कौन भारतीय और कौन नहीं, इसकी पहचान जरूरी’: RSS ने फिर उठाई देशभर में NRC की मांग, SIR के बीच नागरिकता पर छिड़ी नई सियासी बहस, विपक्ष को आशंका—नागरिकता जांच के नाम पर कहीं आम नागरिक ही दस्तावेजों की भूलभुलैया में न फंस जाए

‘बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 1 अक्टूबर

देश में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR), जनगणना और नागरिकता को लेकर चल रही बहस के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने एक बार फिर देशव्यापी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) की मांग को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि देश में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं। उनका तर्क है कि यदि किसी गैर-नागरिक का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची में शामिल है तो उसकी पहचान जरूरी है।

आंबेकर ने NRC पर आपत्ति रखने वालों के लिए अदालत और कानून के रास्ते खुले होने की बात कही। उनका कहना था कि राजनीतिक लाभ के लिए किसी गैर-नागरिक को भारतीय नागरिक मान लेना उचित नहीं हो सकता। RSS की यह मांग ऐसे समय सामने आई है जब SIR को लेकर पहले से ही सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं।

RSS का तर्क—नागरिकता की स्पष्ट पहचान क्यों नहीं?

RSS के तर्क का केंद्र केवल मतदाता सूची नहीं, बल्कि नागरिकता, राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय बदलाव का प्रश्न है। आंबेकर ने अपने संबोधन में जनसंख्या के असंतुलन को राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हुए कहा कि प्रत्येक राष्ट्र की अपनी पहचान होती है और उस पहचान को बनाए रखने के लिए जनसंख्या संबंधी स्थिति को समझना आवश्यक है।संघ का कहना है कि पड़ोसी देशों से भारत आए ऐसे लोगों को, जो CAA के तहत नागरिकता पाने के पात्र हैं, कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से नागरिकता दी जानी चाहिए।

आंबेकर ने पड़ोसी देशों में रह गए SC/ST और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोगों पर कथित अत्याचारों का भी उल्लेख किया।यानी RSS की दृष्टि में NRC का एक पक्ष गैर-नागरिकों की पहचान है, तो दूसरा पक्ष CAA के पात्र लोगों की नागरिकता को व्यवस्थित तरीके से सुनिश्चित करना है।

SIR और NRC—दोनों एक हैं या अलग?

यहीं से मौजूदा विवाद की सबसे अहम परत खुलती है।SIR और NRC कानूनी रूप से एक ही प्रक्रिया नहीं हैं। SIR मतदाता सूची के पुनरीक्षण से संबंधित निर्वाचन प्रक्रिया है, जबकि NRC का उद्देश्य नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करना है। हालांकि SIR के दौरान नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों और पात्रता की जांच को लेकर राजनीतिक बहस ने दोनों मुद्दों को एक-दूसरे के करीब ला दिया है।

मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR की वैधता बरकरार रखी थी और निर्वाचन आयोग की नागरिकता संबंधी जांच की भूमिका को स्वीकार किया था। हालांकि नागरिकता निर्धारण और मतदाता सूची में पात्रता के बीच कानूनी अंतर बना हुआ है।यही वजह है कि कानून के जानकारों के बीच सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटता है तो उसके नागरिकता अधिकारों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा और उस व्यक्ति को किस स्तर पर सुनवाई तथा अपील का प्रभावी अवसर मिलेगा।

कानूनविदों की बड़ी चिंता—दस्तावेज नहीं तो नागरिकता पर सवाल?

SIR पर न्यायिक बहस के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने यह मुद्दा उठाया था कि मतदाता से नागरिकता साबित करने का बोझ डालना संवेदनशील प्रश्न है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हुई दलीलों में यह भी कहा गया कि आधार नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है।कानूनी विश्लेषण में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आया है—मतदाता सूची से नाम हटाना और किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करना दो अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।

SIR पर एक कानूनी विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया कि यदि किसी मतदाता का नाम नागरिकता को लेकर संदेह के आधार पर हटाया जाता है तो उसके बाद की प्रक्रिया क्या होगी और उसे किस प्रकार की सुनवाई मिलेगी।

जुलाई 2026 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि Aadhaar, PAN और बैंक खाता जैसे दस्तावेज अपने-आप में भारतीय नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं हैं।इसलिए NRC की बहस का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन नागरिक है और कौन नहीं, बल्कि यह भी है कि किसी नागरिक की स्थिति तय करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, प्रमाण-आधारित और अपील योग्य होगी।

असम का अनुभव फिर क्यों चर्चा में?

