इशाक डार की मौजूदगी में राजनाथ सिंह का पाकिस्तान पर करारा प्रहार, बोले— आतंकियों को पालने-पोसने वालों का दोहरापन अब नहीं चलेगा!

बी के झा,एन एस के विशेष

NSK news Ind

ताजिकिस्तान / नई दिल्ली, 21 अक्टूबर

ताजिकिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक के दौरान भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आतंकवाद के मुद्दे पर ऐसा सख्त संदेश दिया, जिसकी गूंज पाकिस्तान तक पहुंचना तय है। पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री मोहम्मद इशाक डार की मौजूदगी में राजनाथ सिंह ने आतंकवाद को संरक्षण देने वालों, आतंकियों को आर्थिक मदद पहुंचाने वालों और उनके लिए सुरक्षित ठिकाने मुहैया कराने वाली ताकतों पर कड़ा प्रहार किया।

भारत का रुख स्पष्ट था— आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल हथियार उठाने वाले आतंकियों तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उनके पूरे नेटवर्क को खत्म करना होगा।

राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि कुछ ताकतें युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेलती हैं, उन्हें आतंकवाद के रास्ते पर ले जाती हैं और फिर उन्हें संरक्षण भी देती हैं। उन्होंने आतंकवाद को वित्तीय सहायता देने वालों और उसके पीछे काम करने वाले तंत्र पर निशाना साधते हुए स्पष्ट किया कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में किसी भी तरह का दोहरा रवैया स्वीकार नहीं किया जा सकता।

आतंकवाद के खिलाफ आधा-अधूरा नहीं, निर्णायक प्रहार जरूरी

राजनाथ सिंह के संबोधन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह था कि आतंकवाद को केवल बंदूक उठाने वाले व्यक्ति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे सक्रिय पूरा नेटवर्क भी उतना ही गंभीर चुनौती है।

आतंकियों को धन कौन देता है?

उन्हें हथियार और प्रशिक्षण कौन मुहैया कराता है?

उनके लिए सुरक्षित ठिकानों की व्यवस्था कौन करता है?

और आतंकवादी गतिविधियों के बाद उन्हें बचाने का प्रयास कौन करता है?

इन सवालों का जवाब तलाशे बिना आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई को निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता।

रक्षा मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आतंकवाद के पूरे इकोसिस्टम के खिलाफ एकजुट कार्रवाई करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका संदेश साफ था कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। आतंकियों को पनाह देने, उनकी फंडिंग करने और उनके नेटवर्क को बचाने वालों के विरुद्ध भी ठोस कदम उठाने होंगे।

भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी देश के साथ उसके संबंधों या रणनीतिक हितों के आधार पर अलग-अलग मानदंड नहीं अपनाए जाने चाहिए।

इशाक डार की मौजूदगी में पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक संदेश

SCO की बैठक में पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री मोहम्मद इशाक डार की मौजूदगी ने राजनाथ सिंह के संबोधन को विशेष राजनीतिक और कूटनीतिक संदर्भ दिया। आतंकवाद को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। भारत लगातार आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान की धरती से सक्रिय आतंकवादी संगठनों को संरक्षण और समर्थन मिलता रहा है। पाकिस्तान इन आरोपों को खारिज करता रहा है।

ऐसे माहौल में राजनाथ सिंह का आतंकवाद के वित्तपोषण, आतंकियों को संरक्षण देने और उनके नेटवर्क को खत्म करने पर जोर देना भारत की उस नीति को रेखांकित करता है, जिसके तहत नई दिल्ली आतंकवाद के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की कोशिश करती रही है।भारत का तर्क है कि आतंकवाद को किसी राजनीतिक उद्देश्य, रणनीतिक लाभ या वैचारिक आवरण के पीछे छिपाकर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

आतंकवाद के खिलाफ प्रतिबद्धता का आकलन केवल बयानों से नहीं, बल्कि संबंधित देशों की वास्तविक कार्रवाई से होना चाहिए।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी आतंकवादी ठिकानों पर सवाल

