बी के झा
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नई दिल्ली/लखनऊ, 8 सितंबर
राजनीति में शब्द कभी-कभी सिर्फ शब्द नहीं रहते। चुनावी मौसम में वही शब्द वोट की गोलबंदी, जातीय अस्मिता और गठबंधन की रणनीति का हथियार बन जाते हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख जयंत चौधरी को लेकर किया गया ‘चवन्नी से रुपया’ वाला तंज अब कुछ ऐसा ही सियासी रूप लेता दिखाई दे रहा है।जिस टिप्पणी को अखिलेश यादव ने राजनीतिक कटाक्ष के तौर पर इस्तेमाल किया, जयंत चौधरी ने उसे जाट समाज के सम्मान से जोड़ दिया।
बीजेपी नेताओं ने जयंत के बचाव में मोर्चा संभाल लिया और बसपा प्रमुख मायावती ने भी अखिलेश से जाट समाज से माफी मांगने की मांग कर दी।अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि अखिलेश ने जयंत को ‘चवन्नी’ कहकर गलती की या नहीं।बड़ा सवाल यह है—क्या अखिलेश का एक राजनीतिक तंज BJP-NDA के लिए पश्चिमी यूपी में जाट वोटों की गोलबंदी का हथियार बन सकता है?
‘चवन्नी’ से शुरू हुई लड़ाई अब ‘जाट सम्मान’ तक पहुंची
अखिलेश यादव ने गठबंधन के पुराने साथियों पर तंज कसते हुए कहा था कि जिन लोगों को उन्होंने ‘चवन्नी से रुपया’ बनाया, वे भी साथ छोड़कर चले गए। राजनीतिक संदर्भ में यह टिप्पणी जयंत चौधरी और RLD की ओर इशारा मानी गई।जयंत चौधरी ने इस पर तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि अगर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में कुछ कहना ही था तो उनका नाम लेकर कहा जा सकता था। उन्होंने जाट समाज को निशाना बनाने और इसे राजनीतिक अहंकार बताते हुए कहा कि ऐसा आचरण पतन की ओर ले जाता है।यहीं से विवाद ने नया मोड़ लिया।
एक नेता पर किया गया हमला धीरे-धीरे एक पूरे सामाजिक समूह के सम्मान के सवाल में बदल गया।और राजनीति में इससे ज्यादा संवेदनशील चुनावी मुद्दा शायद ही कोई हो।
BJP ने मौका क्यों नहीं गंवाया?
अखिलेश के बयान पर बीजेपी नेताओं की प्रतिक्रिया ने इस विवाद को और राजनीतिक वजन दे दिया।पूर्व बीजेपी विधायक संगीत सोम ने जयंत के समर्थन में अखिलेश पर हमला करते हुए कहा कि जिसे वह ‘चवन्नी से रुपया’ कह रहे हैं, वही उन्हें 2027 में ‘एकन्नी’ का भी नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने पश्चिमी यूपी में सपा की चुनावी स्थिति को जयंत के पुराने गठबंधन से जोड़ते हुए भी निशाना साधा।यही वह बिंदु है जहां BJP की रणनीति समझ में आती है।
जयंत चौधरी सिर्फ RLD के अध्यक्ष नहीं हैं। पश्चिमी यूपी में वह एक राजनीतिक संदेश और सामाजिक नेटवर्क—दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
BJP के लिए चुनौती यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में उसका प्रदर्शन कमजोर हुआ था, जबकि सपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 2027 में BJP को पश्चिमी यूपी में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए सहयोगियों की ताकत का अधिकतम इस्तेमाल करना होगा।
जयंत की ताकत कितनी है?
RLD का प्रभाव पूरे उत्तर प्रदेश में समान नहीं है, लेकिन पश्चिमी यूपी में उसकी राजनीतिक उपयोगिता अलग है।2022 के विधानसभा चुनाव में RLD ने सपा के साथ गठबंधन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 33 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 8 सीटें जीती थीं।यही आंकड़ा बताता है कि RLD भले ही पूरे प्रदेश में बड़ी पार्टी न हो, लेकिन कुछ क्षेत्रों में वह जीत-हार का अंतर बदलने वाली ताकत बन सकती है।
यानी चुनावी गणित में RLD का महत्व सीटों की संख्या से ज्यादा उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों में है।अखिलेश की असली चिंता क्या है?
सपा की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में PDA—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ के इर्द-गिर्द मजबूत हुई है। लेकिन पश्चिमी यूपी में चुनावी समीकरण सिर्फ PDA के आधार पर नहीं समझे जा सकते।यहां किसान राजनीति, जाट वोट, मुस्लिम वोट, गुर्जर, दलित और अन्य पिछड़े वर्गों का समीकरण अलग प्रभाव डालता है।ऐसे में अखिलेश यादव अगर जयंत चौधरी को सीधे निशाने पर लेते हैं तो सवाल यह भी उठता है कि—
क्या वह RLD से ज्यादा उसके सामाजिक प्रभाव को चुनौती दे रहे हैं?
