बी के झा, एन एस के – अंतरराष्ट्रीय डेस्क
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पेरिस / नई दिल्ली, 21 अक्टूबर
फ्रांस में पिछले सप्ताह हुई हिंसा ने सरकार की कानून-व्यवस्था संबंधी तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पेरिस समेत देश के कई प्रमुख शहरों में हुई तोड़फोड़, लूटपाट और हिंसक घटनाओं के बाद अब सरकार शनिवार को होने वाले संभावित प्रदर्शनों से निपटने के लिए सुरक्षा का अभेद्य घेरा तैयार करने में जुट गई है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पुलिस के साथ सैनिकों की तैनाती की भी तैयारी की जा रही है।
सरकार का उद्देश्य साफ है— सड़कों पर हिंसा दोबारा न भड़के और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों पर प्रभावी कार्रवाई की जा सके। फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने मंगलवार को कहा कि शनिवार को सुरक्षा बलों की तैनाती बड़े पैमाने पर होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंसा के बाद देश में व्यवस्था बहाल करना सरकार की पहली प्राथमिकता है।
सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, वहीं दूसरी ओर संभावित प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और अराजकता को रोकना है।
पेरिस से मार्सिले तक हिंसा, अब सरकार ने कसी कमर
पिछले सप्ताह 17 अक्टूबर को पेरिस, मार्सिले, लियोन और फ्रांस के दूसरे शहरों में हिंसा, तोड़फोड़ तथा लूटपाट की घटनाएं सामने आई थीं। इन घटनाओं ने देश की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी। सार्वजनिक स्थानों पर हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाए जाने के बाद सरकार पर कानून-व्यवस्था को प्रभावी ढंग से संभालने का दबाव बढ़ गया है।अब शनिवार को फिर से बड़े प्रदर्शनों की आशंका के बीच प्रशासन किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। पुलिस बल की तैनाती बढ़ाने के साथ सैनिकों की सहायता लेने की तैयारी भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
हालांकि, सैनिकों की तैनाती का वास्तविक दायरा, उनकी जिम्मेदारियां और उन्हें दिए जाने वाले अधिकारों का विवरण आधिकारिक घोषणा के आधार पर ही स्पष्ट होगा। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुरक्षा बल संभावित हिंसा को रोकने के लिए किस तरह की रणनीति अपनाते हैं।
‘हिंसा या गणराज्य’: प्रधानमंत्री ने खींच दी सख्त लकीर
प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने मौजूदा संकट को ‘हिंसा और गणराज्य’ के बीच चुनाव के तौर पर पेश किया है। उन्होंने हिंसा के लिए अति-वामपंथी समूहों को जिम्मेदार ठहराया है।सरकार का रुख स्पष्ट है कि विरोध-प्रदर्शन के नाम पर हिंसा, लूटपाट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी है।जिन समूहों पर सरकार ने आरोप लगाए हैं, उन्होंने इन आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि सरकार महंगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत और सार्वजनिक सेवाओं में गिरावट को लेकर जनता में पनप रहे असंतोष को कम करके आंक रही है।
यही इस संकट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। सरकार जहां कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है, वहीं उसके आलोचक आर्थिक परेशानियों और सामाजिक असंतोष को मौजूदा तनाव की प्रमुख वजह बता रहे हैं।सवाल यह है कि क्या केवल सुरक्षा बलों की तैनाती से हालात संभल जाएंगे, या सरकार को उन शिकायतों पर भी ध्यान देना होगा जो लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित कर रही हैं?
पुलिस के साथ सेना की तैनाती, क्या है सरकार की रणनीति?