NRC की राष्ट्रीय बहस में असम का अनुभव स्वाभाविक रूप से सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण बन जाता है। नागरिकता की पहचान और विदेशी नागरिकों की पहचान को लेकर असम में दशकों से विवाद रहा है।आंबेकर ने 1983 के Illegal Migrants (Determination by Tribunals) Act का भी उल्लेख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में इस कानून को असंवैधानिक ठहराया था। अदालत के फैसले में इस कानून के तहत अवैध प्रवासियों की पहचान की व्यवस्था और उसके प्रभावों की विस्तार से समीक्षा की गई थी।यही असम का अनुभव आज NRC समर्थकों और आलोचकों के तर्कों का आधार बना हुआ है।समर्थकों का सवाल है कि यदि अवैध प्रवास की समस्या है तो उसकी पहचान के लिए स्पष्ट राष्ट्रीय व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए?

विरोधियों का सवाल इसके उलट है—यदि करोड़ों लोगों से पुराने दस्तावेज मांगकर नागरिकता साबित करने को कहा गया तो उन गरीब, ग्रामीण, प्रवासी और दस्तावेजी कमी से जूझ रहे भारतीय नागरिकों का क्या होगा, जिनके पास जन्म या पैतृक रिकॉर्ड आसानी से उपलब्ध नहीं हैं?

विपक्ष की आपत्ति—SIR को NRC से जोड़कर देखना क्यों?

विपक्षी दलों के एक हिस्से ने लंबे समय से SIR और NRC के बीच संभावित संबंध को लेकर सवाल उठाए हैं। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने NRC को लेकर तीखी आपत्ति जताई है और असम के अनुभव का हवाला देते हुए कहा है कि इससे विशेष रूप से अल्पसंख्यकों, SC/ST और प्रवासी समुदायों को दस्तावेजी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने SIR को भी ‘बैकडोर NRC’ कहकर आलोचना की है। यह उनका राजनीतिक आरोप है, न कि निर्वाचन आयोग द्वारा स्वीकार किया गया निष्कर्ष।

कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल SIR की प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठा रहे हैं। सितंबर 2026 में विपक्षी नेताओं ने SIR को लेकर आयोग पर गंभीर आरोप लगाए और प्रक्रिया पर निगरानी तथा हस्तक्षेप की मांग की थी।विपक्ष का मूल तर्क है कि वोटर सूची को शुद्ध करना अलग बात है और नागरिकता का व्यापक परीक्षण अलग।

यदि दोनों प्रक्रियाओं के बीच स्पष्ट कानूनी और प्रशासनिक सीमाएं नहीं रखी गईं तो राजनीतिक विवाद और बढ़ सकता है।

लेकिन दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण—यदि विदेशी मतदाता सूची में है तो?

NRC विरोध की बहस के बीच एक दूसरा प्रश्न भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।भारत के चुनाव कानून के अनुसार मतदान का अधिकार भारतीय नागरिकों से जुड़ा है। यदि किसी विदेशी नागरिक का नाम वास्तव में मतदाता सूची में गलत तरीके से शामिल हुआ है तो उसकी पहचान और सुधार की व्यवस्था लोकतांत्रिक चुनाव की शुचिता से जुड़ा विषय है।इसी आधार पर निर्वाचन आयोग ने SIR का बचाव करते हुए नागरिकता सत्यापन को मतदाता पात्रता से जोड़ा था।

सुप्रीम कोर्ट ने भी 2026 में बिहार SIR के मामले में आयोग की संवैधानिक भूमिका को स्वीकार किया। यानी विवाद का दूसरा पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है—लोकतंत्र में मतदाता सूची में वास्तविक नागरिकों का नाम सुरक्षित रहना जितना जरूरी है, उतना ही गलत तरीके से शामिल नामों की पहचान करना भी।

CAA ने बहस को और संवेदनशील बनाया

NRC की बहस CAA से अलग करके देखना भी मुश्किल है। CAA ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए कुछ गैर-मुस्लिम समुदायों के लिए नागरिकता प्राप्त करने का विशेष रास्ता बनाया है। इसके संवैधानिक पहलुओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं लंबित रही हैं।यही वह बिंदु है जहां NRC और CAA को लेकर राजनीतिक मतभेद तीखे होते हैं।

