विधायक पर गिरफ्तारी की तलवार: जमीन, रंगदारी और जालसाजी के आरोपों ने बिहार की सियासत को फिर कठघरे में खड़ा किया

बी. के. झा

NSK news Ind

मुजफ्फरपुर/पटना, 26 अगस्त

जमीन पर कब्जे के लिए ‘बॉस’ का नाम, जेसीबी से मकान-बाउंड्री तोड़ने का आरोप, 25 एफआईआर, आठ मामलों में विधायक नामजद; पुलिस ने कोर्ट से गिरफ्तारी वारंट मांगा—क्या यह महज जमीन विवाद है या बिहार में राजनीति, बाहुबल और प्रॉपर्टी कारोबार के गठजोड़ का नया चेहरा?

बिहार की राजनीति में एक बार फिर सत्ता, संगठन और बाहुबल के रिश्ते पर सवाल खड़े हो गए हैं। सीतामढ़ी के बेलसंड से लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के विधायक अमित कुमार रानू के खिलाफ मुजफ्फरपुर पुलिस ने रंगदारी, जमीन कब्जे और जालसाजी से जुड़े मामलों में कार्रवाई तेज कर दी है।

पुलिस का दावा है कि विधायक और उनके भाई सोनू सिंह के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मिले हैं और दोनों की गिरफ्तारी के लिए न्यायालय से वारंट लेने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी गिरफ्तारी हुई नहीं है और आरोप अदालत में सिद्ध नहीं हुए हैं। पुलिस के आरोपों और बरामदगी को न्यायिक प्रक्रिया की कसौटी पर परखा जाना बाकी है। विधायक अमित रानू ने पहले पुलिस कार्रवाई को राजनीतिक साजिश बताते हुए आरोपों को निराधार कहा है।

25 मुकदमे, आठ में विधायक नामजद

मुजफ्फरपुर के एसएसपी कांतेश कुमार मिश्रा के मुताबिक, झपहां-उदनडीह जमीन प्रकरण में मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी में अब तक 25 प्राथमिकी दर्ज हो चुकी हैं। इनमें आठ मामलों में विधायक अमित कुमार रानू और उनके भाई अभिनव उर्फ सोनू सिंह नामजद हैं। पुलिस का कहना है कि अदालत में वीडियो फुटेज सहित अन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए जाएंगे।पुलिस के अनुसार, झपहां में जमीन पर कब्जे के कथित प्रयास के दौरान विधायक के भाई के साथ बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे।

घटनास्थल के वीडियो के आधार पर वाहनों और लोगों की पहचान की जा रही है। पीड़ितों ने पुलिस को बताया है कि उनसे कथित तौर पर कहा गया कि वहां रहने या मकान बनाने के लिए ‘बॉस’ को रुपये देने होंगे। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कथित ‘बॉस’ से किसकी ओर इशारा था।यही वह बिंदु है जिसने पूरे मामले को साधारण जमीन विवाद से निकालकर कथित संगठित दबाव और प्रोटेक्शन गैंग की जांच के दायरे में ला दिया है।

विधायक के घर से मिले दस्तावेज, पुलिस की नजर जालसाजी पर

पुलिस का दावा है कि विधायक के आवास की तलाशी में हस्ताक्षरित ब्लैंक स्टांप पेपर और साझेदारी से जुड़े दस्तावेज मिले हैं। पुलिस इन दस्तावेजों की जांच के आधार पर जालसाजी की अलग प्राथमिकी की बात कर रही है। साथ ही संपत्ति की जांच और आर्थिक अपराध इकाई को प्रस्ताव भेजने की तैयारी की जा रही है।

हालांकि कानूनविदों के लिए यहां एक बुनियादी सवाल है—किसी दस्तावेज का घर से बरामद होना अपने आप में जालसाजी सिद्ध नहीं करता। दस्तावेज किसने तैयार किया, किस उद्देश्य से किया, हस्ताक्षर किसके हैं, उनका इस्तेमाल कहां हुआ और उससे किसी को आर्थिक या कानूनी नुकसान हुआ या नहीं—इन सभी बिंदुओं की फोरेंसिक और न्यायिक जांच जरूरी होगी। यानी पुलिस के पास साक्ष्य होने का दावा महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम सत्य अदालत की जांच से ही सामने आएगा।

कानून के नजरिए से सबसे अहम सवाल

कानून विशेषज्ञों के अनुसार, किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि पर आरोप लगना अपने आप में उसकी दोषसिद्धि नहीं है। लेकिन यदि पुलिस के पास प्रथमदृष्टया पर्याप्त साक्ष्य हैं तो विधायक होने के कारण जांच रोकना भी कानून के शासन के खिलाफ होगा।इस पूरे मामले की असली परीक्षा दो मोर्चों पर होगी—पुलिस निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता।अगर आरोप सही हैं तो राजनीतिक प्रभाव की परवाह किए बिना कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि आरोप राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित हैं तो अदालत में वही बात साक्ष्यों के साथ साबित करने का अधिकार आरोपी को मिलना चाहिए।

यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत है—

न नेता कानून से ऊपर और न पुलिस कानून से बाहर।बिहार के लिए जमीन माफिया सिर्फ अपराध नहीं, सामाजिक संकट भी

शिक्षाविदों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि बिहार में जमीन का विवाद केवल राजस्व या दीवानी विवाद नहीं रह गया है। जमीन की बढ़ती कीमत, शहरी विस्तार, कमजोर वर्गों की कानूनी जानकारी की कमी और स्थानीय प्रभावशाली लोगों का दबाव कई इलाकों में सामाजिक तनाव को जन्म देता है।अगर किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार को वर्षों की कमाई से खरीदी जमीन पर कब्जे का डर हो, तो यह केवल उसकी संपत्ति का सवाल नहीं रहता। यह राज्य की कानून-व्यवस्था में उसके भरोसे का सवाल बन जाता है।इसीलिए झपहां मामले की जांच का महत्व सिर्फ एक विधायक या एक जमीन तक सीमित नहीं है।

यह सवाल भी सामने है कि बिहार में जमीन के विवादों को निपटाने के लिए प्रशासनिक तंत्र कितना सक्षम है और आम आदमी को अदालत जाने से पहले सुरक्षा कौन देता है?

राजनीतिक संदेश भी उतना ही बड़ा

यह मामला चिराग पासवान की राजनीति के लिए भी असहज सवाल खड़ा करता है। लोजपा (रामविलास) लंबे समय से बिहार में नई राजनीतिक संस्कृति, युवा नेतृत्व और विकास की राजनीति का दावा करती रही है। ऐसे में पार्टी के एक मौजूदा विधायक के खिलाफ जमीन, रंगदारी और जालसाजी जैसे गंभीर आरोप पार्टी के लिए राजनीतिक जवाबदेही की परीक्षा बन गए हैं।

हालांकि अभी तक सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई विश्वसनीय बयान सामने नहीं आया है जिसमें पार्टी नेतृत्व ने विधायक को दोषी मान लिया हो। इसलिए राजनीतिक निष्कर्ष निकालने से पहले जांच और न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार करना जरूरी है।लेकिन राजनीति का एक सामान्य सिद्धांत जरूर लागू होता है

नेता अपने समर्थकों के कृत्यों के लिए हर मामले में कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं होता, लेकिन संगठन अपने लोगों के आचरण पर राजनीतिक जवाबदेही से बच नहीं सकता।

विपक्ष के लिए भी दोधारी तलवार

विपक्ष इस कार्रवाई को सरकार के ‘सुशासन’ के प्रमाण के तौर पर भी पेश कर सकता है और सत्ता के गठबंधन में शामिल दल के विधायक पर कार्रवाई के राजनीतिक अर्थ भी तलाश सकता है।लेकिन विपक्ष के सामने भी चुनौती है। यदि वह केवल इसलिए कार्रवाई का विरोध करता है कि आरोपी सत्ता पक्ष के सहयोगी दल का विधायक है, तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठेंगे। और यदि वह बिना न्यायिक निष्कर्ष के विधायक को दोषी घोषित करता है, तो वही विपक्ष न्यायिक प्रक्रिया की मर्यादा पर सवालों के घेरे में आ सकता है।

इसलिए विपक्ष के लिए सबसे मजबूत राजनीतिक रुख यही हो सकता है—जांच निष्पक्ष हो, केस की निगरानी हो, पीड़ितों को सुरक्षा मिले और दोषी कोई भी हो, कार्रवाई हो।

क्या पुलिस की कार्रवाई बिहार में नई मिसाल बनेगी?