फ्रांस सरकार का शनिवार के लिए बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों की तैनाती का फैसला बताता है कि प्रशासन संभावित हिंसा को लेकर गंभीर है। पुलिस के साथ सैनिकों की मौजूदगी का उद्देश्य महत्वपूर्ण स्थानों की सुरक्षा में सहायता करना और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में प्रशासन को अतिरिक्त समर्थन देना हो सकता है।
हालांकि, सेना की तैनाती का अर्थ अपने आप में यह नहीं है कि पुलिस की जगह सेना कानून-व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी संभाल लेगी। सैनिकों की भूमिका और अधिकार संबंधित सरकारी आदेशों तथा लागू कानूनों पर निर्भर करेंगे।फ्रांस जैसे लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का महत्वपूर्ण अधिकार है।
दूसरी ओर, हिंसा, आगजनी और लूटपाट से निपटना सरकार की जिम्मेदारी है। चुनौती इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने की है, ताकि उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की भी रक्षा की जा सके।
राष्ट्रपति चुनाव से पहले बढ़ता राजनीतिक तनाव
फ्रांस में हिंसा की घटनाएं ऐसे समय में सामने आई हैं, जब देश का राजनीतिक माहौल पहले से ही तनावपूर्ण बताया जा रहा है। चुनावी राजनीति में दक्षिणपंथी और कट्टर वामपंथी विचारधाराओं वाले उम्मीदवारों को मिल रहे समर्थन ने राजनीतिक बहस को और तीखा बना दिया है।आर्थिक दबाव, महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति और सरकार की नीतियां राजनीतिक विमर्श के महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं। ऐसे माहौल में हिंसक घटनाएं सरकार की कार्यशैली और उसकी लोकप्रियता को लेकर बहस तेज कर सकती हैं।
हालांकि, किसी एक सप्ताह की हिंसा के आधार पर पूरे देश की राजनीतिक दिशा का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। इसके लिए चुनावी सर्वेक्षणों, जनमत और राजनीतिक घटनाक्रम का व्यापक आकलन जरूरी है।शनिवार के प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि उनसे यह संकेत मिल सकता है कि मौजूदा तनाव कितना व्यापक है और सरकार की सुरक्षा रणनीति हालात को संभालने में कितनी प्रभावी साबित होती है।
शनिवार पर टिकी निगाहें, सरकार के सामने बड़ी परीक्षा
फ्रांस में अब सबकी निगाहें शनिवार पर टिकी हैं। सरकार बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों की तैनाती करके यह सुनिश्चित करना चाहती है कि पिछले सप्ताह जैसी हिंसा दोबारा न हो। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारी समूहों का रुख और विरोध के दौरान सामने आने वाली परिस्थितियां भी तय करेंगी कि प्रशासन के सामने चुनौती कितनी बड़ी होगी।यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहते हैं, तो यह तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक संकेत होगा। लेकिन यदि हिंसा दोबारा भड़कती है, तो सरकार की सुरक्षा नीति, पुलिस की तैयारी और राजनीतिक नेतृत्व की रणनीति पर सवाल और गहरे हो सकते हैं।
एन एस के विश्लेषण
फ्रांस की मौजूदा स्थिति एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है—
क्या किसी लोकतंत्र में शांति केवल सख्त सुरक्षा व्यवस्था से कायम की जा सकती है, या इसके लिए जनता के असंतोष को समझना भी जरूरी है?
हिंसा और लूटपाट किसी भी समस्या का समाधान नहीं हैं। कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध को हिंसा के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
सरकार के लिए असली परीक्षा यही है कि वह सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के साथ नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की भी रक्षा करे।शनिवार को पुलिस के साथ सैनिकों की तैनाती फ्रांस सरकार की सुरक्षा तैयारियों का बड़ा संकेत है।
अब देखना यह होगा कि यह रणनीति देश में शांति बहाल करने में कितनी सफल होती है और क्या सरकार सुरक्षा संबंधी कदमों के साथ आर्थिक तथा सामाजिक असंतोष को दूर करने की दिशा में भी आगे बढ़ती है।
एन एस के की नजर शनिवार के घटनाक्रम पर बनी रहेगी।
