बी के झा
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कोलकाता, 5 अक्टूबर
पश्चिम बंगाल की सत्ता बदलने के बाद अब राज्य की राजनीति केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं रहने वाली है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने रविवार को ऐसा ऐलान किया है, जिसने बंगाल की राजनीति के साथ-साथ देश की समान नागरिक संहिता यानी UCC की बहस को भी एक नए मोड़ पर ला दिया है।
कोलकाता में विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अध्यक्ष अशोक सिंघल की जन्मशती के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में छह महीने के भीतर UCC लागू करने की दिशा में कदम उठाया जाएगा। उन्होंने उत्तराखंड और गुजरात का उदाहरण देते हुए कहा कि बंगाल भी इसी दिशा में आगे बढ़ेगा। इसके साथ उन्होंने ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’ और धार्मिक धर्मांतरण के खिलाफ सख्त कानून लाने का भी ऐलान किया।
शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा कि उनकी सरकार संविधान के दायरे में काम करेगी, लेकिन भारतीय संस्कृति, सनातन परंपराओं, मंदिरों, मठों और विरासत पर हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।
छह महीने की समयसीमा ने बढ़ाई हलचल
UCC पर बंगाल सरकार पहले ही प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति गठित की है, जिसे प्रस्तावित UCC ड्राफ्ट की समीक्षा करनी है। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक प्रस्तावित कानून का दायरा विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों तक होगा।
यानी शुभेंदु अधिकारी का रविवार का ऐलान अचानक सामने आया कदम नहीं है। ड्राफ्ट, विशेषज्ञ समिति और राजनीतिक घोषणा—तीनों को जोड़ें तो बंगाल में UCC की जमीन पहले से तैयार की जा रही थी।
अब फर्क सिर्फ इतना है कि सरकार ने इसे छह महीने की स्पष्ट राजनीतिक समयसीमा से जोड़ दिया है।
UCC के बहाने बंगाल में बदलने जा रहा है पर्सनल लॉ का ढांचा?
UCC का मूल विचार यह है कि अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय नागरिक मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था हो।समर्थकों का तर्क है कि इससे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में कानून की समानता आएगी। विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों को लेकर समर्थक इसे महत्वपूर्ण सुधार मानते हैं।
दूसरी तरफ विरोध करने वाले पक्षों का सवाल है कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में समानता का अर्थ क्या सभी समुदायों की मौजूदा व्यक्तिगत कानून व्यवस्थाओं को एक ही ढांचे में समाहित करना होगा?
और यदि हां, तो उस प्रक्रिया में धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता की संवैधानिक सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?
यही वह संवैधानिक संतुलन है, जिसकी अंतिम परीक्षा किसी भी UCC कानून के लागू होने के बाद न्यायिक समीक्षा में भी हो सकती है।
‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ पर भी कानून—कहानी यहीं से और राजनीतिक होती है
शुभेंदु अधिकारी ने UCC के बाद ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’ और धार्मिक धर्मांतरण के खिलाफ सख्त कानून लाने की बात कही है।यहां सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल कानून बनाना नहीं होगी, बल्कि कानूनी परिभाषा तय करना होगी।
किस मामले को जबरन धर्मांतरण माना जाएगा?
किस परिस्थिति में जमीन का अधिग्रहण ‘लैंड जिहाद’ की श्रेणी में आएगा?
दो वयस्कों की सहमति से हुई अंतरधार्मिक शादी और कथित धोखाधड़ी या दबाव वाले मामले में कानून की सीमा कहां होगी?
कानूनविदों के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होंगे
किसी भी नए कानून की संवैधानिक वैधता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, संपत्ति संबंधी अधिकार और कानून के समक्ष समान संरक्षण जैसे संवैधानिक सिद्धांतों के साथ कितना संतुलित है।
VHP ने किया समर्थन, विपक्ष के लिए खुली नई राजनीतिक चुनौती
शुभेंदु अधिकारी ने यह घोषणा VHP के कार्यक्रम में की। VHP लंबे समय से समान नागरिक संहिता को समान अधिकारों और समान नागरिक कानून के दृष्टिकोण से समर्थन देता रहा है।समर्थक संगठनों का तर्क है कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण नागरिक अधिकारों में असमानता पैदा हो सकती है और एक समान नागरिक कानून महिलाओं को विशेष लाभ दे सकता है।
लेकिन विपक्ष के लिए यह मुद्दा केवल कानून का नहीं, बंगाल की सामाजिक संरचना और अल्पसंख्यक अधिकारों का भी है।TMC और अन्य विपक्षी दलों की ओर से इस घोषणा पर व्यापक राजनीतिक बहस की संभावना है।
विपक्ष के सामने दोहरे सवाल होंगे—क्या वह UCC के मूल सिद्धांत का विरोध करेगा या कानून के प्रस्तावित प्रावधानों पर आपत्ति दर्ज करेगा?
और क्या वह इसे नागरिक कानून सुधार के बजाय सांस्कृतिक-राजनीतिक एजेंडे के रूप में देखता है?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति की दिशा तय करने वाले प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकते हैं।
कानूनविदों की नजर में असली परीक्षा ‘समानता’ और ‘स्वतंत्रता’ के संतुलन की
कानूनी विशेषज्ञों के लिए UCC का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि उसका नाम क्या होगा, बल्कि यह है कि उसका वास्तविक कानूनी ढांचा कैसा होगा।यदि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के नियम समान किए जाते हैं तो उन्हें संविधान के मौलिक अधिकारों के साथ संतुलित करना होगा।
यही कारण है कि जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। राज्य सरकार ने इस समिति को प्रस्तावित ड्राफ्ट की व्यापक समीक्षा के लिए बनाया है।
छह महीने की राजनीतिक समयसीमा और विस्तृत कानूनी समीक्षा—इन दोनों के बीच संतुलन सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
शिक्षाविदों के लिए सवाल—क्या UCC सामाजिक सुधार बनेगा या राजनीतिक ध्रुवीकरण का मुद्दा?