मुजफ्फरपुर पुलिस की कार्रवाई ने एक महत्वपूर्ण संदेश जरूर दिया है। पुलिस ने निर्वाचित प्रतिनिधि के घर तक पहुंचकर तलाशी ली और अब अदालत से गिरफ्तारी वारंट की प्रक्रिया की बात कही है। इससे यह संकेत जाता है कि कम से कम इस मामले में पुलिस राजनीतिक हैसियत के बजाय केस डायरी और साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ने का दावा कर रही है।लेकिन इस कार्रवाई को वास्तव में मिसाल तभी कहा जाएगा जब आगे की पूरी प्रक्रिया भी उतनी ही निष्पक्ष रहे।सिर्फ छापेमारी से कानून का राज स्थापित नहीं होता। निष्पक्ष जांच, समयबद्ध चार्जशीट, पीड़ितों की सुरक्षा, गवाहों का संरक्षण और अदालत में ठोस साक्ष्य—इन पांच कसौटियों पर ही पुलिस की सफलता तय होगी।

पुलिस पर भी उठे सवाल, निष्पक्षता की परीक्षा यहीं है

इस मामले का दूसरा पहलू भी सामने आया है। विधायक के भाई की तलाश में पुलिस द्वारा की गई एक छापेमारी के बाद भिखनपुरा निवासी संतोष कुमार ने पुलिस टीम पर जबरन प्रवेश, तोड़फोड़, गाली-गलौज और धमकी के आरोप लगाते हुए अदालत में परिवाद दायर किया है।इस आरोप की भी स्वतंत्र जांच जरूरी है।

कानून का राज तभी मजबूत होगा जब पुलिस अपराध के आरोपियों पर सख्ती करे और पुलिस पर लगे आरोपों की भी उसी निष्पक्षता से जांच हो।यही लोकतंत्र और पुलिस राज्य के बीच का अंतर है।

वरिष्ठ शिक्षक की टिप्पणी—’ऐसे अधिकारी और हों तो बदलेगा बिहार’

एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त शिक्षक ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि यदि बिहार में आधा दर्जन अधिकारी भी राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर कानून के अनुसार काम करें तो राज्य की तस्वीर बदल सकती है। उनके अनुसार, जमीन विवाद में आम आदमी सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस करता है और जब प्रभावशाली लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई होती दिखाई देती है तो जनता का प्रशासन पर भरोसा बढ़ता है।

हालांकि उनका यह आकलन एक व्यक्तिगत राय है और इसे किसी स्वतंत्र सर्वेक्षण या विशेषज्ञ अध्ययन का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

सबसे बड़ा सवाल: क्या राजनीति का अपराधीकरण रुकेगा?

बिहार ने बाहुबली राजनीति का लंबा दौर देखा है। समय बदला, दल बदले, चेहरे बदले, लेकिन जमीन और ठेके से लेकर स्थानीय वर्चस्व तक राजनीति और अपराध के रिश्ते की चर्चा खत्म नहीं हुई।आज चुनौती सिर्फ यह नहीं कि अमित रानू गिरफ्तार होंगे या नहीं।

बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार की राजनीति ऐसी व्यवस्था बना पाएगी जिसमें किसी दल का झंडा जमीन कब्जाने का सुरक्षा कवच न बने?

क्या विधायक, सांसद या मंत्री का करीबी होना किसी व्यक्ति को प्रशासनिक कार्रवाई से बचा सकेगा?

क्या थाने में आम नागरिक की शिकायत उसी गंभीरता से सुनी जाएगी जिस गंभीरता से किसी प्रभावशाली व्यक्ति की शिकायत सुनी जाती है?

और सबसे अहम—क्या राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लगे गंभीर आपराधिक आरोपों पर भी वही शून्य-सहनशीलता दिखाएंगे, जिसका दावा वे मंचों से करते हैं?

निष्कर्ष:

असली ताकत पद नहीं, कानून है

अमित कुमार रानू प्रकरण अभी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के चरण में है। इसलिए न पुलिस के आरोपों को अंतिम सत्य माना जा सकता है और न विधायक के बचाव को अंतिम निष्कर्ष।

लेकिन इस मामले ने बिहार के सामने एक पुराना और बेहद गंभीर प्रश्न फिर खड़ा कर दिया है—राजनीति जनता की सेवा का माध्यम है या प्रभाव और संरक्षण का साधन?

यदि पुलिस के आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल एक विधायक की कानूनी मुश्किल नहीं होगी, बल्कि राजनीतिक दलों के लिए आत्ममंथन का विषय होगा।

और यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो पुलिस की जवाबदेही भी उतनी ही कठोरता से तय होनी चाहिए।

कानून का राज तभी स्थापित होगा जब उसका डंडा गरीब की झोपड़ी और सत्ता के गलियारे—दोनों पर बराबर चले।बिहार को बाहुबली नहीं, मजबूत संस्थाएं चाहिए।

और मजबूत संस्था वही है जो यह कह सके—कानून के सामने न कोई छोटा है, न बड़ा।

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