़ आया, जब मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस याचिका पर विचार करने की सहमति जताई, जिसमें 23 सितंबर के खंडित फैसले को वापस लेने की मांग की गई है।वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने जब याचिका का उल्लेख किया तो सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण टिप्पणी की—“हम इस पर विचार करेंगे और फैसला लेंगे।

”अदालत का यह छोटा-सा वाक्य अपने भीतर एक बड़े संवैधानिक विवाद की अगली कड़ी समेटे हुए है।

आखिर विवाद किस कानून को लेकर है?

विवाद 2023 में बनाए गए उस कानून से जुड़ा है, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन प्रक्रिया निर्धारित की गई है।इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चयन समिति से भारत के प्रधान न्यायाधीश को बाहर क्यों रखा गया?

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता के साथ CJI को शामिल करने वाली व्यवस्था की बात सामने आई थी। बाद में संसद ने कानून बनाकर उस संरचना को बदल दिया। यही बदलाव अब न्यायिक चुनौती के केंद्र में है।

सवाल सीधा है—क्या चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के प्रमुखों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका इतनी प्रभावी हो सकती है कि चयन प्रक्रिया में न्यायपालिका की स्वतंत्र आवाज ही मौजूद न रहे?

और दूसरी तरफ सरकार का पक्ष यह रहा है कि नियुक्ति की प्रक्रिया तय करना संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है।यानी मामला केवल ‘कौन नियुक्त करेगा’ का नहीं है। मामला इस बात का है कि चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता को किस तरह सुरक्षित रखा जाए।

23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में क्यों आया था पेच?

इस मामले में असली कानूनी मोड़ 23 सितंबर को आया था।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो सदस्यीय पीठ ने इस सवाल पर अलग-अलग राय दी थी कि 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं।यानी अदालत एकमत नहीं थी।जस्टिस दत्ता ने केंद्र की उस मांग को स्वीकार नहीं किया, जिसमें मामले को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने का आग्रह किया गया था।

वहीं जस्टिस शर्मा ने मामले को बड़ी पीठ के समक्ष भेजे जाने का समर्थन किया।दोनों न्यायाधीशों की राय अलग होने के बाद मामला प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष पहुंचा, ताकि आगे की सुनवाई के लिए उचित संख्या वाली पीठ का गठन किया जा सके।यहीं से मामला और महत्वपूर्ण हो गया।क्योंकि जब किसी संवैधानिक प्रश्न पर दो न्यायाधीशों की राय अलग हो जाए, तो आगे की न्यायिक प्रक्रिया स्वयं एक संवैधानिक महत्व का विषय बन जाती है।

अब फैसले को वापस लेने की मांग क्यों?

बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष उस याचिका का उल्लेख किया, जिसमें 23 सितंबर के फैसले को वापस लेने की मांग की गई है।उन्होंने अदालत को बताया कि पहले इस याचिका का उल्लेख जस्टिस दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने किया गया था, लेकिन बाद में मामला उस पीठ से हटाकर इसे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने को कहा गया।यही वजह है कि अब सभी की नजरें सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की अगली कार्रवाई पर हैं।

हालांकि सीजेआई की टिप्पणी को किसी अंतिम निर्णय या याचिका स्वीकार किए जाने के रूप में नहीं देखा जा सकता।अदालत ने केवल इतना कहा है कि वह इस पर विचार करेगी और फैसला लेगी।लेकिन संवैधानिक महत्व वाले मामलों में कई बार अदालत का इतना कहना भी आगे की न्यायिक प्रक्रिया की दिशा को लेकर महत्वपूर्ण संकेत देता है।

क्यूरेटिव याचिका और अंतरिम याचिका—दोनों में क्या फर्क?

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने यह भी पूछा कि क्या इस मामले में कोई अन्य अंतरिम याचिका दाखिल की गई है।इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि एक क्यूरेटिव याचिका भी दाखिल की गई है, लेकिन फैसले को वापस लेने के लिए दाखिल की गई अंतरिम याचिका उससे अलग है।उन्होंने अदालत को बताया कि क्यूरेटिव याचिका पर अलग तरीके से विचार होगा और यह भी स्पष्ट किया कि क्यूरेटिव प्रक्रिया और फैसले को वापस लेने की मांग एक जैसी प्रक्रिया नहीं हैं।

यानी फिलहाल मामला एक नहीं, बल्कि न्यायिक उपचार के अलग-अलग रास्तों से गुजर रहा है।

असली सवाल—चुनाव आयोग कितना स्वतंत्र?

