NSK special; अमित कुमार रानू पर जमीन विवाद के आरोप, मंत्री संजय सिंह पर दिल्ली होटल प्रकरण में गंभीर आरोप और अब स्वतंत्र भारद्वाज पर छात्रा के पिता से कथित मारपीट का मामला; चिराग बोले—‘मेरा कोई निजी रिश्ता नहीं’, विपक्ष पूछ रहा—तो फिर राजनीतिक पहुंच का दावा कौन और क्यों करता रहा?

बी के झा

पटना/नई दिल्ली, 4 सितंबर

बिहार की राजनीति में सत्ता की साझेदारी केवल मंत्री पद और विधानसभा की संख्या से तय नहीं होती। उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब सत्ता में शामिल दल के नेताओं, विधायकों, मंत्रियों या उनसे जुड़े लोगों पर गंभीर आरोप लगते हैं।लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के सामने इस समय कुछ ऐसे ही सवाल खड़े हैं।एक तरफ उनकी पार्टी के विधायक अमित कुमार रानू जमीन विवादों को लेकर पुलिस कार्रवाई और FIR के घेरे में हैं।

दूसरी तरफ पार्टी कोटे के मंत्री संजय सिंह को लेकर दिल्ली के होटल से संबंधित गंभीर आरोप राजनीतिक विवाद का विषय बने। और अब स्वतंत्र भारद्वाज, जिसने कथित तौर पर चिराग पासवान से अपनी नजदीकी का दावा किया था, छात्रा के पिता से कथित मारपीट के मामले में पुलिस कार्रवाई के केंद्र में है।

इन तीनों घटनाओं को कानूनी तौर पर एक ही मामले की कड़ी नहीं कहा जा सकता। आरोपों की प्रकृति और परिस्थितियां अलग-अलग हैं। लेकिन राजनीतिक सवाल एक ही है—क्या सत्ता में हिस्सेदारी रखने वाली पार्टी अपने नेताओं और प्रभावशाली समर्थकों पर पर्याप्त राजनीतिक अनुशासन और जवाबदेही सुनिश्चित कर पा रही है?

चिराग का बयान—स्वतंत्र से कोई निजी रिश्ता नहीं

विवाद बढ़ने के बाद चिराग पासवान ने स्वतंत्र भारद्वाज से किसी निजी संबंध से स्पष्ट इनकार किया है।उनका कहना है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं से रोजाना सैकड़ों लोग मिलते हैं। कोई समस्या लेकर आता है, कोई अपनी बात रखता है और कोई तस्वीर खिंचवाता है। लेकिन किसी नेता से मुलाकात को निजी संबंध या राजनीतिक संरक्षण का प्रमाण नहीं माना जा सकता।चिराग ने स्वतंत्र भारद्वाज के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई है और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

यानी चिराग ने अपना राजनीतिक रुख स्पष्ट कर दिया है—

यदि किसी ने उनके नाम का गलत इस्तेमाल किया है तो जांच हो और कार्रवाई हो। लेकिन यहीं से एक दूसरा सवाल पैदा होता है।अगर चिराग से कोई निजी संबंध नहीं था तो स्वतंत्र भारद्वाज उनके नाम और राजनीतिक पहुंच का दावा किस आधार पर कर रहा था?

क्या यह सिर्फ प्रभाव जमाने की कोशिश थी?

क्या राजनीतिक नेताओं के साथ पुरानी मुलाकातों और तस्वीरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया?

या फिर उसके राजनीतिक संपर्कों की कोई वास्तविक पृष्ठभूमि थी?

इन सवालों का जवाब अब पुलिस जांच से मिलना चाहिए।—मामला अकेला नहीं:

अमित कुमार रानू पर जमीन विवाद के आरोप स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण को लेकर चिराग की सफाई के बीच उनकी पार्टी के बेलसंड विधायक अमित कुमार रानू से जुड़े जमीन विवाद का मामला भी विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दे रहा है।

रानू के खिलाफ जमीन विवाद से संबंधित कई FIR दर्ज होने की खबरें सामने आई हैं। आरोप फर्जी दस्तावेजों के जरिए जमीन के हस्तांतरण और कब्जे से जुड़े हैं। पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई भी की है।यहां फिर वही कानूनी सावधानी जरूरी है—FIR या आरोप किसी व्यक्ति को अदालत में दोषी साबित नहीं करते।

लेकिन राजनीतिक जवाबदेही का सवाल FIR से पहले शुरू हो जाता है।जब किसी सत्तारूढ़ गठबंधन के विधायक के खिलाफ बार-बार गंभीर शिकायतें सामने आती हैं, तो क्या पार्टी नेतृत्व को सार्वजनिक रूप से अपना रुख स्पष्ट नहीं करना चाहिए?

