बिहार की शराबबंदी पर फिर गरमाई सियासत: आनंद मोहन ने बताया ‘फेल’, बोले— पुनर्विचार का समय आ गया है

बी के झा

NSK news Ind

पटना, 14 अगस्त

बिहार में एक दशक से लागू शराबबंदी कानून एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। पूर्व सांसद आनंद मोहन ने गया में मीडिया से बातचीत करते हुए शराबबंदी को “असफल” बताते हुए कहा कि जब बिहार से सटे नेपाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में शराबबंदी नहीं है, तब अकेले बिहार में इस कानून का प्रभावी क्रियान्वयन बेहद कठिन हो जाता है।उन्होंने कहा कि शराबबंदी के समानांतर एक अवैध अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है, जिसका असर पंचायत से लेकर विधानसभा और राजनीति तक दिखाई देता है। आनंद मोहन ने सरकार से कानून की गंभीर समीक्षा करने की मांग की।

“अगर कल किसान बगावत पर उतरें…

”आनंद मोहन ने हाल में बढ़े भूमि निबंधन शुल्क का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति बेटी की शादी या पिता के श्राद्ध के लिए जमीन बेचना चाहे तो तीन गुना दर बढ़ने से खरीदार मिलना मुश्किल हो गया है। उनके अनुसार यदि किसानों पर लगातार आर्थिक बोझ बढ़ा तो भविष्य में व्यापक असंतोष पैदा हो सकता है, इसलिए सरकार को शराबबंदी सहित आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए।

सरकार का स्पष्ट रुख

हालांकि बिहार सरकार शराबबंदी कानून पर पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रही है। मद्य निषेध मंत्री मदन सहनी ने हाल ही में कहा कि दूसरे राज्यों से बिहार में आने वाली विदेशी शराब पर रोक लगाने के लिए संबंधित ब्रांड कंपनियों तक के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की जाएगी। सरकार का दावा है कि शराबबंदी महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा में कमी और सामाजिक सुधार के उद्देश्य से लागू की गई थी तथा इसे हर हाल में जारी रखा जाएगा।एनडीए के नेताओं का भी कहना है कि कानून में कमियां हो सकती हैं, लेकिन शराबबंदी की मूल भावना से कोई समझौता नहीं होगा।

विपक्ष ने साधा निशाना

राजद, कांग्रेस और वाम दल लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि शराबबंदी व्यवहारिक रूप से विफल हो चुकी है। विपक्ष का कहना है कि राज्य में अवैध शराब का कारोबार फल-फूल रहा है, जबकि गरीब और निर्दोष लोग अधिक कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। विपक्ष समीक्षा समिति बनाकर कानून में व्यापक संशोधन की मांग कर रहा है।

समाजसेवी का बड़ा दावा

एक वरिष्ठ समाजसेवी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कहा कि आनंद मोहन ने वही बात दोहराई है जो वर्षों से बिहार का आम नागरिक कहता आया है।उनका कहना था कि “शराबबंदी आज कागजों पर अधिक और जमीन पर कम दिखाई देती है। अवैध कारोबार से कुछ भ्रष्ट तत्वों, माफिया नेटवर्क और प्रशासनिक मिलीभगत को लाभ मिलता है, जबकि सबसे अधिक नुकसान गरीब परिवारों और निर्दोष नागरिकों को उठाना पड़ता है।

”उन्होंने सरकार से निष्पक्ष सामाजिक ऑडिट कराने और कानून के वास्तविक प्रभाव का सार्वजनिक मूल्यांकन कराने की मांग की।

कानूनविदों की राय

संवैधानिक मामलों के जानकार अधिवक्ताओं का मानना है कि किसी भी कानून की सफलता केवल कठोर दंड से नहीं, बल्कि प्रभावी प्रवर्तन और पड़ोसी राज्यों के समन्वय से तय होती है। उनके अनुसार बिहार की खुली सीमाएं शराब तस्करी की सबसे बड़ी चुनौती हैं। ऐसे में अंतरराज्यीय समन्वय, खुफिया निगरानी और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत किए बिना पूर्ण सफलता कठिन होगी।

शिक्षाविदों का दृष्टिकोण

शिक्षाविदों का मानना है कि शराबबंदी को केवल कानून नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार अभियान के रूप में देखना होगा। यदि नशा मुक्ति, रोजगार, जनजागरूकता और पुनर्वास पर समानांतर निवेश नहीं किया गया तो प्रतिबंध का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषण: चुनावी मुद्दा बनने की आहट

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार शराबबंदी बिहार की सबसे संवेदनशील नीतियों में से एक है। महिलाओं का बड़ा वर्ग इसे सामाजिक सुरक्षा का माध्यम मानता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध कारोबार, गिरफ्तारी और आर्थिक प्रभाव को लेकर असंतोष भी मौजूद है।

आनंद मोहन का बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में कानून को “फेल” बताते हुए पुनर्विचार की मांग की है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि आने वाले समय में शराबबंदी केवल कानून नहीं, बल्कि बिहार की चुनावी राजनीति का प्रमुख विमर्श भी बन सकती है।

फिलहाल सरकार अपने रुख पर अडिग है, विपक्ष समीक्षा की मांग कर रहा है और जनता के बीच यह बहस पहले से कहीं अधिक तेज होती दिखाई दे रही है।

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