समर्थक इसे पड़ोसी देशों से धार्मिक उत्पीड़न झेलकर आए लोगों के लिए नागरिकता का मानवीय रास्ता बताते हैं। आलोचक सवाल उठाते हैं कि यदि भविष्य में देशव्यापी NRC हुआ और किसी भारतीय नागरिक के पास पर्याप्त दस्तावेज नहीं हुए तो CAA के तहत उपलब्ध रास्ता सभी समुदायों के लिए समान रूप से उपलब्ध नहीं होगा।

यह विवाद अदालतों में संवैधानिक प्रश्नों का विषय भी रहा है और राजनीतिक विमर्श में भी।

शिक्षाविदों के लिए असली सवाल—नागरिकता की पहचान किस मॉडल से?

राजनीतिक विज्ञान और प्रशासन के नजरिए से देखें तो NRC की बहस केवल BJP बनाम विपक्ष या RSS बनाम विपक्ष की बहस नहीं है। इसके केंद्र में राज्य और नागरिक के बीच संबंध का एक बुनियादी प्रश्न है।एक तरफ आधुनिक राष्ट्र-राज्य के लिए यह जानना जरूरी है कि उसके नागरिक कौन हैं। दूसरी तरफ भारत जैसा विशाल और सामाजिक रूप से विविध देश ऐसा है जहां बड़ी आबादी का जीवन लंबे समय तक कागजी रिकॉर्ड की बजाय स्थानीय पहचान, परिवार, ग्राम-समुदाय और मौखिक परंपराओं से चलता रहा है।

ऐसे में किसी भी व्यापक नागरिकता रजिस्टर की सफलता केवल कठोर जांच से नहीं, बल्कि सटीक रिकॉर्ड, आसान दस्तावेजी प्रक्रिया, स्थानीय सहायता, बहुस्तरीय अपील और स्वतंत्र न्यायिक निगरानी से तय होगी।

राजनीति के आगे एक संवैधानिक चुनौती

NRC की मांग को लेकर राजनीतिक पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं। RSS इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिकता की स्पष्ट पहचान और जनसांख्यिकीय संतुलन से जोड़ रहा है। विपक्ष का एक हिस्सा इसे संभावित बहिष्करण और दस्तावेजी संकट के संदर्भ में देख रहा है।

अदालतों के सामने प्रश्न नागरिकता, मताधिकार, प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों की सीमाओं से जुड़े हैं।सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अभी केंद्र सरकार ने देशभर में NRC लागू करने की कोई अधिसूचना जारी नहीं की है। इसलिए वर्तमान स्थिति में इसे सरकार का लागू कार्यक्रम नहीं, बल्कि RSS की दोहराई गई राजनीतिक-सामाजिक मांग के रूप में देखना अधिक तथ्यपरक होगा।

एनएसके विश्लेषण

भारत में नागरिकता कोई सामान्य प्रशासनिक पहचान नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए ‘कौन भारतीय है और कौन नहीं’ की पहचान की मांग अपने आप में जितनी सरल सुनाई देती है, उसकी जमीन उतनी ही जटिल है।

एक तरफ यदि विदेशी नागरिक गलत तरीके से मतदाता सूची में शामिल है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था उसकी पहचान की मांग करती है। दूसरी तरफ यदि कोई वास्तविक भारतीय नागरिक केवल दस्तावेजी कमजोरी के कारण संदेह के घेरे में आ जाता है तो उसके अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही अनिवार्य है।

यही NRC की असली कसौटी होगी—

क्या व्यवस्था गैर-नागरिक की पहचान करने के साथ-साथ नागरिक को गलत तरीके से गैर-नागरिक घोषित होने से भी बचा पाएगी?

देश की राजनीति फिलहाल इस प्रश्न को अपने-अपने चश्मे से देख रही है। लेकिन संविधान की कसौटी पर अंतिम सवाल यही रहेगा कि नागरिकता की पहचान की प्रक्रिया कानूनसम्मत, पारदर्शी, प्रमाण-आधारित, गैर-भेदभावपूर्ण और प्रभावी अपील व्यवस्था से लैस है या नहीं।

क्योंकि लोकतंत्र में केवल यह तय करना पर्याप्त नहीं कि कौन नागरिक है—यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि किसी वास्तविक नागरिक से उसकी नागरिकता का अधिकार गलती से न छिन जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *