उमर खालिद की किताब पर JNU में प्रस्तावित चर्चा रद्द: ऑडिटोरियम बुकिंग कैंसिल होने से फिर गरमाई कैंपस राजनीति; अभिव्यक्ति की आजादी बनाम प्रशासनिक पारदर्शिता पर बहस

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 9 अगस्त

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर परिसर की अकादमिक गतिविधि को लेकर राजनीतिक और वैचारिक बहस के केंद्र में आ गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उमर खालिद की पुस्तक ‘Fractured Communities’ पर 10 अगस्त को प्रस्तावित सार्वजनिक चर्चा के लिए SSS-1 ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द कर दी है।कार्यक्रम का आयोजन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) की ओर से आदिवासी दिवस के अवसर पर किया जाना प्रस्तावित था। कार्यक्रम के लिए दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक का समय निर्धारित था। चर्चा में प्रो. प्रभु महापात्रा, प्रो. उमा चक्रवर्ती, शुद्धब्रत सेनगुप्ता, हर्ष मंदर और बानो ज्योत्स्ना लाहिड़ी समेत कई वक्ताओं के शामिल होने की बात कही गई थी।

लेकिन कार्यक्रम से पहले ही विश्वविद्यालय प्रशासन के फैसले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या यह महज ऑडिटोरियम बुकिंग से जुड़ा प्रशासनिक निर्णय है या JNU में अभिव्यक्ति, अकादमिक स्वतंत्रता और राजनीतिक विचारों के बीच एक नया टकराव शुरू हो गया है?

विश्वविद्यालय का तर्क—कार्यक्रम के पूर्ण विवरण का खुलासा नहीं किया गया

JNU प्रशासन की ओर से जारी नोटिस के मुताबिक ऑडिटोरियम की बुकिंग इसलिए रद्द की गई क्योंकि आवेदन फॉर्म में प्रस्तावित कार्यक्रम के पूर्ण विवरण उपलब्ध नहीं कराए गए थे।प्रशासन का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर में ऑडिटोरियम और अन्य स्थानों के उपयोग को लेकर पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है। रद्दीकरण पत्र संयुक्त रजिस्ट्रार की ओर से जारी किया गया और इसे स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के डीन की मंजूरी प्राप्त थी।JNU ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भी अपने रुख को स्पष्ट करते हुए विश्वविद्यालय को एक ‘लोकतांत्रिक और विकेंद्रीकृत संस्थान’ बताया है।

विश्वविद्यालय के अनुसार कार्यक्रम को स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के डीन की अनुमति मिली थी, लेकिन बाद में उपलब्ध स्थिति और तथ्यों के आधार पर इसे रद्द करने की कार्रवाई की गई।यानी प्रशासन का आधिकारिक तर्क फिलहाल विचारधारा नहीं, बल्कि प्रक्रिया और जानकारी की पारदर्शिता पर आधारित है।लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होताJNU प्रशासन का तर्क प्रशासनिक नियमों की कसौटी पर देखा जाएगा, लेकिन कैंपस राजनीति में मामला इससे कहीं आगे जाता दिखाई दे रहा है।क्योंकि कार्यक्रम किसी सामान्य विषय पर नहीं था। यह उस व्यक्ति की पुस्तक पर चर्चा से संबंधित था जो पिछले कई वर्षों से दिल्ली दंगा मामले और UAPA के तहत चल रही न्यायिक प्रक्रिया के कारण देश की राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है।यही वजह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन का फैसला अब केवल ‘बुकिंग कैंसिल’ करने का मामला नहीं रह गया है।

इसके साथ अकादमिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विश्वविद्यालय परिसर में राजनीतिक विचारों की जगह जैसे सवाल जुड़ गए हैं।

