बी के झा
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लखनऊ, 27 सितंबर
राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल की जन्म शताब्दी वर्ष की शुरुआत के अवसर पर लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके जीवन, संघर्ष और विचारों को याद किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि 1980 के दशक में अशोक सिंघल ने जिस ज्योति को प्रज्वलित किया था, वह आज ज्वाला बन चुकी है और हिंदू समाज के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए लगातार काम कर रही है।
अशोक सिंघल का जन्म वर्ष 1926 में हुआ था। वर्ष 2026 में उनकी जन्मशती मनाई जा रही है। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके सार्वजनिक जीवन को राष्ट्र, समाज और सनातन परंपरा के प्रति समर्पण के रूप में रेखांकित किया।योगी ने कहा कि सिंघल ने अपना पूरा जीवन एक यज्ञ की तरह राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित किया।
उनके संबोधन में अशोक सिंघल के जीवन को राम जन्मभूमि आंदोलन के व्यापक सामाजिक और धार्मिक संदर्भ से जोड़ते हुए उनके संगठनात्मक योगदान को याद किया गया।
‘तन समर्पित, मन समर्पित…
’मुख्यमंत्री ने अशोक सिंघल के जीवन-दर्शन को रेखांकित करते हुए कविता की पंक्ति—“तन समर्पित, मन समर्पित, और यह जीवन समर्पित,चाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं।”—का उल्लेख किया।
योगी के मुताबिक अशोक सिंघल के सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के बजाय राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण प्रमुख रहा। उन्होंने कहा कि सिंघल ने अपने जीवन को सामाजिक और राष्ट्रीय उद्देश्यों के लिए समर्पित किया और यही कारण है कि उनकी स्मृति आज भी उनके समर्थकों तथा उनसे जुड़े संगठनों के बीच महत्वपूर्ण बनी हुई है।
इंजीनियर से संघ प्रचारक और फिर राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल
अशोक सिंघल ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की थी। इसके बाद वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और प्रचारक के रूप में कार्य किया।बाद के वर्षों में वह विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए।
1980 और 1990 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान उनका नाम आंदोलन के प्रमुख संगठकों और वक्ताओं में सामने आया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में इसी दौर को याद करते हुए कहा कि उस समय हिंदू समाज के सामने नेतृत्व और संगठन की चुनौती थी और अशोक सिंघल ने उस आंदोलन को व्यापक स्तर पर संगठित करने में भूमिका निभाई।
यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि राम जन्मभूमि आंदोलन भारतीय राजनीति और सामाजिक इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना रहा है। इस आंदोलन ने देश की राजनीति, धार्मिक विमर्श और सामाजिक संगठनों की भूमिका पर गहरा प्रभाव डाला।
राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी स्मृतियों को योगी ने किया याद
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में राम जन्मभूमि आंदोलन के विभिन्न चरणों को याद किया। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में लोग अयोध्या में राम जन्मभूमि से जुड़े आंदोलन में शामिल हुए और कई कार्यकर्ताओं ने इसके लिए लंबे समय तक संघर्ष किया।
योगी ने कहा कि उस दौर में अशोक सिंघल की आवाज आंदोलन के प्रमुख स्वर के रूप में सामने आती रही।उनके अनुसार सिंघल का लक्ष्य केवल आंदोलन चलाना नहीं था, बल्कि हिंदू समाज को संगठित करना और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को व्यापक सामाजिक विमर्श का विषय बनाना भी था।
‘उन्होंने पूरा जीवन श्रीराम जन्मभूमि के लिए समर्पित कर दिया’मुख्यमंत्री ने कहा कि अशोक सिंघल ने अपना पूरा जीवन श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े आंदोलन के लिए समर्पित किया।
योगी ने राम मंदिर आंदोलन से जुड़े संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि बड़ी संख्या में युवा और महिलाएं भी आंदोलन से जुड़ीं। उन्होंने उस दौर के राजनीतिक वातावरण और अयोध्या आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं को अपनी स्मृतियों के साथ जोड़ा।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि आज अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण उनके सामने देखे गए उस लंबे संघर्ष के परिणाम के रूप में देखा जा रहा है।
गोरखनाथ मंदिर से जुड़ी स्मृति भी साझा की
योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में अशोक सिंघल के गोरखनाथ मंदिर से जुड़े प्रसंग का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सिंघल ने वहां बच्चों को पढ़ाया था।मुख्यमंत्री ने कहा कि राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान राजनीतिक परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण थीं, लेकिन अशोक सिंघल लगातार अपनी बात रखते रहे।इस प्रसंग के जरिए योगी ने सिंघल के व्यक्तित्व के उस पहलू को सामने रखा जिसमें संगठनात्मक गतिविधियों के साथ सामाजिक और शैक्षणिक जुड़ाव भी दिखाई देता है।
एक व्यक्ति नहीं, एक विचार-परंपरा की स्मृति?
अशोक सिंघल की जन्मशती का आयोजन केवल एक व्यक्ति की स्मृति का कार्यक्रम नहीं है। इसके पीछे उस विचारधारा और सामाजिक आंदोलन की स्मृति भी जुड़ी है, जिसने दशकों तक भारतीय सार्वजनिक जीवन को प्रभावित किया।उनके समर्थक उन्हें राम जन्मभूमि आंदोलन का प्रमुख रणनीतिकार और संगठनकर्ता मानते हैं।
दूसरी ओर, उस आंदोलन को लेकर भारतीय राजनीति और समाज में अलग-अलग दृष्टिकोण भी रहे हैं। इसलिए अशोक सिंघल की विरासत को समझने के लिए उनके समर्थकों के सम्मान के साथ-साथ उस दौर के व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ को भी देखना आवश्यक है।यही वजह है कि जन्मशती वर्ष का आयोजन इतिहास, राजनीति, धर्म, संस्कृति और संगठन—इन सभी आयामों को एक साथ चर्चा के केंद्र में लाता है।
‘ज्योति से ज्वाला’—योगी के बयान का राजनीतिक-सामाजिक संकेत
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि अशोक सिंघल की जलाई हुई ज्योति आज ज्वाला बन चुकी है, केवल श्रद्धांजलि का वाक्य नहीं है। यह उस संगठनात्मक यात्रा की ओर संकेत करता है जिसे हिंदू संगठनों से जुड़े लोग सिंघल की विरासत के रूप में देखते हैं।
विश्व हिंदू परिषद आज भी अशोक सिंघल की विरासत को अपनी संगठनात्मक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती है। संगठन की आधिकारिक वेबसाइट पर उसके प्रकाशनों और गतिविधियों में हिंदू समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों को प्रमुखता दी जाती है।
इसलिए जन्मशती वर्ष के अवसर पर सिंघल को याद करना उनके समर्थक संगठनों के लिए अतीत को स्मरण करने के साथ-साथ वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यों और भविष्य की दिशा पर बात करने का अवसर भी है।
आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे सिंघल के विचार
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अशोक सिंघल के जीवन और विचारों को याद करना उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने का अवसर है।उन्होंने कहा कि जन्म शताब्दी वर्ष का आयोजन केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक उनके विचारों और उनके जीवन के उद्देश्यों को पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
यहां से इस आयोजन का एक बड़ा सामाजिक प्रश्न भी सामने आता है—क्या किसी आंदोलन की विरासत केवल उसके प्रमुख राजनीतिक परिणामों से तय होती है या उसके पीछे खड़े सामाजिक संगठन, कार्यकर्ता और विचार भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं?
अशोक सिंघल का सार्वजनिक जीवन इस सवाल को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
संघर्ष से स्मृति तक, स्मृति से विरासत तक
अशोक सिंघल का जीवन भारतीय सार्वजनिक जीवन के उस दौर से जुड़ा रहा, जब धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दे धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आते गए। राम जन्मभूमि आंदोलन ने इस प्रक्रिया को व्यापक रूप दिया।आज, उनकी जन्मशती पर जब उनके जीवन को याद किया जा रहा है, तब उनके समर्थकों के लिए यह संघर्ष की स्मृति और उपलब्धि का अवसर है।
वहीं व्यापक ऐतिहासिक दृष्टि से यह उस दौर की राजनीति, समाज और धार्मिक आंदोलनों को समझने का अवसर भी है।
योगी आदित्यनाथ के संबोधन का केंद्रीय संदेश स्पष्ट था—अशोक सिंघल की भूमिका को केवल अतीत की घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उनके द्वारा स्थापित संगठनात्मक और सांस्कृतिक परंपरा को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता है।
दिनकर की पंक्ति से सिंघल की स्मृति तक
अशोक सिंघल का जीवन जिस भाव से मुख्यमंत्री ने याद किया, उसमें त्याग, संगठन और राष्ट्रसेवा तीनों प्रमुख शब्द रहे।एक ओर वह व्यक्ति था जिसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, दूसरी ओर उसने अपना जीवन संघ और विश्व हिंदू परिषद के संगठनात्मक कार्यों में लगाया।
फिर राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान वह उन प्रमुख चेहरों में शामिल हुआ जिनकी आवाज राष्ट्रीय स्तर पर सुनी गई।आज उनकी जन्मशती के अवसर पर योगी आदित्यनाथ का ‘ज्योति से ज्वाला’ वाला कथन इसी लंबी यात्रा की राजनीतिक-सामाजिक स्मृति को सामने लाता है।
जन्म 1926 में हुआ, जीवन संघर्ष में बीता और 2026 में जन्मशती के बहाने फिर चर्चा के केंद्र में हैं अशोक सिंघल।
समय बदल गया, परिस्थितियां बदल गईं, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो चुका है—लेकिन अशोक सिंघल की विरासत को लेकर विमर्श अब भी जारी है।
और यही इस जन्मशती वर्ष का सबसे बड़ा संदेश है—किसी आंदोलन की कहानी उसके परिणाम पर खत्म नहीं होती;
उसकी विचारधारा, संगठन और सामाजिक स्मृति आगे भी अपना रास्ता बनाती रहती है।
एनएसके विशेष