और अगर BJP इसी बयान को जाट अस्मिता के मुद्दे में बदलने में सफल होती है, तो नुकसान सिर्फ RLD का नहीं, बल्कि सपा के उस सामाजिक गठजोड़ का हो सकता है जिसे अखिलेश पश्चिमी यूपी में मजबूत करना चाहते हैं।
मायावती की एंट्री ने कहानी और दिलचस्प कर दी
इस विवाद में बसपा प्रमुख मायावती का सामने आना भी महत्वपूर्ण है। मायावती ने अखिलेश यादव के बयान को अमर्यादित और शर्मनाक बताते हुए उनसे जाट समाज से माफी मांगने की मांग की।
राजनीतिक तौर पर यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिमी यूपी में बसपा का अपना सामाजिक आधार रहा है।यानी एक तरफ BJP-RLD इस मुद्दे को लेकर सपा पर हमला कर रहे हैं, दूसरी तरफ बसपा भी अखिलेश को घेर रही है।
क्या यह सपा के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक नैरेटिव बनाने की शुरुआत है?
यह देखना 2027 के चुनाव से पहले बेहद महत्वपूर्ण होगा।जयंत भी अब पीछे हटने के मूड में नहीं जयंत चौधरी लगातार अखिलेश यादव पर पलटवार कर रहे हैं।सहारनपुर की सभा में भी उन्होंने सपा की नीतियों और गन्ने से जुड़े मुद्दों पर निशाना साधा। उन्होंने एथेनॉल उत्पादन को किसानों के लिए नए बाजार से जोड़ते हुए विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाया।यहां जयंत की रणनीति साफ दिखाई देती है—सिर्फ अखिलेश के बयान का जवाब नहीं, बल्कि किसान, गन्ना और पश्चिमी यूपी की अर्थव्यवस्था को अपने राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाना।
यानी ‘चवन्नी’ विवाद अब धीरे-धीरे किसान बनाम राजनीति, सम्मान बनाम अहंकार और पश्चिमी यूपी की पहचान जैसे बड़े नैरेटिव में बदल रहा है।
BJP के लिए जयंत ‘ट्रंप कार्ड’ क्यों हो सकते हैं?
BJP और RLD का गठबंधन केवल सीटों का समझौता नहीं है।पश्चिमी यूपी में BJP के लिए जयंत चौधरी की उपयोगिता तीन स्तरों पर है—पहला—जाट वोट।
RLD की पारंपरिक पहचान जाट राजनीति से जुड़ी रही है।
दूसरा—किसान राजनीति।
चौधरी चरण सिंह की विरासत RLD की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है।
तीसरा—NDA का विस्तार।
जयंत के जरिए BJP पश्चिमी यूपी में अपने सामाजिक गठजोड़ को व्यापक करने की कोशिश कर सकती है।
ताजा राजनीतिक विश्लेषणों में भी जयंत को पश्चिमी यूपी में BJP की रणनीति के लिए महत्वपूर्ण बताया जा रहा है, खासकर सपा के PDA समीकरण को चुनौती देने के संदर्भ में।
लेकिन क्या सिर्फ जाट वोट से चुनाव जीता जा सकता है?
यहीं पर BJP के सामने असली चुनौती है।पश्चिमी यूपी में जाट वोट महत्वपूर्ण है, लेकिन वह अकेला चुनाव नहीं जिताता।किसान, मुस्लिम, गुर्जर, दलित, पिछड़े वर्ग, सवर्ण और शहरी मतदाता—सभी मिलकर विधानसभा सीटों का गणित बनाते हैं।इसलिए BJP के लिए जयंत चौधरी की उपयोगिता को सिर्फ जाट वोट तक सीमित करके देखना रणनीतिक भूल होगी।अगर RLD जाटों के साथ किसान और अन्य सामाजिक समूहों में भी स्वीकार्यता बढ़ाती है, तभी उसका प्रभाव सीटों में दिखाई देगा।
क्या ‘चवन्नी’ ने जयंत की कीमत बढ़ा दी?
राजनीति का सबसे दिलचस्प विरोधाभास यही है।अखिलेश यादव का मकसद शायद जयंत की राजनीतिक हैसियत को कमतर दिखाना रहा हो।लेकिन इसके उलट इस बयान ने जयंत को BJP और RLD के लिए एक बड़ा राजनीतिक नैरेटिव दे दिया।अब जयंत कह सकते हैं—“मुद्दा मेरी कीमत का नहीं, सम्मान का है।”और BJP कह सकती है—“जिसे सपा छोटा समझ रही है, वही पश्चिमी यूपी में बड़ा खेल कर सकता है।”यानी जिस बयान का उद्देश्य राजनीतिक रूप से किसी नेता को छोटा दिखाना था, वही उसके पक्ष में सियासी सहानुभूति और गोलबंदी का माध्यम बन जाए तो यह विपक्ष के लिए रणनीतिक उलझन पैदा कर सकता है।
सीटों का खेल भी कम दिलचस्प नहीं
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले RLD और BJP के बीच सीट बंटवारा भी बड़ा मुद्दा बनने वाला है।RLD की ओर से ज्यादा सीटों की दावेदारी की चर्चा है, जबकि BJP के लिए सवाल यह होगा कि सहयोगी को कितनी सीटें देकर भी अपनी संगठनात्मक ताकत और चुनावी नियंत्रण कायम रखा जाए।यहां एक बात स्पष्ट है—जितना ज्यादा जयंत का राजनीतिक प्रभाव BJP को दिखाई देगा, उतनी ही मजबूत उनकी सीटों की सौदेबाजी हो सकती है।और अगर ‘चवन्नी’ विवाद जाट वोटों की गोलबंदी में बदलता है, तो यह सौदेबाजी जयंत के पक्ष में जा सकती है।
क्या चारू चौधरी भी बन सकती हैं RLD की नई राजनीतिक ताकत?