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक सवाल यही है।भारत में चुनाव आयोग को संविधान ने स्वतंत्र संस्था के रूप में स्थापित किया है। आयोग पर चुनाव कराने, चुनाव कार्यक्रम निर्धारित करने, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों से जुड़े चुनावी नियम लागू करने तथा निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है।ऐसी स्थिति में उसके शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर उठने वाला हर सवाल सीधे लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ जाता है।यदि नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार की भूमिका बहुत प्रभावशाली हो, तो विपक्ष सवाल उठाता है कि क्या आयोग पूरी तरह स्वतंत्र रह पाएगा?

वहीं सरकार के पक्ष से यह तर्क सामने आता है कि निर्वाचित सरकार को नियुक्ति प्रक्रिया में भूमिका से पूरी तरह बाहर रखना लोकतांत्रिक जवाबदेही के सिद्धांत के अनुरूप नहीं होगा।यानी दोनों पक्षों के अपने संवैधानिक तर्क हैं।अब निर्णायक सवाल यह है कि संविधान की कसौटी पर कौन-सा मॉडल संस्थागत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच बेहतर संतुलन बनाता है?

बड़ी संविधान पीठ क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है?

अगर यह मामला बड़ी संविधान पीठ के सामने जाता है, तो सुनवाई का दायरा केवल 2023 के कानून की वैधता तक सीमित नहीं रह सकता।अदालत के सामने व्यापक सवाल आ सकते हैं—- चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमा क्या है?

CEC और EC की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका कितनी होनी चाहिए?

क्या चयन प्रक्रिया में न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व जरूरी है?

संसद द्वारा बनाई गई नई नियुक्ति व्यवस्था क्या संविधान के मूल ढांचे से टकराती है?

और सबसे अहम—क्या चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता केवल कानून से सुनिश्चित होगी या नियुक्ति की प्रक्रिया में भी उसका प्रतिबिंब दिखना चाहिए?

इन सवालों के जवाब भविष्य की चुनावी संस्थाओं के लिए दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं।सरकार बनाम विपक्ष से कहीं बड़ा है मामलाइस विवाद को केवल बीजेपी बनाम विपक्ष या सरकार बनाम अदालत की लड़ाई के रूप में देखना इस पूरे मुद्दे को छोटा कर देगा।क्योंकि सत्ता में आज कोई एक दल है, कल दूसरा दल होगा। लेकिन चुनाव आयोग स्थायी संवैधानिक संस्था है।

आज जिस नियुक्ति प्रक्रिया को कोई सरकार अपने पक्ष में सही मान सकती है, कल वही व्यवस्था विपक्ष में बैठी पार्टी को असहज कर सकती है।इसीलिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता का सवाल किसी एक चुनाव या किसी एक राजनीतिक दल से बड़ा है।लोकतंत्र में चुनाव जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भरोसा भी है कि चुनाव कराने वाली संस्था किसी सत्ता के दबाव में नहीं है।

23 सितंबर की दो राय से अब आगे क्या?

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 23 सितंबर का खंडित फैसला मामले को एक नई न्यायिक दिशा में ले गया है।एक ओर जस्टिस दत्ता की राय है, दूसरी ओर जस्टिस शर्मा का दृष्टिकोण।अब फैसले को वापस लेने की मांग वाली याचिका मुख्य न्यायाधीश के सामने है।

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने फिलहाल केवल इतना कहा है—“हम इस पर विचार करेंगे और फैसला लेंगे।

”अब देखना होगा कि अदालत इस याचिका पर क्या रुख अपनाती है और क्या मामला बड़ी संविधान पीठ के सामने पहुंचता है।क्योंकि अगर ऐसा होता है तो फिर बहस केवल यह नहीं होगी कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कौन करेगा।

बहस इससे कहीं बड़ी होगी—क्या भारत के चुनावी लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता उसकी नियुक्ति प्रक्रिया से ही शुरू होनी चाहिए?

यही वह सवाल है, जिसका जवाब आने वाले समय में भारतीय चुनावी व्यवस्था की दिशा तय कर सकता है।

बी. के. झा, NSK

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