भारत की आतंकवाद विरोधी नीति के संदर्भ में ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। इस अभियान के दौरान भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में स्थित आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाने की कार्रवाई की थी। भारत ने इसे आतंकवादी हमलों के जवाब में की गई कार्रवाई बताया था।अब आतंकवादी नेटवर्क के दोबारा सक्रिय होने, प्रशिक्षण ढांचे के पुनर्निर्माण और आतंकियों को मिलने वाले कथित संरक्षण को लेकर उठने वाले सवाल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से गंभीर हैं। हालांकि, किसी विशेष ठिकाने के दोबारा सक्रिय होने या उसे सैन्य संरक्षण दिए जाने के दावों की पुष्टि के लिए स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं।

भारत के सामने चुनौती केवल आतंकवादी हमलों को रोकने की नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों को समाप्त करने की भी है, जिनमें आतंकवादी संगठन धन, प्रशिक्षण, हथियार और सुरक्षित ठिकाने हासिल कर पाते हैं।यही कारण है कि आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और आतंकवाद की फंडिंग पर प्रभावी कार्रवाई को अहम माना जाता है।

पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली और सुरक्षा नीति पर सवाल

पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट, कर्ज, महंगाई और वित्तीय दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करता रहा है। ऐसे में उसकी आर्थिक प्राथमिकताओं और सुरक्षा नीति को लेकर बहस भी होती रही है। लेकिन आर्थिक बदहाली और आतंकवाद के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए ठोस आंकड़ों और प्रमाणों की आवश्यकता होती है।भारत की चिंता यह रही है कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई अनिवार्य है। किसी देश की आर्थिक स्थिति चाहे जैसी हो, आतंकवाद को बढ़ावा देने या उसे संरक्षण देने के आरोपों की निष्पक्ष जांच और प्रमाणों के आधार पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

पाकिस्तान के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि वह आतंकवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता को प्रभावी कार्रवाई के माध्यम से प्रदर्शित करे। दक्षिण एशिया में स्थायी शांति का रास्ता आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध विश्वसनीय और निरंतर कार्रवाई से होकर गुजरता है।

SCO के मंच से भारत का स्पष्ट संदेश

शंघाई सहयोग संगठन क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और सदस्य देशों के बीच समन्वय के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। ऐसे मंच पर आतंकवाद का मुद्दा उठाना इसलिए भी अहम है, क्योंकि आतंकवादी नेटवर्क किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहते। उनकी फंडिंग, भर्ती, प्रचार और गतिविधियों के तार कई देशों तक फैले हो सकते हैं।राजनाथ सिंह के संबोधन का मूल संदेश यही था कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरे मानदंड नहीं चल सकते। यदि दुनिया वास्तव में आतंकवाद से मुक्त वातावरण चाहती है, तो उसे केवल आतंकवादी हमलों की निंदा करने तक सीमित नहीं रहना होगा। आतंकियों को संसाधन उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क और उन्हें संरक्षण देने वाली व्यवस्थाओं के खिलाफ भी प्रभावी कार्रवाई करनी होगी।

भारत की नीति का केंद्रीय प्रश्न स्पष्ट है— आतंकवाद के खिलाफ प्रतिबद्धता का प्रमाण बयान नहीं, कार्रवाई होनी चाहिए।

ताजिकिस्तान में SCO की बैठक के दौरान राजनाथ सिंह ने इसी व्यापक चुनौती की ओर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा। पाकिस्तान के प्रतिनिधि की मौजूदगी में दिया गया यह संदेश भारत के उस रुख को सामने रखता है कि आतंकवाद के मुद्दे पर किसी तरह की अस्पष्टता या दोहरे मानदंडों की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

एन एस के का विश्लेषण:

आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई तभी सफल हो सकती है, जब हमले करने वालों के साथ-साथ उन्हें धन, प्रशिक्षण, हथियार और सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने वाले पूरे नेटवर्क पर कार्रवाई हो।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसी कसौटी पर देशों की प्रतिबद्धता परखनी चाहिए।

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