बी. के. झा
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नई दिल्ली, 25 अगस्त
दिल्ली की चमकती सड़कों, ऊंची इमारतों और विकास के दावों के बीच जसोला के एक खुले नाले ने राजधानी की व्यवस्था का वह चेहरा सामने ला दिया है, जिसे अक्सर फाइलों और सरकारी दावों के नीचे दबा दिया जाता है। 15 साल का मिथुन पतंग के पीछे भागते हुए खुले नाले में गिरा और करीब चार दिन तक उसकी तलाश चलती रही। मंगलवार को उसका शव बरामद हुआ तो एक परिवार की उम्मीद हमेशा के लिए टूट गई।
लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया—अगर नाला खुला था तो उसे बंद कराने की जिम्मेदारी किसकी थी?
और अगर जिम्मेदारी तय थी तो कार्रवाई हादसे से पहले क्यों नहीं हुई?
मिथुन के पिता अवधेश की वह तस्वीर इस हादसे की सबसे मार्मिक तस्वीर बन गई है, जिसमें एक पिता अपने बेटे को बचाने के लिए किसी सरकारी तंत्र का इंतजार करने के बजाय खुद बजबजाते नाले में उतर जाता है। कचरे को हाथों से हटाता है, डंडे से टटोलता है और हर पल इस उम्मीद में तलाश करता है कि शायद उसका बेटा मिल जाए।
यह सिर्फ एक पिता की बेबसी नहीं थी। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल था, जिसके भरोसे राजधानी के करोड़ों लोग अपने बच्चों को घर से बाहर भेजते हैं।
चार दिन की तलाश, फिर मिली मौत की खबर
मिथुन 22 अगस्त की सुबह पतंग पकड़ने की कोशिश करते हुए जसोला के खुले नाले में गिर गया था। सूचना मिलने के बाद दिल्ली फायर सर्विस, एनडीआरएफ, गोताखोरों और अन्य एजेंसियों ने तलाश अभियान शुरू किया। नाले में तेज बहाव के कारण बचाव दलों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा।लेकिन घंटों की तलाश के बाद भी मिथुन का पता नहीं चला। उधर परिवार की बेचैनी बढ़ती गई।
पिता अवधेश ने आखिरकार खुद नाले में उतरकर बेटे को खोजने की कोशिश की। यह दृश्य सोशल मीडिया पर सामने आया तो लोगों ने इसे सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि शहरी प्रशासन की विफलता का प्रतीक बताया।
मंगलवार को करीब चार दिन बाद मिथुन का शव बरामद हुआ। जिस बच्चे की तलाश में पिता कचरे के ढेर उलट रहा था, अब उसी बच्चे के लिए न्याय की तलाश शुरू हो गई है।
मुख्यमंत्री के अल्टीमेटम के बाद JE पर गिरी गाज
हादसे पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कड़ा रुख अपनाया। मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, उन्होंने मुख्य सचिव से एक घंटे के भीतर नाले के अधिकार क्षेत्र और जिम्मेदार अधिकारी की जानकारी मांगी तथा दोषी अधिकारी को निलंबित करने का निर्देश दिया।इसके बाद एमसीडी के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र के जूनियर इंजीनियर अनुज कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।कार्रवाई जरूरी थी, लेकिन सवाल यह है कि क्या एक JE का निलंबन उस बच्चे की जिंदगी वापस ला सकता है?
निलंबन प्रशासनिक कार्रवाई है, समाधान नहीं
असली परीक्षा यह होगी कि जांच में सिर्फ एक अधिकारी की लापरवाही सामने आती है या उस पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी तय होती है, जिसने एक खुले नाले को बच्चों के लिए मौत का जाल बनने दिया।
AAP का हमला—’सरकार जागती तो मिथुन जिंदा होता?’
