बी के झा
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बेगूसराय/नई दिल्ली, 27 सितंबर
प्रशासनिक व्यवस्था में जिलाधिकारी का पद केवल सरकारी अधिकारों का प्रतीक नहीं होता, बल्कि वह राज्य और आम नागरिक के बीच प्रशासनिक चेहरे के रूप में भी देखा जाता है। ऐसे में जब कोई वरिष्ठ अधिकारी अपने पद की औपचारिकता से बाहर निकलकर समाज और संस्कृति की किसी विभूति के प्रति सम्मान प्रकट करता है, तो वह दृश्य सामान्य प्रशासनिक तस्वीर से कहीं आगे चला जाता है।
बेगूसराय में 23 सितंबर को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जयंती के अवसर पर कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। राष्ट्रकवि की स्मृतियों से जुड़े सिमरिया में आयोजित कार्यक्रम के दौरान बेगूसराय के जिलाधिकारी रिची पांडेय ने दिनकर की पुत्रवधू के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया। यह तस्वीर सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा शुरू हो गई।
रिची पांडेय ने पहले राष्ट्रकवि दिनकर की तस्वीर पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसके बाद जब उनकी मुलाकात दिनकर परिवार की वरिष्ठ सदस्य से हुई तो उन्होंने झुककर उनके चरण स्पर्श किए। कैमरे में कैद यह क्षण तेजी से चर्चा का विषय बन गया।
बेगूसराय जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट भी रिची पांडेय को वर्तमान जिला पदाधिकारी-सह-समाहर्ता के रूप में दर्ज करती है।
पद की ऊंचाई से ज्यादा चर्चा में आया व्यवहार
IAS अधिकारी का पद अपने आप में प्रशासनिक अधिकार और जिम्मेदारी का बड़ा दायित्व है। लेकिन सिमरिया की इस तस्वीर में चर्चा अधिकार की नहीं, व्यवहार की हुई। एक तरफ जिलाधिकारी का संवैधानिक और प्रशासनिक पद है, दूसरी तरफ राष्ट्रकवि दिनकर की विरासत और उनके परिवार के प्रति सम्मान।
रिची पांडेय का चरण स्पर्श इसी सांस्कृतिक संदर्भ में लोगों के बीच चर्चा का विषय बना।इस दृश्य को केवल ‘पैर छूने’ की घटना के रूप में देखना शायद इसकी पूरी सामाजिक पृष्ठभूमि को नहीं समझ पाएगा।
बिहार जैसे राज्य में जहां साहित्य, लोकसंस्कृति, बुजुर्गों के सम्मान और सामाजिक संबंधों की परंपरा आज भी सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करती है, वहां किसी प्रशासनिक अधिकारी का ऐसा व्यवहार लोगों को स्वाभाविक रूप से आकर्षित करता है।
25 सितंबर को प्रकाशित एक रिपोर्ट में भी दिनकर जयंती से जुड़ी इसी तस्वीर को प्रमुखता से सामने रखा गया और इसे प्रशासनिक पद तथा संस्कार के मेल के रूप में देखा गया।
कौन हैं IAS रिची पांडेय?
रिची पांडेय बिहार कैडर के 2016 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उनका जन्म 14 फरवरी 1988 को हुआ। उन्होंने दिल्ली के संस्कृति स्कूल से शिक्षा प्राप्त करने के बाद तत्कालीन NSIT, अब नेताजी सुभाष यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने MBA भी किया।
IAS बनने से पहले उन्होंने निजी क्षेत्र में काम किया और Axis Bank से भी जुड़े रहे। इसके बाद UPSC सिविल सेवा परीक्षा में चयन के माध्यम से वह भारतीय प्रशासनिक सेवा में आए। उनके करियर में
महुआ SDM,
बेगूसराय DDC,
पटना में सहायक सचिव,
जहानाबाद DM और सीतामढ़ी DM जैसे दायित्व शामिल रहे हैं।
बेगूसराय से पहले भी रहा है पुराना रिश्ता
रिची पांडेय का बेगूसराय से यह पहला प्रशासनिक जुड़ाव नहीं है। वह पहले जिले में उप विकास आयुक्त यानी DDC के रूप में भी काम कर चुके हैं। इसलिए वर्ष 2026 में जब उन्हें दोबारा बेगूसराय का जिलाधिकारी बनाया गया तो प्रशासनिक हलकों में उनके पुराने अनुभव की भी चर्चा हुई।बिहार सरकार के अगस्त 2026 के प्रशासनिक फेरबदल के बाद उन्हें बेगूसराय का जिलाधिकारी बनाया गया।
