बी के झा – एन एस के पोर्टल
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शिमला, 23 अक्टूबर
हिमाचल प्रदेश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की जनवरी में जारी अधिसूचना को वापस लेने और सवर्ण आयोग के गठन की मांग को लेकर सवर्ण समाज ने अपनी आवाज बुलंद कर दी है। राष्ट्रीय देवभूमि पार्टी और उससे संबद्ध संगठनों के नेतृत्व में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने बृहस्पतिवार को शिमला स्थित हिमाचल प्रदेश सचिवालय का घेराव करने की कोशिश की। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछारें कीं और हल्का बल प्रयोग किया। प्रदर्शन के कारण छोटा शिमला इलाके में यातायात पूरी तरह ठप हो गया।यह प्रदर्शन महज एक दिन का विरोध नहीं था, बल्कि इसके पीछे 21 दिनों तक चली लगभग 600 किलोमीटर लंबी ‘सवर्ण समाज अश्वमेध न्याय यात्रा’ की पृष्ठभूमि भी थी।
यात्रा के शिमला पहुंचने के साथ ही आंदोलन ने राजधानी में जोर पकड़ लिया। प्रदर्शनकारियों ने सचिवालय में प्रवेश करने की कोशिश की, जबकि पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए मोर्चा संभाला। इस घटनाक्रम ने राज्य सरकार के सामने सवर्ण समाज की मांगों पर बातचीत करने का दबाव बढ़ा दिया है।
600 किलोमीटर की यात्रा के बाद शिमला में शक्ति प्रदर्शन
राष्ट्रीय देवभूमि पार्टी की ओर से आयोजित ‘सवर्ण समाज अश्वमेध न्याय यात्रा’ 21 दिनों तक चली। पार्टी अध्यक्ष रूमित सिंह ठाकुर ने दावा किया कि यात्रा को व्यापक समर्थन मिला है। उन्होंने इसे पूरे समाज की जीत बताते हुए कहा कि आंदोलन ने सवर्ण समाज से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर उठाने का काम किया है।प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में यूजीसी की जनवरी में जारी अधिसूचना को वापस लेना और हिमाचल प्रदेश में सवर्ण आयोग का गठन करना शामिल है। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए और सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।हालांकि, अधिसूचना के किन प्रावधानों पर प्रदर्शनकारियों को आपत्ति है, इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध जानकारी में सामने नहीं आया है। ऐसे में अधिसूचना को लेकर आंदोलन की मांगों और संबंधित प्रावधानों के बीच के संबंध को समझना भी जरूरी होगा।

सचिवालय घेराव के दौरान पुलिस से टकराव, यातायात ठप
बृहस्पतिवार को प्रदर्शनकारियों के सचिवालय की ओर बढ़ने और परिसर में प्रवेश की कोशिश के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई। पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोकने के लिए पानी की बौछारें कीं और हल्का बल प्रयोग किया। इस कार्रवाई के बाद इलाके में अफरा-तफरी की स्थिति बनी।प्रदर्शन के चलते छोटा शिमला में यातायात पूरी तरह बाधित हो गया। राजधानी के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में वाहनों की आवाजाही रुकने से आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।
राष्ट्रीय देवभूमि पार्टी के अध्यक्ष रूमित सिंह ठाकुर ने कहा कि वह इस बात से संतुष्ट हैं कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया गया। उनके मुताबिक, यात्रा और प्रदर्शन को मिला समर्थन आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण है।
सरकार ने बातचीत के लिए भेजे मंत्री, शुक्रवार को मुख्यमंत्री से मुलाकात
आंदोलन के बीच राज्य सरकार ने पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह को प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने के लिए भेजा। इसके बाद मुख्यमंत्री और प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे नेताओं के बीच शुक्रवार को बैठक निर्धारित की गई है।मुख्यमंत्री के साथ प्रस्तावित बैठक को आंदोलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार प्रदर्शनकारियों की मांगों पर क्या रुख अपनाती है और सवर्ण आयोग के गठन तथा यूजीसी अधिसूचना को लेकर बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है।मंत्री को बातचीत के लिए भेजे जाने को रूमित सिंह ठाकुर ने महत्वपूर्ण घटनाक्रम बताया। हालांकि, बैठक तय होने का अर्थ यह नहीं है कि सरकार ने प्रदर्शनकारियों की मांगें स्वीकार कर ली हैं। इन मुद्दों पर सरकार का अंतिम रुख बातचीत के बाद ही स्पष्ट होगा।
बीजेपी और कांग्रेस पर भी बरसे रूमित सिंह ठाकुर
राष्ट्रीय देवभूमि पार्टी के अध्यक्ष रूमित सिंह ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश की राजनीति में सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों को भी निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी और कांग्रेस, दोनों की सरकारें उनकी पार्टी की ओर से उठाए जा रहे मुद्दों का समाधान करने में विफल रही हैं।ठाकुर ने चेतावनी दी कि सवर्ण समाज के समर्थन के बिना कोई भी राजनीतिक दल 2027 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल नहीं कर पाएगा।
उन्होंने दावा किया कि यह समुदाय राज्य की आबादी के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है और सामाजिक स्तर पर उसका प्रभाव है।उनके बयान से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय देवभूमि पार्टी इस आंदोलन को केवल सामाजिक मांगों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण मुद्दा बनाने की कोशिश भी कर रही है।
2027 से पहले सरकार के सामने सामाजिक और राजनीतिक चुनौती
हिमाचल प्रदेश में सवर्ण आयोग के गठन और यूजीसी अधिसूचना की वापसी की मांग को लेकर हुआ यह प्रदर्शन राज्य सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम है।
21 दिनों की पैदल यात्रा के बाद राजधानी में जुटी भीड़ और सचिवालय घेराव की कोशिश ने आंदोलन की गंभीरता को रेखांकित किया है।
अब सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे प्रदर्शनकारियों की मांगों पर संवाद करना है, तो दूसरी ओर किसी भी निर्णय में लागू नियमों, संबंधित संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र और कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखना होगा।शुक्रवार को मुख्यमंत्री के साथ प्रस्तावित बैठक से यह संकेत मिल सकता है कि सरकार आंदोलन की मांगों को किस तरह देख रही है। क्या बातचीत के बाद कोई ठोस आश्वासन मिलेगा, क्या सवर्ण आयोग के गठन पर विचार आगे बढ़ेगा या आंदोलन को आगे जारी रखने का फैसला होगा—इन सवालों के जवाब बैठक के नतीजों पर निर्भर करेंगे।
फिलहाल, शिमला में हुए प्रदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सवर्ण आयोग और यूजीसी अधिसूचना का मुद्दा हिमाचल प्रदेश में सामाजिक मांग के साथ-साथ राजनीतिक बहस का विषय भी बन चुका है।
एन एस के का राजनीतिक विश्लेषण:
600 किलोमीटर की यात्रा, सचिवालय घेराव और 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर दी गई चेतावनी ने इस आंदोलन को नई राजनीतिक धार दी है।
हालांकि, आंदोलन की वास्तविक सफलता का आकलन भीड़ और नारों से नहीं, बल्कि इस बात से होगा कि सरकार मांगों पर क्या निर्णय लेती है।
शुक्रवार की प्रस्तावित बैठक इस आंदोलन की अगली दिशा तय करने में अहम साबित हो सकती है।
एन एस के पोर्टल – खबर वही, नजर अलग।
