बी के झा
NSK news Ind

पटना, 6 सितंबर
बिहार इस समय सिर्फ बाढ़ से नहीं जूझ रहा, बल्कि एक ऐसे सवाल से भी घिरा है जिसका जवाब हर मानसून के बाद अधूरा रह जाता है—क्या बिहार की बाढ़ केवल मौसमी आपदा है या अब यह राष्ट्रीय स्तर के हस्तक्षेप की मांग करने वाली स्थायी त्रासदी बन चुकी है?
गंगा, गंडक, कोसी, पुनपुन समेत कई नदियों के उफान ने राज्य के बड़े हिस्से को प्रभावित किया है। पटना के गांधीघाट पर गंगा का जलस्तर 2016 के पुराने उच्चतम स्तर को पार कर चुका है। प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में राहत-बचाव अभियान तेज किया है और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी स्वयं हवाई सर्वेक्षण कर चुके हैं।
इसी बीच विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने बाढ़ को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर सीधा राजनीतिक दबाव बनाया है। उन्होंने बिहार की बाढ़ को ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने, 5 हजार करोड़ रुपये की विशेष वित्तीय सहायता देने और दूर-दराज के दियारा इलाकों में फंसे लोगों तक राहत पहुंचाने के लिए वायुसेना के हेलीकॉप्टरों की मदद लेने की मांग की है।
तेजस्वी का आरोप है कि राज्य के 19 जिले भीषण बाढ़ से प्रभावित हैं और 20 लाख से अधिक लोग संकट में हैं। उन्होंने कहा कि कई जगह लोग घरों की छतों पर फंसे हैं और पशुधन तथा सार्वजनिक ढांचे को भारी नुकसान हुआ है। हालांकि प्रभावित लोगों और नुकसान के आंकड़ों के अलग-अलग सरकारी आकलन सामने आ सकते हैं, इसलिए इन आंकड़ों का अंतिम सत्यापन सरकारी क्षति-आकलन से ही होगा।
‘चुनाव में बिहार आते हैं, आपदा में भी आएं मोदी’
तेजस्वी यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बिहार का दौरा कर बाढ़ की स्थिति का प्रत्यक्ष जायजा लेने की मांग की है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री को सिर्फ प्रशासनिक रिपोर्ट पर निर्भर रहने के बजाय प्रभावित इलाकों की वास्तविक स्थिति देखनी चाहिए।उन्होंने दियारा क्षेत्रों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि जहां सड़क संपर्क टूट चुका है और लोग छतों पर फंसे हैं, वहां सामान्य राहत व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो सकती। ऐसे इलाकों में हवाई माध्यम से खाद्य सामग्री और जीवनरक्षक सामान पहुंचाने की जरूरत है।
यह मांग राजनीतिक भी है और प्रशासनिक भी।
विपक्ष के लिए यह सरकार को घेरने का अवसर है, लेकिन बाढ़ की भयावहता को देखते हुए हेलीकॉप्टर, नाव, एनडीआरएफ-एसडीआरएफ और राहत शिविर जैसे संसाधनों का सवाल सीधे मानवीय जरूरत से भी जुड़ा है।
पटना में गंगा ने तोड़ा 2016 का रिकॉर्ड
बाढ़ की गंभीरता का अंदाजा पटना के गांधीघाट से लगाया जा सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक शनिवार को गंगा का जलस्तर 50.57 मीटर तक पहुंच गया,
जबकि 2016 में दर्ज उच्चतम स्तर 50.52 मीटर था।
जलस्तर के और बढ़ने की आशंका जताई गई थी।
गंगा के साथ गंडक, कोसी, बूढ़ी गंडक, पुनपुन और अन्य नदियों में बढ़ता पानी कई इलाकों में तटबंधों पर दबाव बढ़ा रहा है।
भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की कुल 33 टीमें तथा लगभग 700 सरकारी नावें राहत-बचाव में लगाई गई हैं।
यानी सरकार के सामने चुनौती केवल पानी रोकने की नहीं, बल्कि लोगों को निकालने, भोजन-पानी पहुंचाने, पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराने, स्वास्थ्य सेवाएं बनाए रखने और टूटे संपर्क मार्गों के बीच राहत की अंतिम कड़ी तक पहुंचने की है।
