बी के झा
NSK news Ind

नई दिल्ली, 18 सितंबर
तमिलनाडु में जवाहर नवोदय विद्यालय खोलने के मुद्दे पर केंद्र और राज्य के बीच चल रहा टकराव गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने इसे केवल स्कूल और जमीन का विवाद मानने के बजाय सहकारी संघवाद और छात्रों के शैक्षणिक अवसरों से जोड़कर देखा। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ ने तमिलनाडु सरकार से अपने रुख में लचीलापन लाने और केंद्र के साथ बातचीत के जरिए रास्ता निकालने को कहा। अदालत ने पहले दिए गए उस निर्देश को वापस लेने से इनकार कर दिया, जिसमें हर जिले में नवोदय विद्यालय के लिए जमीन की पहचान करने को कहा गया था। हालांकि, राज्य को अनुपालन के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया गया है।
‘आप यह नहीं कह सकते कि मैं कोई नीति नहीं मानूंगा’
सुनवाई के दौरान अदालत ने तमिलनाडु सरकार के उस रुख पर सवाल उठाया, जिसमें राज्य ने नवोदय विद्यालयों को लेकर अपनी शिक्षा नीति और दो-भाषा नीति का हवाला दिया था।पीठ ने साफ किया कि केंद्र और राज्य के बीच मतभेद होने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि संवाद के रास्ते बंद कर दिए जाएं। अदालत ने कहा कि सरकार को बातचीत करनी चाहिए और किसी नीति को केवल इस आधार पर पूरी तरह अस्वीकार करने का रवैया नहीं अपनाना चाहिए।
न्यायमूर्ति नागरत्ना की टिप्पणी का सार यही था कि संघवाद का मतलब टकराव नहीं, मिलकर काम करना है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि आज मुद्दा शिक्षा का है, भविष्य में कोई दूसरा विषय हो सकता है; इसलिए संवैधानिक व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के बीच संवाद बनाए रखना जरूरी है।
‘केंद्र के सामने झुकना नहीं, छात्रों के लिए मिलकर काम करना है’
तमिलनाडु सरकार की ओर से दलील दी गई कि नवोदय विद्यालयों की स्थापना का आर्थिक बोझ अंततः राज्य पर आ सकता है। राज्य की ओर से केंद्र की योजनाओं के क्रियान्वयन और भुगतान को लेकर भी आपत्तियां रखी गईं।इसके जवाब में अदालत ने इस पूरे विवाद को केंद्र के सामने राज्य के ‘झुकने’ के रूप में देखने से बचने को कहा। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने जोर दिया कि केंद्र और राज्य को छात्रों के हित में मिलकर काम करना चाहिए।
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने अदालत को बताया कि राज्य की भूमिका मुख्य रूप से स्कूलों के लिए जमीन उपलब्ध कराने तक सीमित होगी, जबकि अन्य व्यवस्थाएं केंद्र की ओर से संभाली जाएंगी।
हिंदी का सवाल आया तो कोर्ट ने क्या कहा?
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब तमिलनाडु में हिंदी बनाम दो-भाषा नीति को लेकर राजनीतिक और नीतिगत बहस लंबे समय से जारी है। नवोदय विद्यालयों के मॉडल में हिंदी समेत अन्य भाषाओं के अध्ययन का प्रावधान होने के कारण राज्य सरकार ने इसे अपनी मौजूदा शिक्षा नीति के संदर्भ में चुनौती दी है।हालांकि, इस सुनवाई को सीधे तौर पर ‘तमिलनाडु में हिंदी अनिवार्य कराने’ का आदेश बताना सही नहीं होगा। अदालत के सामने मुख्य तत्काल मुद्दा नवोदय विद्यालयों के लिए जमीन की पहचान और पहले के न्यायिक निर्देश का अनुपालन था।
मद्रास हाईकोर्ट के फैसले से शुरू हुआ विवाद
मामले की जड़ मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले में है, जिसमें तमिलनाडु में जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित करने के रास्ते में राज्य की आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया गया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु को हर जिले में नवोदय विद्यालय स्थापित करने के लिए आवश्यक जमीन की पहचान करने का निर्देश दिया था। राज्य ने इस आदेश को वापस लेने की मांग की, लेकिन गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। साथ ही अनुपालन के लिए राज्य को तीन महीने की अतिरिक्त मोहलत दी।
अदालत का फोकस—नीति की लड़ाई से ज्यादा छात्रों का भविष्य
सुनवाई में अदालत का रुख यह रहा कि केंद्र और राज्य अपनी-अपनी नीतिगत स्थिति पर कायम रहते हुए भी बातचीत का रास्ता तलाश सकते हैं। अदालत ने संकेत दिया कि नवोदय विद्यालयों के अवसर छात्रों के लिए उपलब्ध कराने और संघीय ढांचे में राज्यों की नीतिगत चिंताओं के बीच संतुलन संवाद से निकाला जा सकता है।यानी सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल बहस को ‘कौन झुकेगा’ की राजनीति से हटाकर ‘बच्चों को अवसर कैसे मिलेगा’ के सवाल की ओर मोड़ने की कोशिश की है।
तीन महीने में जमीन चिन्हित करनी होगी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने निर्देश को वापस लेने से इनकार करते हुए तमिलनाडु को तीन महीने के भीतर नवोदय विद्यालयों के लिए जमीन की पहचान करने का समय दिया है। साथ ही केंद्र और राज्य के अधिकारियों को इस मुद्दे पर आगे बातचीत करने की गुंजाइश दी गई है।मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर को होगी।
अब असली परीक्षा संवाद की
तमिलनाडु की शिक्षा नीति और केंद्र की योजनाओं के बीच यह विवाद केवल जमीन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं दिखता। इसके केंद्र में भाषा, शिक्षा नीति, राज्यों की स्वायत्तता और छात्रों के लिए उपलब्ध शैक्षणिक अवसर जैसे बड़े सवाल भी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल गेंद दोनों सरकारों के पाले में डाल दी है—टकराव की जगह बातचीत, असहमति के बावजूद सहयोग और राजनीतिक खांचे से ऊपर छात्रों के हित पर जोर।
अब देखना यह है कि अगले तीन महीनों में चेन्नई और दिल्ली इस संवेदनशील मुद्दे पर अदालत की अपेक्षा के अनुरूप कोई व्यावहारिक रास्ता निकाल पाते हैं या विवाद फिर किसी नए कानूनी मोड़ पर पहुंचता है।
