बी के झा
NSK news Ind




नई दिल्ली , 13 अगस्त
लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर कहे जाने वाले संसद भवन में मानसून सत्र का समापन जिस माहौल में हुआ, उसने भारतीय राजनीति के सामने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। लगभग पूरे सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव, नारेबाज़ी और व्यवधान का ऐसा सिलसिला चला कि निर्धारित कार्यवाही का बड़ा हिस्सा हंगामे की भेंट चढ़ गया। विपक्ष इसे सरकार पर दबाव बनाने की राजनीतिक जीत बता रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि लोकतांत्रिक विमर्श की सबसे बड़ी हार स्वयं विपक्ष और देश की जनता की हुई है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार, लगातार विरोध के बावजूद सरकार ने 12 महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराए। उनका कहना था कि संसद बहस, जवाबदेही और जनहित के मुद्दों पर चर्चा का मंच है, लेकिन दुर्भाग्य से इस बार बहुमूल्य समय शोर-शराबे में नष्ट हो गया।
आखिरी दिन भी नहीं थमा टकराव
सत्र के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित एनडीए के कई वरिष्ठ नेता सदन में उपस्थित रहे। सुबह 11 बजे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के पहुंचते ही विपक्षी सांसदों ने नारेबाज़ी शुरू कर दी। लगभग एक मिनट तक चले विरोध के बाद पूरा सदन वंदे मातरम् के गायन के लिए खड़ा हुआ। तीन मिनट से कुछ अधिक समय में राष्ट्रगीत के छह छंद गूंजे और उसके तुरंत बाद लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई।
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री केवल वंदे मातरम् गाने के लिए सदन में आए। उनका कहना था कि यदि सरकार पहले विपक्ष की मांगों पर बयान देती तो इतना गतिरोध पैदा नहीं होता।
संसद परिसर में ‘मंकी टॉय’ प्रदर्शन बना सबसे बड़ा विवाद
कार्यवाही शुरू होने से पहले संसद परिसर में कांग्रेस सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया। राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा के हाथ में बंदर का खिलौना था और कई अन्य सांसद भी उसी प्रतीक के साथ पहुंचे। समाजवादी पार्टी के कुछ सांसद भी प्रदर्शन में शामिल हुए। लगभग पंद्रह मिनट तक चले इस प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे लगाए गए।भाजपा ने इसे संसद की गरिमा और लोकतांत्रिक मर्यादा पर सीधा आघात बताया।
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि इस प्रकार के प्रदर्शन केवल राजनीतिक नेतृत्व को खुश करने की कोशिश हैं, जबकि वरिष्ठ भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने राहुल गांधी को “अपरिपक्व, अनुशासनहीन, उद्दंड और अहंकारी” बताते हुए कहा कि विपक्ष के नेता होने के नाते उन्हें संसदीय परंपराओं का सम्मान करना चाहिए।
राहुल गांधी का पलटवार: “हमने मोदी और शाह की नींद उड़ा दी”
शाम को कांग्रेस के ‘रचनात्मक सम्मेलन’ में राहुल गांधी ने अपने भाषण से राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि विपक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी की नींद उड़ा दी है और अमित शाह पर इतना दबाव बना दिया है कि वे संसद में आने की हिम्मत नहीं कर पा रहे।राहुल गांधी ने यह भी कहा कि जब तक प्रधानमंत्री इस्तीफा नहीं देते और अमित शाह की कुर्सी नहीं जाती, तब तक उन्हें चैन से सोने नहीं दिया जाएगा। उनके इस बयान के बाद सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर शुरू हो गया।
कांग्रेस के भीतर से भी उठी असहमति की आवाज
दिलचस्प तथ्य यह रहा कि राहुल गांधी और पवन खेड़ा के प्रदर्शन पर कांग्रेस के भीतर से भी सवाल उठे। वरिष्ठ कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने स्पष्ट कहा कि लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध की भी एक न्यूनतम मर्यादा होती है। उन्होंने कहा कि वे इस प्रकार के प्रदर्शन से सहमत नहीं हैं और अपनी राय पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व के सामने रखेंगे।
114 घंटे का सत्र, बहस से ज्यादा हंगामा