क्या पार्टी को अपने विधायक से जवाब नहीं मांगना चाहिए?

क्या सरकार को यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि शिकायतकर्ता को किसी राजनीतिक दबाव का सामना न करना पड़े?

और सबसे बड़ा सवाल—अगर आरोप गलत हैं तो सरकार और पार्टी सामने आकर विधायक को क्लीन चिट क्यों नहीं देतीं, और अगर आरोप गंभीर हैं तो जांच पूरी होने तक राजनीतिक स्तर पर जवाबदेही क्यों नहीं तय होती?

मंत्री संजय सिंह का दिल्ली होटल विवाद: चिराग ने जांच की बात कही

LJP (रामविलास) कोटे के मंत्री संजय सिंह से जुड़ा दिल्ली के होटल का विवाद भी बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बना।तेज प्रताप यादव की ओर से मंत्री पर एक महिला को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए। इन आरोपों के बाद चिराग पासवान ने भी मामले की जांच की मांग की और कहा कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए।

यहां भी आरोपों को तथ्य मानना उचित नहीं है। जांच ही यह तय करेगी कि घटना में वास्तविकता क्या थी।लेकिन राजनीतिक रूप से यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोप एक विपक्षी नेता ने सत्ता पक्ष के मंत्री पर लगाए और मामला सीधे पार्टी नेतृत्व की जवाबदेही तक पहुंच गया।

तेजस्वी का सवाल: संयोग या पैटर्न?

आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और कांग्रेस की ओर से इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चिराग पासवान पर राजनीतिक सवाल उठाए जा रहे हैं।विपक्ष का तर्क है कि पहले विधायक से जुड़े जमीन विवाद ने सवाल खड़े किए, फिर पार्टी के मंत्री पर गंभीर आरोप सामने आए

और अब चिराग के नाम का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति मारपीट के मामले में चर्चा में है।विपक्ष इसी क्रम को आधार बनाकर पूछ रहा है—“आखिर ऐसा क्यों है कि बार-बार चिराग पासवान की पार्टी से जुड़े लोगों के नाम विवादों में सामने आ रहे हैं?

”यह सवाल राजनीतिक है, कानूनी निष्कर्ष नहीं।लेकिन लोकतंत्र में विपक्ष का काम ही सत्ता से जवाब मांगना है।और सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह जवाब दे।

बिहार के आम नागरिक का सवाल इससे भी बड़ा है

राजनीतिक दल अक्सर आरोपों को “राजनीतिक साजिश” बताकर खारिज कर देते हैं।लेकिन आम नागरिक के लिए सवाल ज्यादा सीधा है—अगर किसी गरीब या सामान्य नागरिक की जमीन पर विवाद हो जाए तो उसे न्याय पाने में कितना समय लगता है?

अगर किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर आरोप लगे तो क्या जांच उसी गति से होती है?

अगर किसी नेता का नाम लेकर कोई व्यक्ति दबदबा दिखाए तो पुलिस उस दावे को कितनी गंभीरता से जांचती है?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या बिहार में कानून की ताकत व्यक्ति की राजनीतिक पहचान देखकर बदलती है?

यही सवाल किसी भी सरकार की असली परीक्षा है।—‘सत्ता की छतरी’ का सवाल क्यों उठ रहा है?