उमर खालिद का मामला—अदालत में अभी जारी है कानूनी लड़ाई

उमर खालिद को सितंबर 2020 में UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में उन पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं और जांच एजेंसियों का आरोप रहा है कि वह कथित साजिश का हिस्सा थे।हालांकि, इस मामले का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।उनकी नियमित जमानत याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है और मामले में अगली सुनवाई 27 अगस्त को निर्धारित है।इस तथ्य का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आरोप लंबित होना और अदालत द्वारा दोष सिद्ध किया जाना दो अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं।

यही वह बिंदु है जहां विश्वविद्यालय प्रशासन, राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों के लिए भाषा और निर्णय दोनों बेहद संवेदनशील हो जाते हैं।

कानूनविदों की नजर में—आरोप और दोषसिद्धि में अंतर

कानूनी दृष्टि से किसी लंबित आपराधिक मामले को लेकर सार्वजनिक चर्चा करते समय सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है—न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया जा सकता।दूसरी ओर विश्वविद्यालयों को भी अपने परिसर में कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रशासनिक नियम और सुरक्षा संबंधी प्रावधान बनाने का अधिकार है।इसलिए इस विवाद के दो अलग-अलग कानूनी पहलू हैं।

पहला—क्या कार्यक्रम के आयोजकों ने ऑडिटोरियम बुकिंग के लिए निर्धारित सभी आवश्यक जानकारियां उपलब्ध कराई थीं?

दूसरा—यदि सभी आवश्यक जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई गई थीं, तो क्या प्रशासन ने नियमों के अनुरूप बुकिंग रद्द की?यदि कार्रवाई निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुई है तो प्रशासनिक निर्णय का आधार मजबूत हो सकता है। लेकिन यदि बाद में यह सामने आता है कि समान परिस्थितियों में अन्य कार्यक्रमों को अनुमति दी गई और केवल इस कार्यक्रम के विषय या वक्ता के कारण रोक लगाई गई, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समान व्यवहार से जुड़े सवाल उठना स्वाभाविक होगा।

शिक्षाविदों के लिए सबसे बड़ा सवाल—कैंपस में असहमति की जगह कितनी?JNU लंबे समय से देश के सबसे सक्रिय राजनीतिक और वैचारिक विश्वविद्यालय परिसरों में गिना जाता रहा है। यहां दक्षिणपंथ से लेकर वामपंथ तक विभिन्न विचारधाराओं के छात्र और शिक्षक सार्वजनिक बहस में हिस्सा लेते रहे हैं।

शिक्षाविदों का एक पक्ष यह तर्क दे सकता है कि विश्वविद्यालय का मूल उद्देश्य केवल सहमत विचारों को मंच देना नहीं, बल्कि असहमति और विवादित विचारों पर भी तथ्यात्मक तथा अकादमिक बहस की जगह उपलब्ध कराना है।लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

विश्वविद्यालय की अकादमिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि प्रशासनिक नियमों की अनदेखी की जाए या किसी कार्यक्रम के आयोजन के लिए निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया जाए।इसलिए असली प्रश्न ‘कार्यक्रम होना चाहिए था या नहीं’ से आगे बढ़कर यह है कि क्या विश्वविद्यालय ने नियमों को सभी कार्यक्रमों पर समान रूप से लागू किया?

राजनीतिक विश्लेषण—JNU में छोटी प्रशासनिक कार्रवाई भी बड़ा

राजनीतिक संदेश बन जाती हैराजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि JNU स्वयं लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में एक प्रतीकात्मक संस्थान बन चुका है।यहां होने वाली किसी बहस, पोस्टर, भाषण या कार्यक्रम का असर अक्सर विश्वविद्यालय परिसर से बाहर संसद और राजनीतिक दलों तक पहुंच जाता है।उमर खालिद से जुड़ा कार्यक्रम रद्द होने के बाद भी यही संभावना है।सत्तापक्ष इस मामले को प्रशासनिक नियमों और विश्वविद्यालय की पारदर्शिता के सवाल के रूप में प्रस्तुत कर सकता है, जबकि विपक्ष और छात्र संगठन इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा असहमति की आवाज को सीमित करने के रूप में देख सकते हैं।इस तरह एक ऑडिटोरियम की बुकिंग का मामला व्यापक वैचारिक टकराव में बदल सकता है।