संसदीय आंकड़ों के अनुसार दोनों सदनों में लगभग 114 घंटे कार्यवाही निर्धारित थी। लोकसभा में 96 घंटे से अधिक समय व्यवधान में चला गया, जबकि राज्यसभा में भी लगभग 77 घंटे विरोध और नारेबाज़ी से प्रभावित रहे।सरकार का तर्क है कि जिन विधेयकों पर विपक्ष लंबी बहस करना चाहता था, उन्हीं पर चर्चा का अवसर उसने स्वयं गंवा दिया। प्रश्नकाल, शून्यकाल और क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने का अवसर भी कई सांसदों के हाथ से निकल गया।
राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रिया:
“लोकतंत्र में विरोध ज़रूरी, लेकिन संवाद उससे भी ज़्यादा”वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद केवल सरकार को घेरने का मंच नहीं बल्कि राष्ट्र की नीतियों को दिशा देने वाला सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान है। उनके अनुसार यदि विपक्ष बहस छोड़कर केवल व्यवधान की राजनीति करता है तो अंततः जनता का पक्ष कमजोर पड़ता है। वहीं सरकार की भी जिम्मेदारी है कि संवेदनशील मुद्दों पर संवाद और जवाबदेही से पीछे न हटे।विश्लेषकों का कहना है कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति शोर में नहीं, बल्कि तथ्यों, तर्कों और संसदीय बहस में दिखाई देती है।
शिक्षाविद की मार्मिक और तीखी टिप्पणी
एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर राहुल गांधी तथा उनके सहयोगी दलों के सांसदों द्वारा संसद परिसर में किए गए प्रदर्शन पर अत्यंत कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
उन्होंने कहा—“आज संसद से लेकर संसद परिसर में बंदरों को लेकर अपने और अपने सहयोगी राजनीतिक दलों के सांसदों के साथ मिलकर राहुल गांधी ने जिस तरह का माखौल उड़ाया है, वह भारतीय राजनीतिक इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज हो गया।
” उन्होंने आगे कहा— “प्रतिपक्ष के नेता होते हुए भी राहुल गांधी को इतना भी समझ नहीं है कि देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए कौन सा शब्द का प्रयोग करना चाहिए।” शिक्षाविद यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि भारतीय लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन की व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कार, शिष्टाचार और संवैधानिक मर्यादाओं की भी परंपरा है।
उनके शब्दों में— “भारत की आम जनता अपने संस्कारों से पूरी दुनिया में जानी जाती है, न कि उद्दंड भाषा बोलने वाले नेताओं के समर्थन से। चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल का समर्थक क्यों न हो, वह ऐसे प्रतिनिधि को संसद भेजना पसंद नहीं करेगा जो अपनी ओछी भाषा से पूरी दुनिया में देश को शर्मशार करे।”
उन्होंने यह भी कहा कि यदि राजनीति व्यक्तिगत उपहास और प्रतीकों के माध्यम से विरोध की दिशा में आगे बढ़ती रही, तो लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता कमजोर होगी। उनका मत था कि जनता अंततः नेताओं को उनके आचरण, भाषा और संसदीय व्यवहार के आधार पर भी परखती है।
समाजसेवी संस्थाओं ने भी जताई चिंता
कई समाजसेवी संस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों पर कार्य करने वाले संगठनों ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि विरोध लोकतंत्र का प्राण है, लेकिन विरोध और उपहास के बीच की रेखा कभी नहीं मिटनी चाहिए। संस्थाओं ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि संसद परिसर को प्रतीकात्मक अपमान और व्यक्तिगत कटाक्ष का मंच बनाने के बजाय जनहित के मुद्दों पर सार्थक बहस को प्राथमिकता दें।
निष्कर्ष:
जीत का दावा, लेकिन लोकतंत्र ने क्या खोया?राहुल गांधी इस सत्र को विपक्ष की रणनीतिक सफलता बता रहे हैं। भाजपा इसे विपक्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल कह रही है।
किंतु सबसे बड़ा प्रश्न आज भी वही है—जब संसद चल नहीं पाती, प्रश्नकाल बाधित होता है, विधेयकों पर गंभीर चर्चा नहीं होती और जनता की आवाज शोर में दब जाती है, तब वास्तविक हार किसकी होती है?
शायद यही प्रश्न इस मानसून सत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत बनकर इतिहास में दर्ज रहेगा।