बिहार में एनडीए सरकार है और LJP (रामविलास) सत्ता गठबंधन का हिस्सा है। ऐसे में पार्टी के किसी विधायक, मंत्री या प्रभावशाली कार्यकर्ता से जुड़ा विवाद सिर्फ संगठन का निजी मामला नहीं रह जाता।

विपक्ष स्वाभाविक रूप से सरकार से पूछेगा कि कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

सरकार का जवाब भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा कि यदि कानून अपना काम कर रहा है तो राजनीतिक हस्तक्षेप का आरोप क्यों लगाया जा रहा है।

यही लोकतंत्र का संतुलन है।

लेकिन यह संतुलन तभी कायम रह सकता है जब पुलिस की कार्रवाई राजनीतिक पहचान से स्वतंत्र दिखाई दे।

कानूनविदों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु

कानूनी विशेषज्ञों के दृष्टिकोण से इन तीनों घटनाओं को एक साथ रखकर किसी राजनीतिक व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।- किसी नेता के साथ तस्वीर होना अपराध में संलिप्तता का प्रमाण नहीं।

FIR होना दोष सिद्धि नहीं – किसी मंत्री पर आरोप लगना अपराध साबित नहीं करता।

किसी व्यक्ति का खुद को नेता का करीबी बताना उस नेता को आरोपी नहीं बनाता।

लेकिन दूसरी तरफ—यदि राजनीतिक पहुंच का दावा करके कोई व्यक्ति कानून से बचने या किसी पर प्रभाव डालने की कोशिश करता है, तो उस दावे की जांच होना जरूरी है।यही स्वतंत्र भारद्वाज मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।

चिराग के लिए अब सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती

चिराग पासवान ने स्वतंत्र भारद्वाज के खिलाफ शिकायत करके एक स्पष्ट संदेश दिया है कि वह अपने नाम के दुरुपयोग को स्वीकार नहीं करेंगे।अब देखना यह होगा कि उनकी पार्टी के दूसरे विवादित मामलों में भी यही स्पष्टता दिखाई देती है या नहीं।

राजनीतिक नेतृत्व की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह अपने विरोधियों के खिलाफ क्या बोलता है।विश्वसनीयता तब बनती है जब अपने लोगों पर लगे आरोपों के मामले में भी वही कठोरता दिखाई जाए।

यदि आरोप झूठे हैं—तो पार्टी को खुलकर अपने नेता के साथ खड़ा होना चाहिए।

यदि आरोप गंभीर हैं—तो जांच को स्वतंत्र छोड़ना चाहिए।

और यदि अपराध सिद्ध होता है—तो राजनीतिक पहचान चाहे जो हो, कार्रवाई होनी चाहिए।

NSK का सवाल: आखिर जवाबदेही की सीमा कहां है?

स्वतंत्र भारद्वाज से लेकर अमित कुमार रानू और संजय सिंह तक अलग-अलग विवादों में LJP (रामविलास) से जुड़े नाम सामने आने के बाद विपक्ष को हमला करने का राजनीतिक हथियार मिल गया है।लेकिन जनता को राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा निष्पक्ष कार्रवाई चाहिए।

इस पूरे विवाद में किसी को पहले से दोषी घोषित करना न्याय के सिद्धांत के खिलाफ होगा।लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि आरोपों पर सवाल ही न उठाए जाएं।

सवाल पूछना लोकतंत्र है।

जांच करना कानून का काम है।

दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई करना सरकार और न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है।

और सत्ता में बैठे राजनीतिक दल की जिम्मेदारी है कि वह यह भरोसा पैदा करे कि उसका कोई विधायक, मंत्री, पदाधिकारी या समर्थक कानून से ऊपर नहीं है।यही वह कसौटी है जिस पर आज चिराग पासवान और उनकी पार्टी की राजनीतिक विश्वसनीयता भी परखी जा रही है।

क्योंकि जनता के बीच सबसे खतरनाक संदेश यह नहीं है कि किसी नेता के समर्थक पर आरोप लगा।सबसे खतरनाक संदेश तब जाता है—जब आम आदमी को यह लगने लगे कि सत्ता के करीब पहुंचते ही कानून की धार कमजोर हो जाती है।और यदि बिहार में ऐसी धारणा मजबूत हो रही है, तो सवाल केवल चिराग पासवान से नहीं है।

सवाल मुख्यमंत्री से भी है।

सवाल पुलिस-प्रशासन से भी है।

सवाल सत्ता गठबंधन के हर घटक दल से है।

और अंततः सवाल उस लोकतांत्रिक व्यवस्था से है, जिसका पहला सिद्धांत होना चाहिए—

“कानून की नजर में न नेता बड़ा, न कार्यकर्ता—सब बराबर।”NSK

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