आम आदमी पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज ने मिथुन के पिता का वीडियो साझा कर सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने पिता की बेबसी को सामने रखते हुए कहा कि जब सरकारी तंत्र बच्चे को नहीं खोज पाया तो पिता खुद नाले में उतर गया।विपक्ष के लिए यह घटना स्वाभाविक रूप से दिल्ली सरकार और एमसीडी की कार्यप्रणाली पर हमला करने का बड़ा मुद्दा बन गई है।
खासकर इसलिए कि दिल्ली में नालों, जलभराव और खुले सीवर को लेकर हर मानसून में सवाल उठते रहे हैं। राजनीतिक बहस का असली केंद्र हालांकि यह होना चाहिए कि नाला किसके अधिकार क्षेत्र में था, उसका निरीक्षण कब हुआ था, सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं थे और हादसे से पहले कितनी शिकायतें दर्ज हुई थीं।
सत्ता बनाम विपक्ष नहीं, सवाल दिल्ली की सुरक्षा का
यह हादसा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से कहीं बड़ा है। सत्ता पक्ष कार्रवाई को अपनी संवेदनशीलता और त्वरित प्रशासनिक प्रतिक्रिया के प्रमाण के रूप में पेश कर सकता है, जबकि विपक्ष इसे सरकार की नाकामी बता सकता है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी राजनीति करेंगे।लेकिन जसोला के लोगों के लिए सवाल बेहद सीधा है—क्या उनके इलाके का कोई और बच्चा खुले नाले का शिकार नहीं होगा?
स्थानीय स्तर पर ऐसे हादसे के बाद स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि खुले नालों की पहचान और उनकी सुरक्षा के लिए नियमित सर्वे क्यों नहीं किया जाता?
जहां नाला खुला हो, वहां मजबूत बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड और ढक्कन की व्यवस्था क्यों नहीं होती?
और यदि कहीं ढक्कन टूट गया है तो उसकी सूचना मिलने के बाद उसे ठीक करने की अधिकतम समय-सीमा क्या है?
समाजसेवी संस्थाओं के लिए भी यह चेतावनी
दिल्ली की सामाजिक संस्थाओं और नागरिक समूहों के सामने भी अब चुनौती है। केवल हादसे के बाद मौके पर पहुंचना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि स्थानीय स्तर पर खुले नालों, सीवर और खतरनाक जलभराव वाले स्थानों की सूची तैयार की जाए और उसे संबंधित एजेंसियों के सामने लगातार उठाया जाए।सरकार के पास मशीनरी है, विभाग हैं और बजट है। नागरिक समाज के पास निगरानी और दबाव बनाने की ताकत है।
यदि दोनों अपनी-अपनी भूमिका निभाएं तो किसी दूसरे मिथुन की कहानी को चार दिन की तलाश और एक शव की बरामदगी तक पहुंचने से रोका जा सकता है।
यह एक हादसा नहीं, व्यवस्था का आईना
जसोला की घटना को केवल ‘दुर्भाग्यपूर्ण हादसा’ कहकर आगे बढ़ जाना सबसे आसान रास्ता होगा। लेकिन खुले नाले में गिरने की घटनाओं में ‘दुर्घटना’ और ‘लापरवाही’ के बीच की रेखा बहुत पतली होती है।पतंग के पीछे दौड़ता 15 साल का बच्चा यह नहीं जानता था कि सड़क के किनारे खुला नाला उसके लिए मौत का रास्ता बन सकता है।
उसे यह जानने की जरूरत भी नहीं होनी चाहिए थी। एक सुरक्षित शहर की जिम्मेदारी यही है कि बच्चे खेले, दौड़ें पतंग पकड़ें—लेकिन किसी खुले नाले में न गिरें।
मिथुन अब नहीं है। उसके पिता की नाले में उतरकर बेटे को तलाशती तस्वीर शायद लंबे समय तक दिल्ली की अंतरात्मा को झकझोरती रहेगी।
अब सरकार के सामने असली सवाल सिर्फ यह नहीं कि JE कौन था?
सवाल यह है कि मिथुन को बचाने के लिए व्यवस्था कहां थी?
और उससे भी बड़ा सवाल—क्या अगला मिथुन आने से पहले दिल्ली अपने खुले नालों को बंद करेगी?