दिल्ली पुलिस की भूमिका पर भी रहेंगी निगाहें

चूंकि उमर खालिद का मामला दिल्ली दंगों से जुड़े एक गंभीर UAPA प्रकरण से संबंधित है, इसलिए दिल्ली पुलिस का नाम भी इस पूरे विमर्श में स्वाभाविक रूप से सामने आता है।हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द कराने में दिल्ली पुलिस की कोई भूमिका थी। विश्वविद्यालय ने अपने आधिकारिक पक्ष में कार्यक्रम के पूर्ण तथ्यों का खुलासा न होने और प्रशासनिक प्रक्रिया को रद्दीकरण का आधार बताया है।इसलिए पुलिस की भूमिका को लेकर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक दस्तावेज या पुलिस का स्पष्ट बयान आवश्यक होगा।

यह अंतर बनाए रखना जरूरी है—विश्वविद्यालय का प्रशासनिक निर्णय और उमर खालिद के खिलाफ चल रही आपराधिक जांच दो अलग प्रक्रियाएं हैं।सरकार के लिए भी संवेदनशील मामलाकेंद्र सरकार के सामने विश्वविद्यालय परिसरों में वैचारिक बहस को लेकर लंबे समय से एक कठिन संतुलन रहा है।सरकार समर्थक दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि विश्वविद्यालयों को नियमों और अनुशासन के अनुसार चलना चाहिए और किसी भी कार्यक्रम के आयोजन में पूर्ण जानकारी देना अनिवार्य है।वहीं आलोचक सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन से यह सवाल पूछ सकते हैं कि यदि किसी कार्यक्रम में विवादास्पद वक्ता या विषय हो, तो क्या प्रशासनिक नियमों का इस्तेमाल उसके आयोजन को रोकने के लिए किया जा सकता है?

इस सवाल का जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की लिखित नियमावली और उसके समान अनुप्रयोग से मिलना चाहिए।

विपक्ष के सामने भी दोहरी चुनौती

विपक्षी दल इस मामले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल से जोड़ सकते हैं। लेकिन विपक्ष के लिए भी यह आसान राजनीतिक मुद्दा नहीं होगा।यदि वह बिना प्रशासनिक दस्तावेज देखे सीधे विश्वविद्यालय पर सेंसरशिप का आरोप लगाता है, तो सरकार उस पर राजनीतिकरण का आरोप लगा सकती है।

दूसरी ओर यदि विपक्ष चुप रहता है तो छात्र संगठनों और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े समूहों के बीच उसके रुख को लेकर सवाल उठ सकते हैं।इसलिए विपक्ष के लिए सबसे मजबूत राजनीतिक स्थिति यही होगी कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए विश्वविद्यालय से पारदर्शी प्रक्रिया और समान नियम लागू करने की मांग करे।

छात्र राजनीति में फिर उबाल की आशंका

JNU में छात्र राजनीति इस विवाद का सबसे तत्काल प्रभाव हो सकती है।यदि JNUSU और अन्य छात्र संगठन इसे प्रशासनिक प्रक्रिया का सामान्य मामला मानते हैं तो विवाद सीमित रह सकता है। लेकिन यदि इसे वैचारिक सेंसरशिप के रूप में प्रस्तुत किया गया तो प्रदर्शन, वैकल्पिक कार्यक्रम और प्रशासन के साथ टकराव की स्थिति बन सकती है।