सीतामढ़ी से स्थानांतरण के बाद उन्होंने अगस्त में बेगूसराय की जिम्मेदारी संभाली।वर्तमान में बेगूसराय जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उनका नाम जिलाधिकारी-सह-समाहर्ता के रूप में दर्ज है।
प्रशासन में सख्ती, सार्वजनिक व्यवहार में सहजता
रिची पांडेय की चर्चा केवल दिनकर जयंती की तस्वीर तक सीमित नहीं है। सीतामढ़ी के जिलाधिकारी रहते हुए उनके प्रशासनिक कामकाज को लेकर भी कई रिपोर्टें सामने आईं।अप्रैल 2026 में सीतामढ़ी महोत्सव के दौरान उन्होंने मंच से गीत भी प्रस्तुत किया था। इसी रिपोर्ट में उनके क्रिकेट प्रेम का भी उल्लेख है।
77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर जिला प्रशासन और बैंक ऑफ बड़ौदा की टीम के बीच हुए क्रिकेट मैच में उन्होंने 33 गेंदों पर 30 रन बनाए और दो विकेट लिए तथा उन्हें मैन ऑफ द मैच बताया गया।यह पहलू बताता है कि एक नौकरशाह की पहचान केवल फाइलों, बैठकों और सरकारी आदेशों तक सीमित नहीं होती।
सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके प्रशासनिक व्यवहार के साथ-साथ उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक भागीदारी से भी बनता है।
जमीन के रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण में मिला ‘भूमि सम्मान’
रिची पांडेय के प्रशासनिक करियर में भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण से जुड़ी उपलब्धि भी उल्लेखनीय है। जहानाबाद में उनके कार्यकाल के दौरान भूमि रिकॉर्ड के आधुनिकीकरण से जुड़े काम के लिए उन्हें ‘भूमि सम्मान’ से सम्मानित किया गया था।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 18 जुलाई 2023 को आयोजित ‘भूमि सम्मान 2023’ कार्यक्रम में डिजिटल माध्यम से भूमि रिकॉर्ड आधुनिकीकरण के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों और टीमों की सराहना की थी। राष्ट्रपति भवन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार इस कार्यक्रम का उद्देश्य भूमि रिकॉर्ड के कंप्यूटरीकरण और डिजिटलीकरण को प्रोत्साहित करना था।
सीतामढ़ी में जनशिकायत और डिजिटल प्रशासन पर जोर
सीतामढ़ी में उनके कार्यकाल के दौरान जिला प्रशासन ने जनशिकायतों के समाधान के लिए डिजिटल माध्यमों पर भी जोर दिया। रिपोर्टों के मुताबिक ‘जिला जन शिकायत निवारण प्रणाली’ पोर्टल शुरू किया गया था।
फरवरी 2026 में ‘सबका सम्मान-जीवन आसान’ कार्यक्रम के तहत हुई जनसुनवाई में भूमि विवाद, पेंशन, आवास योजना सहित नागरिकों की विभिन्न शिकायतें सुनी गईं और अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।
अगस्त 2026 में उनके कार्यकाल की विदाई के दौरान स्थानीय स्तर पर आयोजित कार्यक्रमों में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने उनके कार्यकाल को याद किया।
भ्रष्टाचार और लापरवाही पर कार्रवाई का रिकॉर्ड भी चर्चा में
सीतामढ़ी में जिला परिवहन कार्यालय से जुड़ी शिकायतों के बाद रिची पांडेय द्वारा औचक निरीक्षण और कार्रवाई की रिपोर्ट भी सामने आई थी। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, निरीक्षण के दौरान दो होमगार्ड कर्मियों को निलंबित किया गया और कार्यालय में दलालों के प्रवेश पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए।
यानी उनकी सार्वजनिक छवि के दो पहलू एक साथ दिखाई देते हैं—प्रशासनिक मामलों में सख्ती और व्यक्तिगत व्यवहार में सहजता।
‘अधिकारी और नागरिक के बीच की दूरी खत्म होनी चाहिए’
दरभंगा और मधुबनी क्षेत्र में समाजसेवा से जुड़े समाजसेवी राजेश कुमार सिंह उर्फ पप्पू भैया ने रिची पांडेय के इस व्यवहार की सराहना की।
उनका कहना है कि राष्ट्रकवि दिनकर की पुत्रवधू के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना इस बात का संकेत है कि एक बड़ा प्रशासनिक अधिकारी भी भारतीय सामाजिक संस्कारों से जुड़ा रह सकता है।
