जेल में लॉरेंस बिश्नोई, विदेश में बैठे हैंडलर और सड़कों पर शूटर! एन्क्रिप्टेड संचार और जबरन वसूली के आरोपों ने सुरक्षा एजेंसियों की चुनौती बढ़ाई। क्या दाऊद की ‘डी-कंपनी’ की तर्ज पर चल रहा है नया अंडरवर्ल्ड नेटवर्क?

बी के झा, एनएसके – विशेष रिपोर्ट

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नई दिल्ली/ मुंबई, 20 अक्टूबर

एक तरफ गुजरात की साबरमती सेंट्रल जेल की हाई-सिक्योरिटी बैरक में बंद गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई, दूसरी तरफ विदेशों में बैठे उसके कथित सहयोगी और तीसरी तरफ देश के अलग-अलग शहरों में वारदात को अंजाम देने वाले स्थानीय शूटर। अगर जांच एजेंसियों के सामने आए आरोप और नेटवर्क की संरचना सही साबित होते हैं, तो यह तस्वीर केवल एक गैंगस्टर की आपराधिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि संगठित अपराध के उस बदलते स्वरूप की ओर इशारा करती है, जिसमें जेल की सलाखें, अंतरराष्ट्रीय सीमाएं और हजारों किलोमीटर की दूरी भी कथित आपराधिक नेटवर्क के लिए बाधा नहीं बनतीं।

मुंबई में अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर हुई गोलीबारी के बाद लॉरेंस बिश्नोई गैंग का विदेशी नेटवर्क एक बार फिर चर्चा में है। इस हमले की जिम्मेदारी लेने के दावे सोशल मीडिया पर सामने आए हैं। इनमें अमेरिका में मौजूद बताए जा रहे अनिल पंडित का नाम भी शामिल है। हालांकि, सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति या संगठन द्वारा जिम्मेदारी लेने भर से उसकी भूमिका कानूनी रूप से साबित नहीं हो जाती। इस मामले में वास्तविक भूमिका, हमले की वजह और कथित साजिश की पुष्टि जांच के निष्कर्षों से ही होगी।

फिर भी, इस प्रकरण ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है: क्या भारत में सक्रिय कुछ संगठित आपराधिक गिरोह अब ऐसे अंतरराष्ट्रीय मॉडल पर काम कर रहे हैं, जिसकी तुलना कभी मुंबई अंडरवर्ल्ड के दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क यानी ‘डी-कंपनी’ से की जाती थी?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए लॉरेंस बिश्नोई सिंडिकेट के कथित ढांचे, विदेश में बैठे हैंडलरों, स्थानीय शूटरों, वित्तीय लेन-देन और सोशल मीडिया के जरिए भय पैदा करने की रणनीति को समझना जरूरी है।कैसे काम करता है यह कथित नेटवर्क?

जेल से लेकर विदेश तक फैली जिम्मेदारियों की कड़ी

संगठित अपराध के पारंपरिक मॉडल में गैंगस्टर अपने स्थानीय संपर्कों और प्रत्यक्ष सहयोगियों के सहारे वारदातों को अंजाम देते थे। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय आपराधिक गिरोहों के मामले में तस्वीर कहीं अधिक जटिल हो सकती है। अलग-अलग देशों में मौजूद सहयोगी, स्थानीय स्तर पर अपराध करने वाले लोग और पैसे की व्यवस्था करने वाले कथित सदस्य एक-दूसरे से अलग भूमिकाओं में काम कर सकते हैं।जांच एजेंसियों के आरोपों के मुताबिक, लॉरेंस बिश्नोई से जुड़े नेटवर्क में भी इसी तरह की बहुस्तरीय संरचना होने का संदेह है।

इस ढांचे में तीन प्रमुख स्तरों की चर्चा सामने आती है।

पहला स्तर—विदेश में मौजूद कथित हैंडलर:

ऐसे लोगों पर आरोप है कि वे धमकियों, जबरन वसूली और आपराधिक गतिविधियों से जुड़े संपर्कों में भूमिका निभाते हैं। विदेश में मौजूद होने के कारण उनकी पहचान, स्थान और स्थानीय अपराधियों से संबंधों की जांच में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।

दूसरा स्तर—स्थानीय संपर्क और कथित सहयोगी:

ये वे लोग हो सकते हैं जो किसी शहर या क्षेत्र में संपर्क स्थापित करने, संदिग्ध गतिविधियों में सहयोग देने अथवा दूसरे लोगों को गिरोह से जोड़ने के आरोपों का सामना करते हैं।