इस पूरे घटनाक्रम का एक और पहलू है—चारू चौधरी।जयंत चौधरी की पत्नी चारू चौधरी ने हालिया राजनीतिक मंचों पर सक्रिय भागीदारी दिखाई है और ‘चवन्नी’ विवाद में भी खुलकर जयंत का समर्थन किया।अगर वह आने वाले समय में सक्रिय राजनीतिक भूमिका निभाती हैं तो RLD के लिए महिला मतदाताओं तक पहुंच का एक नया माध्यम तैयार हो सकता है।लेकिन इसे अभी चुनावी प्रभाव में बदलना जल्दबाजी होगी।
राजनीतिक विश्लेषण: असली लड़ाई 2027 की है
राजनीतिक विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो ‘चवन्नी’ विवाद अपने आप में चुनाव जिताने या हराने वाला मुद्दा नहीं है।लेकिन यह एक बड़े चुनावी नैरेटिव का ट्रिगर जरूर बन सकता है।
अगर BJP और RLD इसे ‘जाट सम्मान’ से जोड़कर लगातार जमीन पर ले जाते हैं, अगर जयंत इसे किसान और पश्चिमी यूपी की अस्मिता के साथ जोड़ते हैं और अगर सपा इस नैरेटिव का प्रभावी जवाब नहीं दे पाती, तो इसका असर सीटों पर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ अगर अखिलेश यादव इस विवाद को व्यक्तिगत बयान तक सीमित रखते हैं और अपने PDA गठजोड़ को मजबूत करते रहते हैं, तो BJP के लिए इस मुद्दे को व्यापक चुनावी लहर में बदलना आसान नहीं होगा।
समाजशास्त्रीय नजरिया: सम्मान की राजनीति बनाम विकास की राजनीति
शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों के लिए यह विवाद एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करता है—क्या आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव फिर से जातीय पहचान और सामाजिक सम्मान की राजनीति को केंद्र में लाएगा या मतदाता विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं को प्राथमिकता देगा?
राजनीतिक दल निश्चित तौर पर जातीय समीकरणों को साधेंगे, लेकिन अंतिम फैसला मतदाता के हाथ में होगा।किसी समुदाय की अस्मिता को चुनावी भाषा में इस्तेमाल करना तत्काल राजनीतिक लाभ दे सकता है, लेकिन लंबे समय में मतदाता यह भी देखता है कि उसके जीवन से जुड़े मुद्दों पर कौन खड़ा है।
सामाजिक संगठनों के लिए भी बड़ा सवाल
जाट समुदाय समेत तमाम सामाजिक संगठनों के सामने भी यही चुनौती है कि राजनीतिक बयानबाजी को सामाजिक टकराव में बदलने के बजाय उसे लोकतांत्रिक बहस तक सीमित रखा जाए।किसी नेता की टिप्पणी का राजनीतिक विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी पूरे समुदाय को राजनीतिक ध्रुवीकरण का स्थायी आधार बना देना सामाजिक ताने-बाने के लिए उचित नहीं होगा।
और आखिर में—क्या अखिलेश से हुई बड़ी गलती?
राजनीतिक रूप से देखें तो यह संभव है कि अखिलेश यादव ने एक ऐसा हथियार दे दिया हो जिसे BJP और RLD 2027 तक धार देते रहें।लेकिन इसे अभी चुनावी गलती घोषित करना भी जल्दबाजी होगी।एक बयान चुनाव का रुख तभी बदलता है जब वह संगठन, सामाजिक भावना और जमीनी राजनीतिक रणनीति से जुड़ जाए।
फिलहाल इतना जरूर है कि—अखिलेश का ‘चवन्नी’ वाला तंज जयंत को छोटा करने के बजाय उन्हें पश्चिमी यूपी की सियासत में फिर से केंद्र में ले आया है।
अब असली सवाल यह नहीं कि जयंत ‘चवन्नी’ हैं या ‘रुपया’।असली सवाल यह है कि 2027 में पश्चिमी यूपी की सियासी दुकान पर किसकी कीमत चलेगी—PDA की, जाट-किसान समीकरण की, या BJP-NDA के नए सामाजिक गठजोड़ की?
और इसका जवाब चुनावी मंचों पर नहीं, मतदान की मशीन में निकलेगा।एनएसके राजनीतिक विश्लेषण