शिक्षाविदों के नजरिए से UCC को केवल हिंदू बनाम मुस्लिम या भाजपा बनाम विपक्ष के चश्मे से देखना इस बहस को सीमित कर देगा। वास्तविक सवाल यह होना चाहिए कि प्रस्तावित कानून से महिला, बच्चा, पति-पत्नी, बुजुर्ग, उत्तराधिकारी और परिवार के कमजोर सदस्य के अधिकार कैसे बदलेंगे।यदि कोई नया कानून महिलाओं को समान उत्तराधिकार देता है, विवाह और तलाक में समान सुरक्षा सुनिश्चित करता है तथा बच्चों के अधिकारों को मजबूत करता है, तो उसका सामाजिक प्रभाव व्यापक हो सकता है।
लेकिन यदि कानून की भाषा अस्पष्ट रही या उसका इस्तेमाल किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया गया, तो सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
इसलिए शिक्षाविदों के लिए सबसे बड़ा सवाल है—UCC का मूल्यांकन नारे से होगा या उसके वास्तविक सामाजिक परिणामों से?
समाजसेवी संस्थाओं की संभावित चिंता—कानून सबके लिए समान हो
सामाजिक संगठनों की भूमिका यहां बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। महिला अधिकार समूह, बाल अधिकार संगठन, कानूनी सहायता संस्थाएं और अल्पसंख्यक प्रतिनिधि संगठनों को प्रस्तावित कानून के मसौदे का अध्ययन कर यह देखना होगा कि उसका प्रभाव समाज के अलग-अलग वर्गों पर क्या पड़ेगा।
एक मजबूत UCC वही माना जाएगा जिसकी प्रक्रिया में समानता के साथ-साथ सहमति, पारदर्शिता और कानूनी सुरक्षा भी हो।
बंगाल में BJP का बड़ा चुनावी वादा अब कानून की कसौटी पर
UCC BJP के 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के प्रमुख वादों में शामिल था। अब सत्ता में आने के बाद सरकार के सामने उस वादे को विधायी रूप देने की चुनौती है।
यानी अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि BJP ने चुनाव में क्या कहा था।सवाल यह है कि सरकार विधानसभा में क्या लेकर आती है?
ड्राफ्ट में क्या होगा?
किन समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव होगा?
महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकार कैसे तय होंगे?
बहुविवाह, तलाक, गोद लेने और विवाह पंजीकरण पर क्या नियम होंगे?
लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर क्या प्रावधान होंगे?
धर्मांतरण संबंधी कानून का UCC से क्या संबंध होगा?
इन सभी सवालों का उत्तर बिल सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
NSK विश्लेषण:
बंगाल में अब ‘UCC बनाम विरोध’ नहीं, ‘UCC का मॉडल क्या होगा’ असली सवाल
पश्चिम बंगाल में UCC का ऐलान केवल एक कानून की घोषणा नहीं है। यह राज्य की राजनीति में कानून, संस्कृति, धर्म, महिला अधिकार और पहचान की राजनीति—इन सभी को एक मंच पर ला रहा है।
शुभेंदु अधिकारी ने छह महीने का समय मांगा है। इसका अर्थ साफ है—सरकार इस मुद्दे को लंबी बहस में अनिश्चितकाल तक नहीं रखना चाहती।
लेकिन UCC जितना राजनीतिक मुद्दा है, उतना ही संवैधानिक भी।
सरकार के समर्थक इसे समान नागरिक अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं।
विरोधी पक्ष संभवतः इसे व्यक्तिगत कानून और अल्पसंख्यक अधिकारों के संदर्भ में चुनौती देगा।
कानूनविद इसकी संवैधानिकता, शिक्षाविद इसके सामाजिक प्रभाव और नागरिक संगठन इसके जमीनी परिणामों को परखेंगे।
और यहीं से बंगाल की असली परीक्षा शुरू होगी।क्योंकि समान नागरिक संहिता का अर्थ केवल ‘एक कानून’ नहीं है—सवाल यह है कि वह कानून नागरिकों को कितना समान, कितना सुरक्षित और कितना न्यायपूर्ण बनाता है।
यदि सरकार ऐसा कानून लाती है जो धर्म से ऊपर उठकर नागरिक अधिकारों की समान सुरक्षा सुनिश्चित करता है, तो उसके सामाजिक प्रभाव पर गंभीर बहस होगी।
लेकिन यदि कानून की भाषा राजनीतिक पहचान के संघर्ष में उलझती है, तो अदालत से लेकर सड़क तक इसकी संवैधानिक परीक्षा होना तय है।
छह महीने का वादा अब घड़ी की सुइयां चला चुका है।
अगली नजर बंगाल विधानसभा पर होगी—जहां यह घोषणा कानून के मसौदे में बदलेगी और तब तय होगा कि ‘UCC’ सिर्फ चुनावी वादा था या बंगाल की नागरिक व्यवस्था में वास्तविक बदलाव की शुरुआत।
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