तीसरा स्तर—वारदात में कथित रूप से शामिल लोग:

जांच में ऐसे व्यक्तियों की भूमिका सामने आ सकती है, जिन पर गोलीबारी, धमकी या अन्य आपराधिक घटनाओं में सीधे शामिल होने का आरोप हो।हालांकि, इस तरह के ढांचे का उल्लेख करने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका या पूरे नेटवर्क की संरचना अदालत में सिद्ध हो चुकी है। प्रत्येक आरोपी के विरुद्ध आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों का अलग-अलग मूल्यांकन जरूरी है।इस मॉडल की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसी वारदात में शामिल व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद भी उसके पीछे मौजूद कथित संचालकों, वित्तीय संपर्कों और दूसरे सहयोगियों तक पहुंचना आसान नहीं होता।

टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग के बाद अनिल पंडित जांच के केंद्र में क्यों?

मुंबई में टाइगर श्रॉफ की कार पर गोलीबारी के बाद अमेरिका में मौजूद बताए जा रहे अनिल पंडित का नाम चर्चा में आया। उसके नाम से सामने आए सोशल मीडिया संदेश और ऑडियो में हमले की जिम्मेदारी लेने का दावा किया गया। संदेशों में अभिनेता सलमान खान को भी धमकी दिए जाने की बात सामने आई है। इन दावों की प्रामाणिकता और संबंधित लोगों की वास्तविक भूमिका जांच का विषय है।मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अनिल पंडित हरियाणा के पानीपत जिले का रहने वाला है और भारतीय जांच एजेंसियां उसे बिश्नोई गिरोह से जुड़े कथित विदेशी नेटवर्क के संदर्भ में देख रही हैं।

उसका नाम इससे पहले भी कुछ गोलीबारी और जबरन वसूली से जुड़े मामलों की जांच के दौरान सामने आने की खबरें आई हैं। इनमें दिल्ली में एक जिम मालिक से जुड़ी गोलीबारी और दूसरे शहरों में हुई फायरिंग की घटनाएं शामिल बताई गई हैं। इन मामलों में उसकी भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

टाइगर श्रॉफ मामले में जांच का अहम पहलू यह है कि कथित तौर पर विदेश में मौजूद व्यक्ति और मुंबई में वारदात को अंजाम देने वाले स्थानीय हमलावरों के बीच संपर्क कैसे स्थापित हुआ।

20 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने सोनीपत से एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया, जिस पर कथित तौर पर हमलावरों और अनिल पंडित के बीच संपर्क स्थापित कराने का आरोप है। रिपोर्ट में इस गिरफ्तारी के बाद मामले में हिरासत में लिए गए लोगों की कुल संख्या छह बताई गई। हालांकि, किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी अपने आप उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों को सिद्ध नहीं करती।यह घटनाक्रम इस बात को रेखांकित करता है कि जांच केवल गोली चलाने वालों की पहचान तक सीमित नहीं रहती। पुलिस को यह भी पता लगाना होता है कि हमले की योजना किसने बनाई, कथित संपर्क किस माध्यम से हुआ और अलग-अलग व्यक्तियों की भूमिका क्या थी।

कौन है हरमन संधू और क्यों जांच एजेंसियों की नजर उस पर है?

इस मामले में हरमनवीर सिंह उर्फ हरमन संधू का नाम भी सामने आया है। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों में उसे बिश्नोई गिरोह से जुड़े कथित विदेशी नेटवर्क के एक सदस्य के रूप में वर्णित किया गया है।टाइगर श्रॉफ पर हमले के बाद सामने आए संदेशों में हरमन संधू का नाम लिए जाने की खबरें हैं। लेकिन किसी संदेश में नाम आने और अपराध में भूमिका साबित होने के बीच बड़ा अंतर है। इसलिए इस मामले में उसके कथित संपर्कों और भूमिका की पुष्टि जांच के निष्कर्षों से ही होगी।

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक मामलों में जांच एजेंसियों के सामने एक प्रमुख समस्या यह होती है कि संदिग्ध व्यक्ति किसी दूसरे देश में मौजूद हो सकता है, जबकि कथित अपराध भारत में हुआ हो। ऐसी स्थिति में डिजिटल साक्ष्य, संचार रिकॉर्ड और वित्तीय लेन-देन से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए संबंधित देशों की कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण हो जाता है।

