बी के झा
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रियाद, 19 सितंबर
सऊदी अरब ने जिस भविष्य का सपना देखा है, उसकी नींव सिर्फ तेल की दौलत पर नहीं, बल्कि स्थिरता, सुरक्षा, तकनीक, निवेश और वैश्विक भरोसे पर रखी गई है। लेकिन मध्य-पूर्व में तेजी से बदलता सुरक्षा समीकरण अब इसी मॉडल की सबसे कठिन परीक्षा ले रहा है।अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) एचआर मैकमास्टर ने सऊदी अरब और पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका आकलन है कि क्षेत्रीय अस्थिरता अगर लंबी चली तो इसका सीधा असर सऊदी अरब के महत्वाकांक्षी Vision 2030 पर पड़ सकता है।और अब यह चिंता केवल रणनीतिक चर्चाओं तक सीमित नहीं है।
मक्का के आसमान तक पहुंचा तनाव
सितंबर में सऊदी अरब ने दावा किया कि उसकी वायु रक्षा ने मक्का की ओर बढ़ रहे एक हूती ड्रोन को रोककर नष्ट कर दिया। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने दो पवित्र मस्जिदों और जायरीनों की सुरक्षा को ‘रेड लाइन’ बताया। हालांकि हूती नेतृत्व ने मक्का को निशाना बनाने के आरोप से इनकार किया और सऊदी दावे को खारिज किया।यानी घटना को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग हैं, लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है—सऊदी अरब के लिए सुरक्षा वातावरण बेहद तनावपूर्ण हो चुका है।
रॉयटर्स के मुताबिक 18 सितंबर को सऊदी नागरिक सुरक्षा अधिकारियों ने जेद्दा और ताइफ समेत कई इलाकों में संभावित खतरे को लेकर अलर्ट जारी किए।मक्का जैसे धार्मिक रूप से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र तक सुरक्षा अलर्ट पहुंचना रियाद के लिए केवल सैन्य चुनौती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और धार्मिक सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न भी है।
मैकमास्टर ने उठाया सबसे असहज सवाल
मैकमास्टर की चिंता का केंद्र यही है कि अगर सऊदी अरब खुद को दुनिया का वित्तीय, तकनीकी और AI केंद्र बनाना चाहता है, तो निवेशकों को सबसे पहले सुरक्षा का भरोसा चाहिए।उनके मुताबिक सवाल यह है कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पीछे मुड़कर देखें तो उन्हें अपने देश की सुरक्षा के लिए किस पर भरोसा दिखाई देगा?
यही वह सवाल है जिसने सऊदी की विदेश और रक्षा नीति के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।सऊदी अरब ने मिस्र, तुर्किये और पाकिस्तान के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया है। पाकिस्तान के साथ हाल में सुरक्षा सहयोग भी बढ़ा है। लेकिन सामूहिक सुरक्षा समझौतों की वास्तविक उपयोगिता संकट की स्थिति में उनके लागू होने की क्षमता से तय होगी।
अमेरिका पर भरोसा या आत्मनिर्भर सुरक्षा?
सऊदी अरब की रणनीतिक दुविधा का सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका से जुड़ा है।दशकों से वॉशिंगटन सऊदी सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। लेकिन अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल रही हैं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति में सहयोगी देशों से अपनी सुरक्षा में अधिक योगदान की अपेक्षा का तत्व दिखाई देता है।मैकमास्टर के अनुसार रियाद के सामने यही अनिश्चितता है—क्या संकट की अंतिम घड़ी में अमेरिका उसी स्तर पर सैन्य सुरक्षा देगा, जिसकी उम्मीद सऊदी नेतृत्व करता आया है?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब एक साथ दो बड़े परिवर्तन कर रहा है—एक तरफ अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालना और दूसरी तरफ अपनी सुरक्षा व्यवस्था को अधिक बहुस्तरीय बनाना।
ईरान और हूती फैक्टर ने बढ़ाई मुश्किल
यमन में हूती आंदोलन सऊदी अरब के लिए लंबे समय से सुरक्षा चुनौती रहा है। लेकिन मौजूदा संघर्ष में यह चुनौती फिर गंभीर होती दिखाई दे रही है।हालिया रिपोर्टों के मुताबिक हूती हमलों ने सऊदी शहरों और ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया है। यमन के पश्चिमी तट और बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में हूतियों की स्थिति मजबूत होने से समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भी चिंता बढ़ी है।यहीं से संकट का दूसरा आयाम सामने आता है।सऊदी अरब के लिए युद्ध सिर्फ सीमा की सुरक्षा का सवाल नहीं रह गया है; यह तेल, समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और निवेश के भरोसे का सवाल बन सकता है।
मैकमास्टर का आरोप है कि ईरान खाड़ी देशों की सुरक्षा संबंधी आशंकाओं का इस्तेमाल उनके बीच विभाजन पैदा करने के लिए कर सकता है। यह उनका रणनीतिक आकलन है, जबकि ईरान और हूती पक्ष अपनी कार्रवाई की अलग-अलग व्याख्या करते रहे हैं।
Vision 2030 के लिए सुरक्षा क्यों जरूरी?