उन्होंने कहा कि रिची पांडेय ने बेगूसराय में प्रशासनिक जिम्मेदारी और सामाजिक दायित्व—दोनों को गंभीरता से निभाने का प्रयास किया है। उनके मुताबिक यदि प्रशासनिक अधिकारी आम नागरिकों के साथ सहज और सम्मानजनक व्यवहार रखें तो अधिकारी और जनता के बीच बनी दूरी कम हो सकती है।
पप्पू भैया ने बातचीत में दरभंगा और विशेष रूप से मधुबनी के जिलाधिकारी के कामकाज और व्यवहार की भी प्रशंसा की।
शिक्षाविदों और स्थानीय समाज के लिए तस्वीर का बड़ा संदेश
इस घटना का एक व्यापक सामाजिक पक्ष भी है। शिक्षाविदों के लिए यह दृश्य केवल एक अधिकारी के व्यक्तिगत व्यवहार का विषय नहीं, बल्कि नई पीढ़ी और सार्वजनिक जीवन के बीच संस्कारों के संबंध पर चर्चा का अवसर भी है।
आज प्रशासनिक पदों को अक्सर अधिकार, प्रोटोकॉल और सरकारी शक्ति के संदर्भ में देखा जाता है। ऐसे में किसी वरिष्ठ अधिकारी का साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़े परिवार के बुजुर्ग सदस्य के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना समाज में एक अलग संदेश पैदा करता है।
हालांकि किसी एक तस्वीर से पूरे प्रशासनिक कार्यकाल का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
प्रशासनिक अधिकारी की वास्तविक कसौटी कानून का पालन, जनसेवा, पारदर्शिता, शिकायतों का समाधान, विकास योजनाओं का क्रियान्वयन और नागरिकों के प्रति व्यवहार जैसे अनेक आयामों से तय होती है।
राजनीतिक विश्लेषण का कोण: बिहार की प्रशासनिक संस्कृति में ‘मानवीय चेहरा’राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषण के नजरिए से देखें तो बिहार में नौकरशाही और समाज के बीच संबंध हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं।
जिलाधिकारी किसी जिले में सरकार का सबसे प्रमुख प्रशासनिक चेहरा होता है। इसलिए उसके सार्वजनिक व्यवहार का प्रतीकात्मक महत्व भी होता है।
रिची पांडेय की तस्वीर इसी वजह से चर्चा में है। इसमें किसी राजनीतिक दल का संदेश नहीं, बल्कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति और समाज की सांस्कृतिक स्मृति के बीच एक दृश्यात्मक संवाद दिखाई देता है।
राष्ट्रकवि दिनकर केवल साहित्यिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। 23 सितंबर को बेगूसराय में आयोजित कार्यक्रमों में भी दिनकर की कविताओं के माध्यम से वर्तमान को समझने और भविष्य की कल्पना करने की बात सामने आई।
ऐसे में दिनकर की पुत्रवधू के चरण स्पर्श की तस्वीर का वायरल होना इस बात की ओर भी संकेत करता है कि आज के डिजिटल दौर में प्रशासनिक अधिकारियों का सार्वजनिक व्यवहार भी उतना ही तेजी से लोगों की नजर में आता है जितना उनके सरकारी फैसले।
दिनकर की धरती पर अधिकारी का एक छोटा-सा व्यवहार, बड़ा संदेश
सिमरिया की इस तस्वीर की सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यही है कि इसमें कोई बड़ा भाषण नहीं है। कोई सरकारी घोषणा नहीं है। कोई राजनीतिक मंच नहीं है।बस एक अधिकारी झुकता है और एक बुजुर्ग महिला का आशीर्वाद लेता है।
लेकिन सार्वजनिक जीवन में कई बार छोटे दृश्य बड़े संदेश छोड़ जाते हैं।
रिची पांडेय की यह तस्वीर इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसमें एक जिलाधिकारी के पद की औपचारिक ऊंचाई के सामने भारतीय पारिवारिक-सांस्कृतिक परंपरा का सहज भाव दिखाई देता है।और यही शायद इस तस्वीर की असली कहानी है—कुर्सी कितनी ऊंची है,
यह पद बताता है;
लेकिन व्यक्ति कितना बड़ा है, यह उसका व्यवहार बताता है।
बेगूसराय की धरती पर राष्ट्रकवि दिनकर की स्मृति के बीच रिची पांडेय का यह व्यवहार अब केवल एक वायरल तस्वीर नहीं, बल्कि प्रशासनिक जीवन में संवेदनशीलता, साहित्यिक विरासत के सम्मान और सार्वजनिक व्यवहार को लेकर चल रही चर्चा का हिस्सा बन चुका है।
एनएसके,
विशेष रिपोर्ट।