‘ऑपरेशन हार्ड बॉल’: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेटवर्क पर शिकंजा

लॉरेंस बिश्नोई से जुड़े कथित आपराधिक नेटवर्क की अंतरराष्ट्रीय पहुंच का एक महत्वपूर्ण संदर्भ अमेरिका में जुलाई 2026 में घोषित ‘ऑपरेशन हार्ड बॉल’ है।अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, इस अभियान के तहत अमेरिका, कनाडा और यूरोप में भारत से जुड़े तीन कथित अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध समूहों के खिलाफ कार्रवाई की गई। अधिकारियों ने 24 आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी दी। इन समूहों पर हिंसक अपराधों, लक्षित हत्याओं, गोलीबारी, जबरन वसूली और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मादक पदार्थों की तस्करी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए।अमेरिकी अधिकारियों की कार्रवाई का महत्व केवल गिरफ्तारियों की संख्या तक सीमित नहीं है। यह उन आपराधिक नेटवर्कों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए कार्रवाई करने की कोशिश को दर्शाती है, जिनकी कथित गतिविधियां एक से अधिक देशों तक फैली हुई हैं।ऐसे मामलों में किसी एक देश की पुलिस के लिए पूरे नेटवर्क को समाप्त करना कठिन हो सकता है।

संदिग्ध व्यक्ति दूसरे देश में हो, वित्तीय संपर्क किसी तीसरे देश से जुड़े हों और कथित अपराध भारत में हुआ हो, तो जांच में विभिन्न न्यायक्षेत्रों के बीच समन्वय की आवश्यकता बढ़ जाती है। हालांकि, अभियोग में नाम आने का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं है। आरोपों पर फैसला संबंधित न्यायालयों में उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होता है।

क्या है डर का कारोबार? धमकी से वसूली तक का कथित खेल

जांच एजेंसियों के सामने एक अहम सवाल यह भी है कि आखिर ऐसे गिरोह बड़ी हस्तियों, कारोबारियों और दूसरे प्रभावशाली लोगों को निशाना बनाकर क्या हासिल करना चाहते हैं?

संगठित अपराध की दुनिया में धमकी और जबरन वसूली का संबंध लंबे समय से देखा जाता रहा है। किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना, उसके परिवार या कारोबार को निशाना बनाने का भय पैदा करना और फिर उस डर के जरिए पैसे की मांग करना आपराधिक गिरोहों की कथित कार्यप्रणाली का हिस्सा हो सकता है।

बिश्नोई गिरोह से जुड़े मामलों में भी कारोबारियों को धमकाने, जबरन वसूली और गोलीबारी के आरोप सामने आए हैं।इस कथित मॉडल में सोशल मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी हमले के बाद यदि कोई गिरोह उसकी जिम्मेदारी लेने का दावा करता है, तो उसका संदेश केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, जिसे निशाना बनाया गया है। वह दूसरे कारोबारियों, फिल्मी हस्तियों और आम लोगों तक भी पहुंचता है।

इस तरह एक वारदात का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर भय पैदा करने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, हर सोशल मीडिया पोस्ट की प्रामाणिकता और उसके पीछे मौजूद लोगों की पहचान की पुष्टि जरूरी है।यही वह बिंदु है, जहां आपराधिक हिंसा केवल एक व्यक्ति के खिलाफ अपराध नहीं रह जाती, बल्कि समाज में असुरक्षा पैदा करने और आर्थिक दबाव बनाने का कथित माध्यम बन सकती है।

सलमान खान से सिद्धू मूसेवाला और बाबा सिद्दीकी तक: क्यों चर्चा में रहा बिश्नोई नेटवर्क?

लॉरेंस बिश्नोई का नाम पिछले कुछ वर्षों में कई चर्चित आपराधिक मामलों और धमकियों के कारण राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा है।

मई 2022 में पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या कर दी गई थी।

अक्टूबर 2024 में महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री बाबा सिद्दीकी की हत्या हुई।

इन मामलों की जांच में बिश्नोई गिरोह से जुड़े लोगों के नाम सामने आए। हालांकि, प्रत्येक मामले में आरोपियों की भूमिका और आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार किया जाना चाहिए।

बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को भी लंबे समय से धमकियां मिलती रही हैं। उनके आवास के बाहर हुई गोलीबारी की घटना के बाद अभिनेता की सुरक्षा और संगठित अपराध के नेटवर्क को लेकर व्यापक चर्चा हुई थी।

