DUSU चुनाव में निर्दलीय विशेष यादव ने मचाई हलचल, ABVP-NSUI के बीच बने मजबूत चुनौतीकर्ता “सपा की छात्र इकाई का मिला समर्थन; हार के बावजूद कैंपस की राजनीति में छोड़ी मजबूत छाप

बी के झा

नई दिल्ली, 19 सितंबर

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव की मतगणना पूरी होने के साथ ही छात्र राजनीति की तस्वीर साफ हो गई है। अध्यक्ष समेत प्रमुख पदों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने अपनी पकड़ कायम रखी, लेकिन संयुक्त सचिव पद का मुकाबला खास तौर पर चर्चा में रहा। इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार विशेष यादव ने ABVP और NSUI के प्रत्याशियों को कड़ी चुनौती देकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया।विशेष यादव चुनाव जीत नहीं सके, लेकिन उनका प्रदर्शन ऐसा रहा कि DUSU की चुनावी राजनीति में उनका नाम अलग से चर्चा में आ गया।

बड़े छात्र संगठनों के प्रत्याशियों के बीच निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाना अपने आप में उनके अभियान की अहम उपलब्धि मानी जा रही है।

कौन हैं विशेष यादव?

विशेष यादव मूल रूप से गुरुग्राम, हरियाणा के रहने वाले हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के बुद्धिस्ट स्टडीज विभाग में अध्ययन कर रहे हैं। उनके पिता सरकारी शिक्षक हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं।विशेष की चुनावी कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि उनके बारे में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उन्होंने पहले NSUI से टिकट की उम्मीद की थी। टिकट को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने के बाद वह समाजवादी छात्र सभा के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे। उनके समर्थकों का कहना है कि छात्रों के आग्रह और समर्थन के बाद उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया।

यहीं से मुकाबले ने नया मोड़ लिया। एक तरफ ABVP और NSUI जैसे स्थापित छात्र संगठनों के प्रत्याशी थे, तो दूसरी तरफ विशेष यादव बिना किसी बड़े संगठन के औपचारिक टिकट के निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपनी जमीन तलाश रहे थे।

संगठन नहीं, संपर्क बना अभियान की ताकत

विशेष यादव के अभियान की सबसे बड़ी चर्चा उनके छात्र संपर्क को लेकर रही। उनके समर्थकों के अनुसार वह कैंपस में छात्रों की शैक्षणिक, प्रशासनिक और रोजमर्रा की समस्याओं को लेकर सक्रिय रहे हैं। छात्रों से सीधे संवाद और उनकी समस्याओं को उठाने की कोशिश को उनके अभियान का प्रमुख आधार बताया गया।DUSU की राजनीति में जहां छात्र संगठन अपने मजबूत सांगठनिक ढांचे, कार्यकर्ताओं और लंबे राजनीतिक नेटवर्क के सहारे चुनाव लड़ते हैं, वहीं विशेष यादव ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में इस स्थापित ढांचे के बाहर अपनी जगह बनाने की कोशिश की।यही वजह रही कि संयुक्त सचिव पद की लड़ाई केवल दो प्रमुख छात्र संगठनों के बीच मुकाबला नहीं रह गई। विशेष यादव ने अपनी मौजूदगी से चुनावी समीकरण में तीसरा कोण जोड़ दिया।

हार के बावजूद क्यों चर्चा में आए विशेष यादव?

चुनाव का अंतिम नतीजा उनके पक्ष में नहीं गया, लेकिन राजनीति में कभी-कभी मतों से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि कोई उम्मीदवार मुकाबले की दिशा को कितना प्रभावित करता है। विशेष यादव का अभियान इसी वजह से चर्चा में रहा।बड़े छात्र संगठनों के बीच निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरना और छात्रों के एक हिस्से का समर्थन हासिल करना इस बात का संकेत है कि कैंपस की राजनीति में संगठनात्मक पहचान के अलावा व्यक्तिगत संपर्क और छात्र मुद्दे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि चुनावी प्रदर्शन को व्यापक छात्र समर्थन का अंतिम प्रमाण मानने से पहले आधिकारिक मतों और निर्वाचन आंकड़ों को देखना जरूरी है।

DUSU में ABVP की वापसी, NSUI को झटका

दूसरी ओर, DUSU चुनाव में ABVP ने अध्यक्ष पद समेत प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। यश डबास को छात्र संघ का नया अध्यक्ष चुना गया है।जीत के बाद डबास ने इसे आपसी भाईचारे, देशभक्ति और संगठन की सामूहिक ताकत की जीत बताया। उन्होंने दावा किया कि NSUI कैंपस से पूरी तरह साफ हो गई है और इस चुनाव में ABVP ने 3-1 के अंतर से जीत दर्ज की है।

उन्होंने छात्रावासों और PG में सुरक्षा व्यवस्था को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया। डबास के मुताबिक हर PG और हॉस्टल का सेफ्टी ऑडिट कराया जाना चाहिए। उन्होंने सत्य निकेतन में हुई दुर्घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना जरूरी है।डबास ने यह भी कहा कि पिछली बार की तरह इस बार भी विद्यार्थी परिषद ने 3-1 से जीत दर्ज की है और अगली बार 4-0 का लक्ष्य रहेगा।

अब नजर विशेष यादव की अगली राजनीतिक पारी पर

DUSU चुनाव का परिणाम भले ही विशेष यादव के पक्ष में नहीं गया, लेकिन संयुक्त सचिव पद की लड़ाई में उनकी मौजूदगी ने यह जरूर दिखाया कि दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में बड़े संगठनों के बाहर से आने वाला उम्मीदवार भी चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकता है।

अब सवाल यह है कि विशेष यादव चुनाव के बाद भी छात्र मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं या उनका अभियान चुनाव तक सीमित रह जाता है। यदि वह छात्रों से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाते हैं, तो यह चुनाव उनके लिए राजनीतिक सफर का अंत नहीं बल्कि शुरुआत साबित हो सकता है।

DUSU का यह चुनाव सिर्फ जीत और हार की कहानी नहीं रहा। इसने यह भी दिखाया कि कैंपस की राजनीति में संगठन, व्यक्तिगत जनसंपर्क और छात्र मुद्दों के बीच मुकाबला लगातार नया रूप ले रहा है।

विशेष यादव इसी बदलते समीकरण का एक चर्चित चेहरा बनकर उभरे हैं।

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