सरकार का पक्ष: ‘तंत्र सक्रिय, राहत कार्य जारी’
विपक्ष के आरोपों के बीच बिहार सरकार का कहना है कि राहत और बचाव कार्य युद्धस्तर पर चल रहे हैं।मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 4 सितंबर को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण कर स्थिति की समीक्षा की थी। इसके अगले दिन उन्होंने भागलपुर के नवगछिया में राघोपुर तटबंध का निरीक्षण किया और बेगूसराय में
बेगूसराय, मुंगेर और खगड़िया की बाढ़ तैयारियों तथा राहत-बचाव कार्यों की समीक्षा की।सत्तापक्ष की ओर से भी विपक्ष के आरोपों का जवाब दिया गया है। मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा ने मुख्यमंत्री के प्रयासों का बचाव करते हुए सरकार की तैयारियों को प्रभावी बताया।जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने भी बाढ़ प्रभावित लोगों को हरसंभव सहायता का भरोसा दिया और कहा कि घबराने की जरूरत नहीं है तथा जरूरत पड़ने पर निचले इलाकों के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जाएगा।
केंद्र की ओर से भी पहले ही राज्य को सहायता का भरोसा दिया गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने बाढ़ के खतरे को लेकर मुख्यमंत्री से बातचीत की थी और एनडीआरएफ की तैनाती समेत हरसंभव मदद का आश्वासन दिया था।
लेकिन असली सवाल: ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने का मतलब क्या?
तेजस्वी यादव की मांग राजनीतिक रूप से बड़ी है, लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य भी समझना जरूरी है।भारत के आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 में ‘राष्ट्रीय आपदा’ नाम की कोई अलग वैधानिक श्रेणी निर्धारित नहीं है। सरकारी व्यवस्था में गंभीर आपदा को उसकी तीव्रता, नुकसान और राज्य की क्षमता के आधार पर ‘calamity of severe nature’ माना जा सकता है और ऐसे मामलों में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष यानी NDRF से सहायता उपलब्ध हो सकती है।
मौजूदा केंद्रीय व्यवस्था में बाढ़ पहले से ही SDRF के तहत अधिसूचित आपदा है और केंद्र सरकार सामान्य राज्यों के SDRF में 75 प्रतिशत योगदान करती है। इसके अलावा गंभीर आपदा की स्थिति में NDRF से अतिरिक्त सहायता का प्रावधान है।इसलिए राजनीतिक बहस का असली प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि बाढ़ को ‘राष्ट्रीय आपदा’ कहा जाए या नहीं।
बड़ा सवाल यह है कि क्या केंद्र इस संकट को अत्यंत गंभीर आपदा मानकर बिहार के लिए अतिरिक्त वित्तीय, सैन्य और लॉजिस्टिक सहायता का स्तर बढ़ाता है?
हर साल बाढ़, हर साल बयान—स्थायी समाधान कब?
यही वह सवाल है जहां बिहार की बाढ़ राजनीति से निकलकर शासन की परीक्षा बन जाती है।तेजस्वी यादव इससे पहले भी केंद्र और राज्य सरकार पर बिहार की बाढ़ का स्थायी समाधान नहीं निकाल पाने का आरोप लगा चुके हैं।
विपक्ष का तर्क है कि हर वर्ष राहत पैकेज, नाव, तटबंध और राहत शिविर की व्यवस्था करने के बजाय नदी प्रबंधन, तटबंधों की दीर्घकालिक मजबूती, जलनिकासी, गाद प्रबंधन, नेपाल के साथ जल-साझेदारी और पुनर्वास पर स्थायी नीति क्यों नहीं बनती?
सत्ता पक्ष इसके जवाब में कह सकता है कि बिहार की भौगोलिक स्थिति, नेपाल से आने वाली नदियां और लगातार बदलते जलस्तर इस संकट को असाधारण बनाते हैं।
लेकिन जनता का सवाल इससे नहीं बदलता—यदि बाढ़ हर वर्ष आती है तो तैयारी भी हर वर्ष नई क्यों दिखाई देती है?