टाइगर श्रॉफ की कार पर गोलीबारी के बाद सामने आई धमकियों ने एक बार फिर फिल्म उद्योग में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा का प्रश्न खड़ा किया है। खास बात यह है कि कथित हमले की जिम्मेदारी लेने वाले संदेशों में सलमान खान का भी उल्लेख किया गया।ऐसे संदेशों को केवल सनसनीखेज बयान मानकर नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा और उनकी सत्यता की जांच किए बिना उन्हें प्रमाणित तथ्य मान लेना भी सही नहीं है। सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती यह है कि वे वास्तविक खतरे का आकलन करें, संभावित साजिश की जांच करें और अफवाहों को फैलने से रोकें।

डी-कंपनी से तुलना क्यों की जाती है?

भारत के अंडरवर्ल्ड का इतिहास देखें तो दाऊद इब्राहिम का नाम एक ऐसे आपराधिक नेटवर्क के साथ जुड़ा रहा है, जिसकी गतिविधियों और संपर्कों का दायरा भारत से बाहर तक फैला बताया गया। इसी नेटवर्क को आमतौर पर ‘डी-कंपनी’ कहा जाता है।

लॉरेंस बिश्नोई गिरोह की तुलना डी-कंपनी से किए जाने के पीछे मुख्य कारण कथित अंतरराष्ट्रीय संपर्क, अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद सहयोगियों और आपराधिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बहुस्तरीय नेटवर्क जैसी समानताएं हैं।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने भी बिश्नोई से जुड़े आपराधिक नेटवर्क के विस्तार और विभिन्न राज्यों में उसके संपर्कों की पड़ताल की है। जांच एजेंसियों के सामने आए विवरणों में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में कथित संपर्कों का उल्लेख मिलता रहा है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी नेटवर्क की कार्यप्रणाली में समानता होने का अर्थ यह नहीं कि उसकी ताकत, आर्थिक क्षमता, अंतरराष्ट्रीय प्रभाव या आपराधिक इतिहास भी डी-कंपनी के बराबर है।

डी-कंपनी और बिश्नोई गिरोह अलग-अलग समय, परिस्थितियों और संरचनाओं में विकसित हुए हैं। इसलिए दोनों की तुलना एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण हो सकती है, लेकिन उन्हें पूरी तरह एक जैसा मानना तथ्यों से आगे बढ़ना होगा।

असल सवाल यह है कि क्या आधुनिक संचार माध्यमों और विदेशों में मौजूद संपर्कों की मदद से स्थानीय आपराधिक गिरोह अपने प्रभाव का विस्तार कर सकते हैं?

जांच एजेंसियों के सामने आए मामलों से पता चलता है कि इस संभावना को गंभीरता से लेना जरूरी है।जेल में बंद गैंगस्टर के नेटवर्क को खत्म करना इतना मुश्किल क्यों?

लॉरेंस बिश्नोई साबरमती जेल में बंद है, फिर भी उससे जुड़े कथित नेटवर्क की गतिविधियों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इससे एक महत्वपूर्ण सुरक्षा संबंधी प्रश्न सामने आता है कि जेल में बंद किसी आरोपी के बाहरी संपर्कों और संभावित आपराधिक गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण कैसे सुनिश्चित किया जाए।

इस चुनौती के कई पहलू हैं।

पहला, विदेशी संपर्क:

यदि किसी मामले के संदिग्ध दूसरे देशों में मौजूद हैं, तो उनकी पहचान और गिरफ्तारी के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून-प्रवर्तन सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।

दूसरा, स्थानीय स्तर पर अपराध करने वाले लोग:

किसी कथित नेटवर्क के स्थानीय सदस्यों या हमलावरों की गिरफ्तारी से जांच को दिशा मिल सकती है, लेकिन इसके साथ ही कथित साजिश, वित्तीय संपर्क और अन्य सहयोगियों की भूमिका भी स्पष्ट करनी होती है।

तीसरा, डिजिटल साक्ष्य:

एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप और दूसरे डिजिटल माध्यमों से जुड़े संचार की जांच के लिए तकनीकी विशेषज्ञता, वैधानिक अनुमति और प्रमाणिक डिजिटल साक्ष्य की आवश्यकता हो सकती है।

चौथा, धन के स्रोत:

जबरन वसूली या दूसरे कथित अपराधों से अर्जित धन का पता लगाना और उसके लेन-देन की कड़ियों को जोड़ना भी महत्वपूर्ण है।इन सभी पहलुओं की जांच में समय लग सकता है। साथ ही, हर संदिग्ध संपर्क को आपराधिक गतिविधि का प्रमाण नहीं माना जा सकता। जांच एजेंसियों को साक्ष्यों के आधार पर अलग-अलग व्यक्तियों की भूमिका स्थापित करनी होती है।

युवाओं की भर्ती और अपराध का आकर्षण: एक गंभीर सामाजिक चुनौती

संगठित अपराध के नेटवर्क को समझने का एक पहलू उन युवाओं की भूमिका भी है, जो कथित तौर पर स्थानीय स्तर पर अपराधों में शामिल किए जाते हैं।पुलिस जांच में कई मामलों में ऐसे आरोप सामने आए हैं कि अपराधी गिरोह युवाओं को पैसे, पहचान या प्रभाव का लालच देकर अपने संपर्क में लाने की कोशिश करते हैं। कुछ मामलों में सोशल मीडिया और ऑनलाइन संपर्कों का इस्तेमाल भी सामने आया है।युवाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि किसी गैंगस्टर के नाम पर सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला प्रभाव वास्तविक सफलता नहीं है। हिंसा, धमकी और जबरन वसूली के रास्ते पर चलने से गिरफ्तारी, लंबी कानूनी लड़ाई और जीवनभर के गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

अपराध के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले लोग अक्सर खुद भी उस हिंसक व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं, जिसमें उनका जीवन और भविष्य दोनों खतरे में पड़ते हैं। इसलिए संगठित अपराध के खिलाफ लड़ाई केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। युवाओं को शिक्षा, रोजगार और सकारात्मक अवसर उपलब्ध कराना भी दीर्घकालिक रोकथाम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

एनएसके विश्लेषण:

गैंगस्टर की असली ताकत उसके नाम में है या नेटवर्क में?

टाइगर श्रॉफ की कार पर गोलीबारी का मामला एक बार फिर यह सवाल सामने लाता है कि आधुनिक दौर में संगठित अपराध की चुनौती को केवल किसी एक गैंगस्टर की गिरफ्तारी से समझा जा सकता है या नहीं।

किसी गिरोह का नाम चर्चा में आना, उसके नाम पर धमकी जारी होना और किसी वारदात की जिम्मेदारी लेने का दावा करना अलग-अलग घटनाएं हैं। इन सबके पीछे वास्तविक संचालक कौन हैं, वित्तीय सहायता कहां से आती है और अपराध को अंजाम देने वालों के बीच किस तरह के संबंध हैं—इन सवालों के जवाब जांच से ही मिल सकते हैं।

यदि किसी नेटवर्क का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति जेल में है, लेकिन उसके कथित सहयोगी बाहर सक्रिय हैं, तो जांच एजेंसियों के लिए जरूरी हो जाता है कि वे पूरे नेटवर्क की संरचना और संपर्कों की पड़ताल करें।

अमेरिका में ‘ऑपरेशन हार्ड बॉल’ के तहत हुई कार्रवाई भी इस बात को रेखांकित करती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले कथित आपराधिक नेटवर्क से निपटने के लिए विभिन्न देशों के बीच सहयोग कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।

लेकिन इस लड़ाई में कानून और साक्ष्यों की कसौटी से समझौता नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति को केवल उसके कथित संपर्कों, सोशल मीडिया पोस्ट या किसी गिरोह के नाम के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

लॉरेंस बिश्नोई गिरोह की वास्तविक ताकत का आकलन उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध उपलब्ध प्रमाणों, सिद्ध आपराधिक गतिविधियों और नेटवर्क की वास्तविक संरचना से किया जाना चाहिए।

दाऊद इब्राहिम की डी-कंपनी से तुलना का सवाल अपनी जगह है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून-प्रवर्तन एजेंसियां उन संपर्कों, वित्तीय कड़ियों और स्थानीय सहयोगियों तक पहुंच पा रही हैं, जिनके जरिए कथित आपराधिक गतिविधियां संचालित होती हैं?

टाइगर श्रॉफ मामले की जांच से इन सवालों पर और रोशनी पड़ सकती है।

फिलहाल, हमले के पीछे की पूरी साजिश, सभी संदिग्धों की भूमिका और कथित अंतरराष्ट्रीय संपर्कों के बारे में अंतिम निष्कर्ष जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएंगे।

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