सऊदी Vision 2030 का लक्ष्य अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से निकालकर पर्यटन, वित्त, लॉजिस्टिक्स, तकनीक, डेटा और AI जैसे क्षेत्रों में विस्तारित करना है।सऊदी सरकार के अनुसार डेटा और AI Vision 2030 के 96 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष उद्देश्यों में से 66 से जुड़े हुए हैं।सऊदी अरब ने डिजिटल बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश भी किया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2026 की पहली तिमाही तक देश में डेटा सेंटर क्षमता 467 मेगावाट से अधिक हो चुकी थी।
माइक्रोसॉफ्ट ने भी नवंबर 2026 में सऊदी अरब में अपनी नई Azure डेटा सेंटर रीजन उपलब्ध कराने की घोषणा की है।लेकिन डेटा सेंटर, AI और वैश्विक वित्तीय सेवाएं केवल बिजली और इंटरनेट से नहीं चलतीं।इनके लिए राजनीतिक स्थिरता, सुरक्षित समुद्री मार्ग, विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति और निवेशकों का भरोसा भी उतना ही जरूरी है।यही वह बिंदु है जहां युद्ध और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से सीधे जुड़ जाते हैं।
दो समुद्री रास्ते, एक बड़ा खतरा
सऊदी अरब के लिए स्थिति इसलिए भी जटिल है क्योंकि मध्य-पूर्व का संकट केवल जमीन तक सीमित नहीं है।हॉर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब वैश्विक ऊर्जा एवं व्यापार के बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग हैं। हालिया संघर्ष में दोनों मार्गों पर यातायात प्रभावित होने की रिपोर्टें सामने आई हैं।यदि लंबे समय तक समुद्री परिवहन बाधित रहता है तो इसका असर सिर्फ सऊदी अरब पर नहीं पड़ेगा। वैश्विक तेल बाजार, एशिया-यूरोप व्यापार और ऊर्जा कीमतों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।इसलिए रियाद के सामने चुनौती बहुस्तरीय है—सीमा सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और निवेश सुरक्षा।
‘बचाएगा कौन?’ से आगे की रणनीति
यही वजह है कि मैकमास्टर का उठाया सवाल केवल सऊदी अरब के लिए सुरक्षा संबंधी सवाल नहीं है।यह पूरे खाड़ी क्षेत्र की भविष्य की रणनीति से जुड़ा प्रश्न है।क्या खाड़ी देश अमेरिका पर निर्भर रहेंगे?
क्या वे अपनी सामूहिक रक्षा क्षमता विकसित करेंगे?
क्या तुर्किये, पाकिस्तान और मिस्र जैसे देशों के साथ सुरक्षा सहयोग भविष्य में वास्तविक सैन्य सुरक्षा में बदल पाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या सऊदी अरब क्षेत्रीय तनाव के बीच भी Vision 2030 की रफ्तार बनाए रख पाएगा?
इन सवालों का जवाब अभी स्पष्ट नहीं है।
एनएसके विश्लेषण: असली जंग मिसाइलों से ज्यादा भरोसे की
सऊदी अरब के सामने आज सिर्फ हूती ड्रोन या मिसाइलों की चुनौती नहीं है। असली चुनौती उससे बड़ी है—निवेशकों को यह भरोसा दिलाना कि अरबों डॉलर की परियोजनाएं ऐसे क्षेत्र में भी सुरक्षित हैं जहां संघर्ष की रेखाएं तेजी से बदल रही हैं।
Vision 2030 के तहत रियाद भविष्य की अर्थव्यवस्था बनाना चाहता है। लेकिन भविष्य की अर्थव्यवस्था का पहला नियम है—स्थिरता।
मक्का के आसपास सुरक्षा अलर्ट, सऊदी शहरों पर हमलों की खबरें, ऊर्जा ढांचे पर खतरे और समुद्री मार्गों में अस्थिरता इस स्थिरता पर सवाल खड़े करते हैं। दूसरी ओर, सऊदी अरब अपने रक्षा साझेदारों का दायरा बढ़ा रहा है और अपनी तकनीकी तथा आर्थिक क्षमता में निवेश जारी रखे हुए है।
इसलिए फिलहाल कहानी का निष्कर्ष यह नहीं कि सऊदी अरब ‘चारों तरफ से घिर चुका है’, बल्कि यह है कि मोहम्मद बिन सलमान के सामने सुरक्षा और आर्थिक परिवर्तन को एक साथ साधने की सबसे कठिन परीक्षा खड़ी है।
क्योंकि अगर Vision 2030 को रेगिस्तान से निकलकर दुनिया के आर्थिक नक्शे पर नई जगह बनानी है, तो रियाद को सिर्फ यह साबित नहीं करना होगा कि वह कितना निवेश कर सकता है—उसे यह भी साबित करना होगा कि उस निवेश की सुरक्षा कितनी विश्वसनीय है।
बी. के. झा, एनएसके
