बी.के. झा
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नई दिल्ली/ढाका 13 अगस्त
सितंबर में नई दिल्ली में प्रस्तावित BRICS शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र से पहले भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में कूटनीतिक तनाव गहराता दिखाई दे रहा है। बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने भारत से ‘हसीना कार्ड’ खेलना बंद करने की अपील करते हुए कहा कि यदि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारतीय भूमि से राजनीतिक गतिविधियां जारी रखने की अनुमति दी जाती है, तो दोनों देशों के मित्रतापूर्ण संबंध प्रभावित हो सकते हैं।उधर, बांग्लादेशी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान BRICS आउटरीच सत्र में शामिल नहीं हो सकते।
हालांकि ढाका सरकार ने अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक निर्णय घोषित नहीं किया है और विदेश मंत्रालय का कहना है कि यात्रा पर विचार जारी है।
विवाद की जड़ क्या है?
तनाव की मुख्य वजह शेख हसीना का दिल्ली से किया गया एक वर्चुअल सार्वजनिक कार्यक्रम माना जा रहा है। बांग्लादेश का आरोप है कि भारत की धरती से राजनीतिक बयानबाजी की अनुमति देना आपसी विश्वास और संप्रभुता की भावना के अनुरूप नहीं है।
सलाहुद्दीन अहमद ने कहा कि “भारत यदि बांग्लादेश के साथ स्थायी मित्रता चाहता है, तो उसे हसीना कार्ड की राजनीति से बचना होगा।” यह बयान दोनों देशों के संबंधों में बढ़ती संवेदनशीलता को दर्शाता है।
BRICS समिट क्यों है अहम?
12–13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र में सदस्य देशों के अलावा चुनिंदा गैर-सदस्य देशों और क्षेत्रीय संगठनों के नेताओं को भी आमंत्रित किया गया है। भारत ने BIMSTEC के अध्यक्ष के रूप में बांग्लादेश को निमंत्रण भेजा था।यदि तारिक रहमान इस मंच से दूरी बनाते हैं, तो इसे दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जाएगा।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों की टिप्पणी
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ढाका की तीखी भाषा केवल शेख हसीना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बांग्लादेश की बदलती विदेश नीति और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन का संकेत भी है।विश्लेषकों के अनुसार बांग्लादेश अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता प्रदर्शित करना चाहता है, जबकि भारत पड़ोसी देशों के साथ सुरक्षा, व्यापार और संपर्क आधारित स्थिर संबंधों को प्राथमिकता देता है। उनका कहना है कि यदि तारिक रहमान वास्तव में BRICS सम्मेलन से दूरी बनाते हैं, तो यह प्रतीकात्मक कूटनीतिक संदेश अवश्य होगा, लेकिन इससे दोनों देशों के दीर्घकालिक हित समाप्त नहीं हो जाते।
उनके शब्दों में— “कूटनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं, बल्कि स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं। भारत और बांग्लादेश के संबंधों की दिशा भी अंततः इसी सिद्धांत से तय होगी।”
शिक्षाविदों की राय
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिक्षाविदों का कहना है कि पड़ोसी देशों के बीच सार्वजनिक बयान कई बार घरेलू राजनीति से भी प्रभावित होते हैं। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक राजनयिक संवाद और सरकारों के औपचारिक निर्णय को महत्व देना चाहिए।
रक्षा विशेषज्ञों का दृष्टिकोण
सामरिक विशेषज्ञों के अनुसार भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग, समुद्री सुरक्षा और पूर्वोत्तर क्षेत्र की कनेक्टिविटी दोनों देशों के साझा हित हैं। उनका मानना है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सुरक्षा सहयोग को कमजोर करना किसी भी पक्ष के हित में नहीं होगा।
भारत सरकार और विपक्ष का रुख
अब तक भारत सरकार ने बांग्लादेशी गृह मंत्री के बयान या तारिक रहमान की संभावित अनुपस्थिति पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी नहीं की है। वहीं कांग्रेस, भाजपा अथवा अन्य विपक्षी दलों की ओर से भी इस विषय पर कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है।
आगे क्या?
अब सभी निगाहें सितंबर में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन पर टिकी हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या बांग्लादेश के प्रधानमंत्री दिल्ली पहुंचेंगे या हालिया कूटनीतिक तनाव सम्मेलन के मंच पर भी दिखाई देगा। इसका अंतिम उत्तर दोनों देशों की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा।
निष्कर्ष:
भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं हैं; व्यापार, ऊर्जा, जल, सीमा प्रबंधन और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे अनेक साझा हित इन्हें जोड़ते हैं। इसलिए मौजूदा तल्खी के बीच भी संवाद ही दोनों देशों के रिश्तों की सबसे बड़ी ताकत बनी रहेगी।
