बी. के. झा
NSK news India

पटना , 11 अक्टूबर
राजनीति में गठबंधन केवल विचारधारा के सहारे नहीं चलते; उसमें सत्ता का गणित, जनाधार की मजबूती, भविष्य की संभावनाएं और समय के साथ बदलते राजनीतिक समीकरण भी अहम भूमिका निभाते हैं। बिहार की राजनीति में केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के संस्थापक जीतन राम मांझी की हालिया राजनीतिक गतिविधियां इसी नजरिये से चर्चा में हैं।
दोनों राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सहयोगी हैं, लेकिन कई मुद्दों पर उनकी अपनी राजनीतिक शैली और अलग प्राथमिकताएं दिखाई देती हैं।
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन से पहले परिवहन प्रतिबंधों पर चिराग पासवान का बयान, NEET-UG विवाद के बाद तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और किसान आंदोलन के दौरान केंद्र सरकार का कृषि कानून वापस लेने का फैसला—इन घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या बड़े जनआंदोलन सरकारों की राजनीतिक रणनीति बदलने की क्षमता रखते हैं?
इसी पृष्ठभूमि में सवाल उठता है कि क्या चिराग और मांझी केवल अपनी राजनीतिक राय रख रहे हैं, या फिर वे अपने-अपने जनाधार को मजबूत करते हुए भविष्य के लिए अतिरिक्त राजनीतिक विकल्प भी तैयार कर रहे हैं?
फिलहाल किसी संभावित गठबंधन परिवर्तन की आधिकारिक घोषणा नहीं है, लेकिन सहयोगी दलों की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को लेकर चर्चा जरूर तेज है।
CJP आंदोलन पर चिराग का अलग सुर: सहयोगी होकर भी असहमति क्यों?
10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित CJP प्रदर्शन से पहले रेलवे ने कुछ ट्रेनों को रद्द और कुछ को पुनर्निर्धारित किया था। अधिकारियों की ओर से यातायात और संभावित भीड़ से जुड़ी व्यवस्थाओं की बात सामने आई, जबकि प्रदर्शनकारियों और उनके समर्थकों ने इन कदमों को आंदोलन में बाधा डालने वाला बताया।
इसी बीच केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने युवाओं को रोकने के लिए परिवहन साधनों पर पाबंदियां लगाने के विचार पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं को रोका नहीं जा सकता और ट्रेनें या सड़कें रोकने से उनकी आवाज समाप्त नहीं होगी। हालांकि, चिराग ने विपक्ष की राजनीतिक भूमिका पर भी सवाल उठाए और प्रदर्शन के मुद्दे पर संवाद की जरूरत जताई।
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चिराग केवल विपक्षी दल के नेता नहीं, बल्कि केंद्र की NDA सरकार में मंत्री और भाजपा के सहयोगी हैं। ऐसे में उनके बयान को दो स्तरों पर पढ़ा जा सकता है।
पहला, युवाओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखना;
दूसरा, यह संदेश देना कि गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद वह हर सरकारी कदम का बिना सवाल समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं हैं। लेकिन यहां एक अंतर समझना जरूरी है। सरकार के किसी फैसले की आलोचना करना अपने-आप में गठबंधन से दूरी बनाने का प्रमाण नहीं है।
लोकतांत्रिक गठबंधन में सहयोगी दलों का स्वतंत्र मत रखना असामान्य नहीं है।
चिराग की राजनीति के लिए असली चुनौती यही है कि वह केंद्र में अपनी भागीदारी और युवाओं के बीच अपनी छवि के बीच संतुलन कैसे कायम रखते हैं।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: जनदबाव के आगे सरकार को बदलना पड़ा फैसला
25 जुलाई 2026 को NEET-UG परीक्षा में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं से जुड़े विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। यह घटनाक्रम छात्रों के प्रदर्शन, परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों और लगातार बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच सामने आया। इस संकट ने राष्ट्रीय परीक्षा प्रणाली और उसकी निगरानी करने वाली संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी। यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए: किसी मंत्री का इस्तीफा केवल विरोध प्रदर्शन के कारण हुआ, ऐसा निष्कर्ष निकालना तभी उचित होगा जब घटनाक्रम और निर्णय के बीच संबंध आधिकारिक रूप से स्थापित हो।
फिर भी, व्यापक जनअसंतोष और छात्र आंदोलन ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया था।राजनीतिक दृष्टि से यह घटना बताती है कि शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे मुद्दों पर सरकार की विश्वसनीयता सीधे युवाओं के भरोसे से जुड़ी है। यदि परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं और युवाओं को जवाब नहीं मिलता, तो प्रशासनिक विवाद जल्द ही राजनीतिक संकट का रूप ले सकता है।
विपक्ष के लिए भी ऐसे मुद्दे सरकार को घेरने का अवसर बनते हैं। लेकिन अंततः सरकार की जवाबदेही केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से पूरी नहीं होती; पारदर्शी जांच, जिम्मेदारी तय करने और परीक्षा व्यवस्था में सुधार से ही जनता का भरोसा बहाल हो सकता है।
किसान आंदोलन: केंद्र के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सबक
केंद्र सरकार और जनआंदोलन के रिश्तों की चर्चा 2020-21 के किसान आंदोलन के बिना अधूरी है। तीन कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर लंबा आंदोलन किया। किसानों के एक बड़े वर्ग को आशंका थी कि नए कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था और कृषि बाजार में उनकी स्थिति कमजोर हो सकती है।करीब एक साल तक चले आंदोलन के बाद 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। बाद में संसद ने उन्हें निरस्त कर दिया।
यह घटनाक्रम केंद्र सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। इससे स्पष्ट हुआ कि लंबे समय तक चलने वाले जनआंदोलन, व्यापक सामाजिक समर्थन और चुनावी प्रभाव की आशंका सरकार के निर्णयों को बदलने की क्षमता रखते हैं।
हालांकि, किसान आंदोलन और CJP प्रदर्शन की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। दोनों के मुद्दे, सामाजिक आधार और राजनीतिक संदर्भ अलग हैं। इसलिए एक आंदोलन के परिणाम को दूसरे आंदोलन के संभावित परिणाम का निश्चित संकेत मानना सही नहीं होगा। लेकिन दोनों घटनाएं यह जरूर दिखाती हैं कि लोकतंत्र में जनविश्वास और संवाद को नजरअंदाज करने की राजनीतिक कीमत हो सकती है।
भाजपा के सहयोगी क्यों रखते हैं अपनी अलग आवाज?
NDA की राजनीति में सहयोगी दलों की ताकत केवल लोकसभा या विधानसभा में उनकी सीटों की संख्या से तय नहीं होती। उनका अपना सामाजिक आधार, क्षेत्रीय प्रभाव, संगठनात्मक क्षमता और भविष्य में चुनावी समीकरण बदलने की संभावना भी उन्हें महत्व देती है।बिहार में चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की राजनीतिक भूमिका इसी संदर्भ में देखी जा सकती है।
चिराग का आधार मुख्यतः पासवान समुदाय और युवा मतदाताओं के बीच अपनी पहचान मजबूत करने की कोशिश से जुड़ा है।
मांझी की राजनीति में महादलित समुदाय, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के सवाल महत्वपूर्ण रहे हैं। दोनों नेताओं के सामने एक समान चुनौती है: केंद्र में सत्ता की भागीदारी बनाए रखते हुए अपने स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व को भी मजबूत करना। यदि वे हर मुद्दे पर भाजपा के रुख को दोहराते हैं, तो उनकी अलग पहचान कमजोर पड़ सकती है।
दूसरी ओर, जरूरत से ज्यादा टकराव गठबंधन के भीतर उनके राजनीतिक प्रभाव और सत्ता में भागीदारी को प्रभावित कर सकता है।यही कारण है कि सहयोगी दल कभी केंद्र की नीति का समर्थन करते हैं, कभी उसमें सुधार की मांग करते हैं और कभी अपने मतदाताओं से जुड़े मुद्दों पर अलग बयान देते हैं। इसे राजनीतिक मोलभाव की रणनीति कहा जा सकता है, लेकिन किसी खास नेता के इरादे को प्रमाण के बिना निश्चित रूप से घोषित नहीं किया जा सकता।
मांझी की टिप्पणी और चिराग की नसीहत: युवाओं के मुद्दे पर मतभेद?
CJP आंदोलन से जुड़े विवाद के बीच जीतन राम मांझी की ओर से युवाओं के लिए ‘तिलचट्टा’ शब्द के इस्तेमाल की खबर पर चिराग पासवान ने असहमति जताई। चिराग ने कहा कि युवाओं को इस तरह संबोधित करना उचित नहीं है। इस घटनाक्रम ने दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक भाषा और युवा मतदाताओं को लेकर दृष्टिकोण का अंतर सामने ला दिया। चिराग के लिए युवाओं की आकांक्षाओं और सम्मान की बात करना उनकी सार्वजनिक छवि से मेल खाता है।
वहीं मांझी की टिप्पणी पर उठे सवाल यह दिखाते हैं कि राजनीतिक नेताओं की भाषा उनके संदेश से अलग होकर भी बहस का विषय बन सकती है।हालांकि, एक बयान के आधार पर दोनों दलों के बीच गंभीर राजनीतिक टकराव या NDA से अलग होने की योजना का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। यह मतभेद व्यक्तिगत बयान, राजनीतिक परिस्थितियों या अपने-अपने समर्थक वर्गों को संदेश देने की कोशिश का परिणाम भी हो सकता है।
क्या चिराग बन रहे हैं ‘राजनीतिक मौसम विज्ञानी’?
भारतीय राजनीति में ‘राजनीतिक मौसम विज्ञानी’ का विशेषण उन नेताओं के लिए इस्तेमाल होता रहा है, जो सत्ता के बदलते समीकरणों का अनुमान लगाकर समय रहते अपनी रणनीति बदलने में माहिर माने जाते हैं। चिराग पासवान के हालिया बयानों के बाद यह सवाल फिर उठ सकता है कि क्या वह अपने पिता रामविलास पासवान की तरह राजनीतिक परिस्थितियों को भांपकर कई विकल्प खुले रखना चाहते हैं?
रामविलास पासवान की राजनीति का इतिहास विभिन्न गठबंधनों में भागीदारी और बदलते समीकरणों के साथ तालमेल का रहा है। चिराग की राजनीति पर भी इस विरासत का प्रभाव देखा जाता है। लेकिन उनके मौजूदा बयानों को किसी भावी गठबंधन परिवर्तन की पक्की तैयारी बताने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।
एक राजनीतिक विश्लेषण के तौर पर कहा जा सकता है कि चिराग अपनी पहचान को केवल भाजपा के सहयोगी तक सीमित नहीं रखना चाहते होंगे। युवाओं के सवालों पर स्वतंत्र रुख अपनाना उनकी राजनीतिक उपयोगिता बढ़ा सकता है। दूसरी ओर, NDA में बने रहना उन्हें केंद्र की सत्ता और प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी भी देता है। इसलिए उनके लिए सबसे व्यावहारिक रास्ता फिलहाल गठबंधन के भीतर रहते हुए अपनी अलग आवाज बनाए रखना हो सकता है।
मांझी के लिए भी सामाजिक आधार को मजबूत रखना और केंद्र तथा बिहार सरकार में अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखना अहम है। मगर दोनों नेताओं की रणनीतियों को एक ही योजना का हिस्सा मानना उचित नहीं होगा।
शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों की नजर में युवाओं का सवाल
छात्र आंदोलनों, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं की राजनीतिक भागीदारी पर व्यापक सामाजिक बहस का केंद्र केवल सत्ता पक्ष या विपक्ष नहीं है। शिक्षाविदों के लिए परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता, छात्रों को समय पर जानकारी और निष्पक्ष अवसर देना महत्वपूर्ण है।
सामाजिक संगठनों के लिए शांतिपूर्ण विरोध, सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता और युवाओं के सम्मान की रक्षा अहम मुद्दे हैं।इन मुद्दों पर विभिन्न संगठनों और विशेषज्ञों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं। हालांकि, इस विशिष्ट राजनीतिक घटनाक्रम पर किसी शिक्षाविद, सामाजिक संस्था या विपक्षी नेता की ओर से कोई अतिरिक्त सत्यापित बयान उपलब्ध न होने के कारण उनके नाम से टिप्पणी देना उचित नहीं होगा।फिर भी, राजनीतिक रूप से एक बात स्पष्ट है: जब रोजगार, परीक्षा, मतदाता सूची या सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़े सवाल उठते हैं, तो युवा केवल राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि ठोस समाधान भी चाहते हैं।
जो दल इन चिंताओं को विश्वसनीय ढंग से उठाएगा, उसे राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना हो सकती है। लेकिन यह लाभ स्थायी तभी होगा, जब बयान के साथ नीतिगत स्पष्टता और जवाबदेही भी दिखाई दे।
बिहार की राजनीति में इसका क्या असर पड़ सकता है?
बिहार में NDA की राजनीति कई सहयोगी दलों और अलग-अलग सामाजिक आधारों पर टिकी है। यहां किसी भी दल की रणनीति केवल दिल्ली के राजनीतिक घटनाक्रम से तय नहीं होती; राज्य की सत्ता, स्थानीय नेतृत्व, जातीय-सामाजिक समीकरण और आगामी चुनावी जरूरतें भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
चिराग पासवान और मांझी यदि अपने-अपने मुद्दों पर स्वतंत्र रुख रखते हैं, तो इससे गठबंधन के भीतर बातचीत और मोलभाव की गुंजाइश बढ़ सकती है। लेकिन यह तभी गठबंधन के लिए चुनौती बनेगा, जब असहमति किसी ठोस नीतिगत टकराव, सीटों के बंटवारे, नेतृत्व या सरकार में हिस्सेदारी के सवाल पर खुली लड़ाई में बदल जाए।
बिहार में चिराग के विधायक और कार्यकर्ताओं पर जमीन कब्जा, रंगदारी से जुड़े विवादों को लेकर भी समय-समय पर राजनीतिक आरोप लगाए जाते रहे हैं। क्या वह भी एक कारण है। लेकिन स्थानीय विवादों को व्यापक गठबंधन राजनीति का कारण बताने के लिए अलग से प्रमाण जरूरी हैं।
निष्कर्ष:
अलग रास्ता या गठबंधन के भीतर दबाव की राजनीति?
चिराग पासवान का युवाओं के पक्ष में बयान और मांझी की टिप्पणी पर असहमति NDA के भीतर अलग-अलग राजनीतिक शैलियों को सामने लाती है।
NEET विवाद के बाद शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और किसान आंदोलन के दौरान कृषि कानूनों की वापसी यह भी याद दिलाते हैं कि जनआंदोलन सरकारों पर दबाव बना सकते हैं। लेकिन इन घटनाओं से यह साबित नहीं होता कि केंद्र सरकार कमजोर हो चुकी है या उसके सहयोगी दल निश्चित रूप से अलग होने जा रहे हैं।
असली सवाल यह है कि क्या चिराग और मांझी अपने स्वतंत्र जनाधार को मजबूत करने के लिए गठबंधन के भीतर अपनी आवाज अधिक बुलंद कर रहे हैं?
इसका जवाब आने वाले समय में उनके बयानों से ज्यादा उनके फैसलों, संसदीय रुख, संगठनात्मक गतिविधियों और चुनावी रणनीति से मिलेगा।राजनीति में हर असहमति बगावत नहीं होती और हर समर्थन स्थायी वफादारी का प्रमाण नहीं होता।
कई बार सहयोगी दल गठबंधन में रहते हुए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करते हैं, ताकि भविष्य में बदलते समीकरणों के बीच उनके पास विकल्प और मोलभाव की ताकत बनी रहे।
फिलहाल चिराग और मांझी के अलग सुर को NDA से विदाई का ऐलान नहीं, बल्कि अपनी-अपनी राजनीतिक पहचान और प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखना अधिक तथ्यसम्मत होगा।
गठबंधन की असली परीक्षा तब होगी, जब यह स्वतंत्र आवाज किसी बड़े नीतिगत या चुनावी फैसले पर आमने-सामने की चुनौती बन जाए।
बी. के. झा, एन एस के