दियारा में संकट सिर्फ पानी का नहीं, जिंदगी का है
पटना के दियारा क्षेत्रों में संकट की तस्वीर और ज्यादा गंभीर है। राजद सांसद मीसा भारती ने दानापुर और मनेर के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और बड़ी नावों की आवश्यकता की बात कही। रिपोर्ट के अनुसार मनेर की छह पंचायतें बाढ़ की चपेट में हैं।
दूसरी ओर पूर्णिया सांसद पप्पू यादव ने राघोपुर पहुंचकर बाढ़ प्रभावित लोगों के बीच राहत सामग्री और आर्थिक सहायता वितरित की।भाजपा एमएलसी पवन सिंह ने भी भोजपुर के प्रभावित इलाकों के लोगों के प्रति चिंता जताते हुए प्रशासन से सहायता की अपील की है।इन घटनाओं से एक बात स्पष्ट होती है—
बाढ़ अब केवल सरकार बनाम विपक्ष का मुद्दा नहीं रह सकती। सांसद, विधायक, सामाजिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएं और स्थानीय समुदाय—सभी को राहत अभियान की साझी जिम्मेदारी निभानी होगी।
राजनीतिक विश्लेषण: बाढ़ ने खोल दिया बिहार के विकास मॉडल का पुराना पन्ना
राजनीतिक दृष्टि से तेजस्वी यादव की मांग को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है।पहला, यह तत्काल राहत की मांग है—5 हजार करोड़, हेलीकॉप्टर और केंद्र की सक्रिय भागीदारी।
दूसरा, यह केंद्र बनाम राज्य की जिम्मेदारी का सवाल है। बिहार में सत्ता का समीकरण एनडीए के पक्ष में है, इसलिए विपक्ष स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठा रहा है कि जब केंद्र और राज्य में एक ही गठबंधन की सरकार है तो संकट की घड़ी में केंद्र से इतनी बड़ी मदद मांगने में देरी क्यों?
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है बाढ़ को राजनीतिक मौसम से बाहर निकालना।बिहार में बाढ़ चुनावी भाषणों का विषय नहीं, करोड़ों लोगों के जीवन का स्थायी संकट है। इसलिए किसी भी सरकार की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि उसने कितने हवाई सर्वेक्षण किए, बल्कि यह होना चाहिए कि कितने लोगों तक समय पर नाव पहुंची, कितने परिवारों को सुरक्षित निकाला गया, कितने पशुओं के लिए चारा पहुंचा और कितने गांवों में बीमारी फैलने से पहले स्वास्थ्य व्यवस्था पहुंची।
NSK का सवाल: बाढ़ की राजनीति नहीं, जवाबदेही चाहिए
बिहार आज दो स्तरों पर परीक्षा दे रहा है।एक तरफ पानी का बढ़ता स्तर है, दूसरी तरफ शासन की क्षमता की परीक्षा।
तेजस्वी यादव ने केंद्र से 5 हजार करोड़ और ‘राष्ट्रीय आपदा’ की मांग करके गेंद दिल्ली के पाले में डाल दी है। सरकार ने राहत-बचाव अभियान तेज करने और प्रभावित इलाकों की निगरानी का दावा किया है। केंद्र की ओर से एनडीआरएफ और अन्य सहायता का आश्वासन भी सामने आया है।
अब सवाल यह है कि क्या राहत की यह लड़ाई बयानबाजी से आगे बढ़कर जमीन पर दिखाई देगी?
क्या दियारा में छत पर फंसे परिवार तक भोजन पहुंचेगा?
क्या तटबंध टूटने से पहले प्रशासन कार्रवाई कर पाएगा?
क्या पशुपालकों के मवेशियों के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध होगा?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या बिहार हर साल बाढ़ आने के बाद राहत मांगता रहेगा,
या केंद्र और राज्य मिलकर ऐसी दीर्घकालिक नीति बनाएंगे जिससे बाढ़ बिहार की नियति नहीं, प्रबंधनीय आपदा बने?
क्योंकि बिहार को सिर्फ नाव नहीं चाहिए।
बिहार को ऐसी नीति चाहिए, जो हर साल पानी उतरने के बाद फिर से वही सवाल खड़े होने से रोके।