दूसरी ओर प्रशासन के लिए चुनौती यह होगी कि विरोध प्रदर्शनों और अभिव्यक्ति के अधिकार के बीच संतुलन कायम रखते हुए परिसर की शैक्षणिक गतिविधियां सामान्य रखी जाएं।असली परीक्षा JNU की संस्थागत विश्वसनीयता कीइस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद उमर खालिद की किताब भी नहीं, बल्कि JNU की संस्थागत विश्वसनीयता है।यदि प्रशासन यह दिखाने में सफल रहता है कि ऑडिटोरियम की बुकिंग से संबंधित नियम सभी कार्यक्रमों के लिए समान हैं और इस मामले में केवल प्रक्रिया संबंधी कमी के कारण निर्णय लिया गया, तो विवाद काफी हद तक प्रशासनिक दायरे में रह सकता है।लेकिन यदि यह धारणा मजबूत होती है कि किसी विशेष विचारधारा, लेखक या वक्ता के कारण कार्यक्रम रोका गया, तो मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की राष्ट्रीय बहस में बदल जाएगा।

सवाल सिर्फ एक कार्यक्रम का नहीं क्या किसी विश्वविद्यालय में विवादित व्यक्ति की किताब पर चर्चा होनी चाहिए?लोकतांत्रिक और अकादमिक दृष्टि से इसका उत्तर सामान्यतः चर्चा से भागने के बजाय चर्चा की गुणवत्ता पर निर्भर होना चाहिए।किसी पुस्तक पर चर्चा का अर्थ उसके लेखक के विचारों का समर्थन करना नहीं होता। विश्वविद्यालय का काम किसी विचार को स्वीकार करना ही नहीं, बल्कि उसे प्रश्नों, तर्कों और आलोचना की कसौटी पर परखना भी है।लेकिन दूसरी तरफ विश्वविद्यालय भी कानून और प्रशासनिक नियमों से ऊपर नहीं हैं।इसलिए इस विवाद का सबसे संतुलित समाधान यही होगा कि नियम स्पष्ट हों, उनका अनुपालन समान हो और किसी विचार या व्यक्ति के कारण अलग-अलग मानदंड न बनाए जाएं।

27 अगस्त पर भी रहेगी नजरउमर खालिद की नियमित जमानत याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट में 27 अगस्त को होने वाली सुनवाई इस पूरे घटनाक्रम को एक अलग कानूनी संदर्भ देगी।अदालत में लंबित मामले का निर्णय न्यायिक प्रक्रिया से होना है और विश्वविद्यालय में किसी पुस्तक पर चर्चा का प्रश्न उससे अलग अकादमिक विषय हो सकता है।इन दोनों को एक-दूसरे का विकल्प बना देना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करेगा।

निष्कर्ष

JNU में उमर खालिद की किताब पर प्रस्तावित चर्चा की ऑडिटोरियम बुकिंग रद्द होना फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से प्रशासनिक और पारदर्शिता संबंधी निर्णय बताया गया है। लेकिन इसके राजनीतिक और वैचारिक प्रभाव इससे कहीं व्यापक हो सकते हैं।एक तरफ प्रशासन के पास नियमों के पालन और कार्यक्रम की पूरी जानकारी उपलब्ध होने का सवाल है।

दूसरी तरफ छात्र संगठनों और अकादमिक जगत के सामने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का प्रश्न है।और इन दोनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण रेखा है—न्यायिक प्रक्रिया।उमर खालिद पर लगे आरोपों का फैसला अदालत करेगी; किसी विश्वविद्यालय का प्रशासन या राजनीतिक दल नहीं। उसी तरह किसी पुस्तक के विचारों की स्वीकार्यता का अंतिम पैमाना भी राजनीतिक निष्ठा नहीं, बल्कि तर्क, तथ्य और अकादमिक विमर्श होना चाहिए।JNU की असली परीक्षा यही है कि वह नियम भी बचाए, बहस भी बचाए और लोकतांत्रिक असहमति के लिए संस्थागत जगह भी बनाए।

क्योंकि विश्वविद्यालय में किसी विचार को रोक देना आसान है, लेकिन विचार को तर्क से पराजित करने वाली स्वस्थ अकादमिक संस्कृति बनाना ही किसी लोकतांत्रिक विश्वविद्यालय की वास्तविक पहचान है।

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