जिनपिंग के दिल्ली पहुंचने से पहले चीन ने खोले रिश्तों के दरवाजे, बोला- ‘अच्छे पड़ोसी रहेंगे, एक-दूसरे की सफलता में देंगे साथ’, सीमा विवाद से लेकर व्यापार और रणनीतिक रिश्तों तक कई मुद्दों पर बन सकती है नई जमीन

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 12 सितंबर

भारत की राजधानी दिल्ली शनिवार को उस कूटनीतिक मुलाकात की गवाह बनने जा रही है, जिस पर सिर्फ एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की नजर है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत पहुंच रहे हैं और उनके दिल्ली उतरने से पहले ही बीजिंग ने भारत को एक अहम संदेश दे दिया है।

चीन ने कहा है कि वह भारत के साथ अच्छे पड़ोसी और एक-दूसरे की सफलता में मदद करने वाले साझेदार के रूप में आगे बढ़ना चाहता है।संदेश की अहमियत इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि भारत-चीन संबंध पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद और रणनीतिक अविश्वास के दौर से गुजर चुके हैं। ऐसे माहौल में चीन का ‘अच्छे पड़ोसी’ वाला सुर केवल औपचारिक कूटनीतिक भाषा नहीं, बल्कि रिश्तों को स्थिरता की दिशा में ले जाने की कोशिश के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

दिल्ली आने से पहले बीजिंग का बड़ा संदेश

शी जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले चीनी पक्ष ने कहा है कि वह दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के रणनीतिक मार्गदर्शन को आगे बढ़ाने के लिए भारत के साथ मिलकर काम करेगा। चीन का जोर भारत-चीन संबंधों को रणनीतिक स्तर पर मजबूत करने और उन्हें दीर्घकालिक दृष्टिकोण से आगे ले जाने पर है।चीनी राजदूत के मुताबिक, दोनों देशों के बीच संचार बढ़ाने और सहयोग को मजबूत करने की कोशिश की जाएगी। साथ ही मतभेदों को उचित तरीके से संभालने और द्विपक्षीय संबंधों में स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया जाएगा।यानी बीजिंग की भाषा में एक बात साफ दिखाई दे रही है—मतभेद रहेंगे, लेकिन मतभेदों को रिश्तों की पूरी दिशा तय करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

7 साल बाद भारत आ रहे जिनपिंग

शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत दौरे पर आ रहे हैं। उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक भी प्रस्तावित है। चीनी राजदूत के अनुसार, दोनों नेताओं की यह लगातार तीसरे वर्ष होने वाली मुलाकात होगी।इससे पहले मोदी और जिनपिंग की मुलाकात रूस के कज़ान और तियानजिन में हो चुकी है। ऐसे में दिल्ली की बैठक को केवल एक औपचारिक मुलाकात के बजाय दोनों देशों के संबंधों को आगे की दिशा देने वाले संवाद के तौर पर देखा जा रहा है।

सीमा विवाद की छाया में रिश्तों की नई पटकथा?

भारत और चीन के रिश्तों में सबसे बड़ी चुनौती सीमा विवाद रहा है। सीमा पर तनाव ने दोनों देशों के बीच विश्वास की खाई को गहरा किया और इसका असर राजनीतिक, सैन्य तथा आर्थिक संबंधों पर भी पड़ा। हालांकि हाल के दौर में दोनों पक्षों ने संवाद और स्थिरता की दिशा में कदम बढ़ाने की कोशिश की है। चीन का ताजा बयान इसी व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।

बीजिंग की ओर से यह संकेत देने की कोशिश दिखाई देती है कि सीमा समेत तमाम मतभेदों को बातचीत के जरिए नियंत्रित किया जाए और रिश्तों को पूरी तरह टकराव की पटरी पर जाने से रोका जाए।लेकिन भारत के लिए असली कसौटी बयान नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाला बदलाव होगा।

व्यापार भी एजेंडे में, रणनीति भी

भारत और चीन दोनों एशिया की बड़ी आर्थिक और रणनीतिक शक्तियां हैं। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसलिए मोदी-जिनपिंग वार्ता में सीमा विवाद के साथ-साथ व्यापार, आर्थिक सहयोग, आपसी संपर्क और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं।चीन के लिए भारत के साथ स्थिर संबंध आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, वहीं भारत के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता व्यापक द्विपक्षीय संबंधों की बुनियादी शर्त रही है।यही कारण है कि दोनों पक्षों के बीच रिश्तों में सुधार की कोई भी पहल केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगी। इसका असर पूरे एशिया की रणनीतिक तस्वीर पर पड़ सकता है।

क्या चीन सचमुच बदलेगा अपना रुख?

यही इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा सवाल है।चीन ने अच्छे पड़ोसी, सहयोग और पारस्परिक सफलता की बात जरूर कही है, लेकिन कूटनीति में शब्दों की चमक से ज्यादा महत्व उनके पीछे होने वाली कार्रवाई का होता है। भारत भी लंबे समय से स्पष्ट करता रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना द्विपक्षीय संबंधों को पूरी तरह सामान्य बनाना आसान नहीं होगा।इसलिए दिल्ली में मोदी और जिनपिंग की बातचीत की असली परीक्षा इस बात से होगी कि दोनों नेता मतभेदों को संभालने के लिए कितनी ठोस जमीन तैयार करते हैं।

दुनिया क्यों देख रही है मोदी-शी की मुलाकात?

भारत और चीन के बीच रिश्तों में आने वाला कोई भी बदलाव केवल द्विपक्षीय मामला नहीं है। दोनों देश वैश्विक अर्थव्यवस्था, एशियाई सुरक्षा और बदलती विश्व व्यवस्था के महत्वपूर्ण केंद्र हैं।ऐसे समय में जब दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, दिल्ली में मोदी और जिनपिंग की बातचीत के संकेत अमेरिका, यूरोप, रूस और एशिया के तमाम देशों के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे।

चीन का संदेश इसलिए भी अहम है कि जिनपिंग के दिल्ली पहुंचने से पहले ही बीजिंग ने टकराव की भाषा के बजाय सहयोग, पड़ोसीपन और स्थिरता की शब्दावली को आगे रखा है।

अब सवाल यह नहीं है कि चीन क्या कहता है। सवाल यह है कि दिल्ली की बातचीत के बाद चीन क्या करता है।

NSK निष्कर्ष

शी जिनपिंग की भारत यात्रा भारत-चीन संबंधों में किसी तत्काल बड़े बदलाव की गारंटी नहीं है, लेकिन यह संवाद के एक नए अध्याय की संभावना जरूर खोलती है।

बीजिंग ने गेंद बातचीत के पाले में डाल दी है। अब दिल्ली की नजर इस पर होगी कि ‘अच्छे पड़ोसी’ की चीन की परिभाषा सिर्फ कूटनीतिक बयान तक सीमित रहती है या सीमा, व्यापार और रणनीतिक विश्वास के मोर्चे पर भी उसका असर दिखाई देता है।

क्योंकि भारत-चीन रिश्तों में अब शब्दों से ज्यादा जरूरी है—विश्वास, पारदर्शिता और जमीन पर कार्रवाई।

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