बी.के. झा, एनएसके विशेष रिपोर्ट
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कोलकाता, 18 अक्टूबर
दुर्गा पूजा के उल्लास से गूंज रही कोलकाता की गलियां अचानक चीख-पुकार और मातम से भर गईं। बारिश से बचने के लिए पंडाल की ओर बढ़ते श्रद्धालुओं की भीड़ देखते ही देखते जानलेवा भगदड़ में बदल गई। किसी ने अपने परिजन को खोया, तो कोई अपनों की तलाश में अस्पतालों के चक्कर लगाता रहा। इस त्रासदी में 19 लोगों की मौत और 25 लोगों के घायल होने की खबर सामने आई है। हादसे के बाद अब प्रशासन ने कानून-व्यवस्था को लेकर सख्ती बढ़ा दी है।
कोलकाता पुलिस कमिश्नर अजय नंद ने शहर के बहुबाजार थाना क्षेत्र के निर्धारित हिस्से में 18 से 20 अक्टूबर 2026 तक भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की है। इस दौरान पांच या उससे अधिक लोगों के गैरकानूनी जमावड़े, रैली, धरना-प्रदर्शन, लाठी या खतरनाक हथियार लेकर चलने और सार्वजनिक शांति भंग करने वाली गतिविधियों पर रोक रहेगी। पुलिस का उद्देश्य संभावित तनाव और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को नियंत्रित करना है। लेकिन इस हादसे की सबसे मार्मिक तस्वीर उस बेटे की आपबीती में सामने आती है, जिसने अपनी मां को आंखों के सामने दम तोड़ते देखा। उसका दर्द केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि भीड़ प्रबंधन और आपातकालीन सुरक्षा व्यवस्था पर उठता बड़ा सवाल भी है।
बहुबाजार में तीन दिन तक निषेधाज्ञा, किन गतिविधियों पर रहेगी रोक?
कोलकाता पुलिस के आदेश के मुताबिक, पाबंदियां बहुबाजार थाना क्षेत्र के उस हिस्से में लागू की गई हैं, जो कॉलेज स्ट्रीट, सीआर एवेन्यू, कोलूटोला स्ट्रीट और ईडन हॉस्पिटल रोड से घिरा है।निर्धारित अवधि के दौरान पांच या उससे अधिक लोगों के गैरकानूनी रूप से एकत्र होने, रैली निकालने, धरना-प्रदर्शन करने, लाठी या खतरनाक हथियार लेकर चलने तथा सार्वजनिक शांति और व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर रोक रहेगी।
पुलिस को आशंका है कि कुछ संगठनों की गतिविधियों से तनाव पैदा हो सकता है और कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। हालांकि, किसी विशेष संगठन की ओर से हिंसा की योजना या किसी संभावित प्रदर्शन के बारे में ठोस निष्कर्ष जांच और आधिकारिक जानकारी के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू करना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि हिंसा होने वाली है। यह संभावित खतरे को रोकने के लिए उठाया जाने वाला एहतियाती कदम है। साथ ही, आदेश की वास्तविक शर्तों और लागू क्षेत्र के अनुसार ही पाबंदियों को समझा जाना चाहिए।
चोरबागान पंडाल में कैसे मची भगदड़?
कोलकाता के चोरबागान स्थित सामुदायिक दुर्गा पूजा पंडाल में शनिवार, 17 अक्टूबर की शाम करीब 7:30 से 7:40 बजे के बीच अफरातफरी मच गई। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, तेज बारिश के बीच पंडाल के बाहर मौजूद श्रद्धालु आश्रय पाने के लिए अंदर की ओर बढ़ने लगे। इसी दौरान भीड़ का दबाव बढ़ गया और स्थिति बेकाबू हो गई।बताया गया है कि पंडाल में भीड़ के अचानक बढ़ने, संकरे रास्तों और लोगों की आवाजाही में अव्यवस्था के कारण भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हुई। हादसे के बाद जूते-चप्पल, बैग और अन्य सामान घटनास्थल पर बिखरे मिले। घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया और प्रशासन ने पंडाल में लोगों की आवाजाही रोक दी।
प्रारंभिक जानकारी में पूजा आयोजकों की ओर से लाउडस्पीकर पर की गई घोषणा के बाद भीड़ बढ़ने की बात भी सामने आई है। हालांकि, घोषणा की प्रकृति, भीड़ के दबाव और सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक भूमिका की पुष्टि जांच के निष्कर्षों से ही होगी।
इस घटना ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—जब बड़े पंडाल में हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना थी, तो बारिश के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने और लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी?
‘मैंने अपनी मां को आंखों के सामने मरते देखा’, बेटे की आपबीती
इस हादसे की भयावहता का अंदाजा 25 वर्षीय सोनू पाल की आपबीती से लगाया जा सकता है। कुमारटुली निवासी सोनू अपनी मां के साथ दुर्गा पूजा देखने गए थे। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि पूजा का वह सफर उनके जीवन की सबसे दर्दनाक याद बन जाएगा।सोनू के मुताबिक, जब बाहर तेज बारिश होने लगी तो लोग भीगने से बचने के लिए पंडाल के भीतर जाने की कोशिश करने लगे। प्रवेश द्वार पर भीड़ बढ़ती गई और धक्का-मुक्की तेज हो गई। कुछ ही देर में भीड़ का दबाव इतना बढ़ गया कि लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगे।
सोनू ने उस भयावह पल को याद करते हुए कहा, “मैंने अपनी मां को आंखों के सामने मरते देखा। शायद मैं भी जिंदा नहीं बच पाता। ”उन्होंने बताया कि वह खुद भी भीड़ के नीचे दब गए थे। किसी तरह खुद को संभालने के बाद जब वह अपनी मां के पास पहुंचे, तो वह वहां नहीं थीं। बाद में उन्हें पता चला कि उनकी मां की मौत हो गई है।एक बेटे के लिए मां को इस तरह खोने का दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
सोनू की कहानी उन तमाम परिवारों की पीड़ा को सामने लाती है, जिनके लिए धार्मिक उत्सव की खुशी अचानक जीवनभर के शोक में बदल गई।यह आपबीती केवल भावनात्मक पहलू नहीं दिखाती, बल्कि भीड़ के दबाव में पैदा होने वाले खतरे की ओर भी ध्यान दिलाती है।
जब प्रवेश द्वार पर लोग एक साथ आगे बढ़ते हैं और बाहर निकलने के रास्ते बाधित होते हैं, तो कुछ ही मिनटों में स्थिति जानलेवा बन सकती है।
आयोजकों समेत सात गिरफ्तार, गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज
हादसे के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए गैर इरादतन हत्या से संबंधित मामला दर्ज किया है। घटना के सिलसिले में 14 लोगों को हिरासत में लिए जाने और पूजा आयोजकों समेत सात लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है। अब जांच में यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि पंडाल में प्रवेश और निकास के लिए पर्याप्त रास्ते थे या नहीं, भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कितने पुलिसकर्मी और स्वयंसेवक तैनात थे तथा बारिश की स्थिति में कोई वैकल्पिक योजना लागू की गई थी या नहीं।इसके अलावा, लाउडस्पीकर पर की गई कथित घोषणा की भूमिका, सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और आयोजन की सुरक्षा योजना की भी पड़ताल जरूरी है।
हालांकि, गिरफ्तारी या प्राथमिकी में किसी का नाम आना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने जताया दुख, जांच के जरिए जिम्मेदारी तय करने की बात
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अस्पताल पहुंचकर हादसे के पीड़ितों और घायलों की स्थिति की जानकारी ली। उन्होंने घटना पर दुख जताते हुए जांच कराने की बात कही। शुरुआती जानकारी में आयोजकों की घोषणा के बाद अचानक भीड़ बढ़ने को हादसे से जोड़कर देखा गया है।सरकार और पुलिस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती केवल तत्काल राहत और जांच तक सीमित नहीं है। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि दूसरे पंडालों में ऐसी स्थिति दोबारा न पैदा हो। भीड़ की क्षमता से अधिक लोगों को प्रवेश देने, निकास मार्गों को बाधित होने देने या आपातकालीन व्यवस्था में कमी जैसी संभावित खामियों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
हादसे ने उठाए पांच बड़े सवाल
कोलकाता की इस त्रासदी के बाद धार्मिक आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर मंथन की जरूरत है। जांच में खास तौर पर इन सवालों के जवाब तलाशे जाने चाहिए:
1. भीड़ का आकलन: क्या आयोजकों और प्रशासन ने संभावित श्रद्धालुओं की संख्या के अनुरूप सुरक्षा योजना बनाई थी?
2. प्रवेश और निकास: क्या पंडाल में लोगों के आने-जाने के लिए पर्याप्त और सुरक्षित रास्ते उपलब्ध थे?
3. बारिश के दौरान इंतजाम: मौसम बिगड़ने पर भीड़ को नियंत्रित करने की कोई वैकल्पिक योजना थी या नहीं?
4. पुलिस और स्वयंसेवकों की तैनाती: क्या भीड़ के दबाव को समय रहते पहचानने और नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त लोग मौजूद थे?
5. जवाबदेही: क्या सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन हुआ और यदि कोई लापरवाही सामने आती है, तो उसके लिए जिम्मेदारी किसकी होगी?
इन सवालों का जवाब केवल दोष तय करने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए भी जरूरी है।
निष्कर्ष:
धारा 163 से कानून-व्यवस्था संभलेगी, लेकिन सुरक्षा की कमियां भी दूर करनी होंगी
बहुबाजार में तीन दिन की निषेधाज्ञा लागू करना प्रशासन का एहतियाती कदम है। इससे संभावित जमावड़े और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। लेकिन चोरबागान की भगदड़ ने जिस बड़ी चुनौती को सामने रखा है, उसका समाधान केवल निषेधाज्ञा से नहीं होगा।भीड़ प्रबंधन, सुरक्षित प्रवेश-निकास, प्रशिक्षित स्वयंसेवक, प्रभावी पुलिस निगरानी और आपातकालीन चिकित्सा सहायता—इन सभी व्यवस्थाओं को एक साथ मजबूत करना होगा।
सोनू पाल की आपबीती प्रशासन और आयोजन समितियों के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
किसी भी उत्सव की सफलता का पैमाना केवल श्रद्धालुओं की संख्या, भव्य सजावट या लोकप्रियता नहीं हो सकता।
असली कसौटी यह है कि हर श्रद्धालु सुरक्षित घर लौटे।
आस्था के नाम पर जुटी भीड़ को सुरक्षा देना प्रशासन की जिम्मेदारी है और सुरक्षा के नियमों का पालन करना आयोजकों का दायित्व। इन दोनों में चूक की कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर नहीं चुकानी चाहिए।
